“मैं सोचने लगा कि कितना अंधविश्वासी व्यक्ति हूँ जो प्रेतों के चक्कर में आईसलैंड आ गया। आज भला प्रेतों को कौन मानता है? और मैं तो लाशों और मृत्यु को आए दिन अस्पताल में देखता हूँ, फिर भला क्यों ऐसे ख्याल रखता हूँ? विज्ञान-युग में गर पूरे जीवन गोता लगाओ, तो कभी किनारे पर बैठने का मन तो करता ही है। कभी विज्ञान से परे देखने का। कभी हजार वर्ष पीछे लौटने का। उन विश्वासों में जीने का, जिससे कि जीवन सुलभ हो। कौवा मुंडेर पर आकर बैठ जाए, और हम खुशी-खुशी मरने को तैयार हो जाएँ। कोई वेल्लोर-एम्स के चक्कर न लगाएँ, सेकंड ओपिनियन न लें। बस एक कौवे के मुंडेर पर बैठने का इंतजार करें। हम यह मान कर जियें कि हम अमर हैं। मर कर भी ‘हुल्डुफोक’ बन कर जियेंगे। और लोग हम पर पत्थर न फेकेंगें। हमारे ऊपर बुलडोज़र न चलाएँगें। हम मर कर भी गुमनाम न होंगे। भले ही जीवन में कुछ न किया हो, याद जरूर किए जाएँगे। और जो भी मुझसे मिलना चाहें, वो बस लकड़ी पर बना एक यंत्र लेकर मुझसे गप्पिया लें। हम अदृष्ट से दृष्ट हो जाएँ। आज के युग में भी इस जादुई दुनिया में जीते इस यूरोपीय देश के लोग शायद उनसे किस्मत वाले हैं जो मृत्यु को अंतिम सत्य मान लेते हैं। आखिर अगले दिन हवाई जहाज चली और मैं प्रेतों के देश को अलविदा कह चल पड़ा। नीचे खड़े हजारों ‘हुल्डुफोक’ मुझे हाथ दिखा रहे थे, और मैं उनको हाथ हिला रहा था। उनका शरीर नहीं नजर आ रहा था, बड़े कान और पैर अब भी साफ-साफ दिख रहे थे। क्यूट हैं ये प्रेत!”
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Praveen Kumar Jha,
भूतों के देश में: आईसलैंड