यह तख्तापलट रक्तहीन था। पूरे भारत में लोगों को धड़ल्ले से गिरफ्तार किया जा रहा था। गिरफ्तारी वारंट में बस इतना ही लिखा जाता था कि फलाँ-फलाँ को सार्वजनिक हित में गिरफ्तार किया जा रहा है। उन्हें न तो किसी कानून के तहत किए गए किसी अपराध का आरोपी बताया जाता था, न ही कोर्ट में उनकी पेशी की जाती थी। अधिकांश राज्यों में, एक आदर्श प्राथमिकी (एफ.आई.आर.), वह दस्तावेज जिसके आधार पर गिरफ्तारी की जाती थी, को साइक्लोस्टाइल कर जिले के पुलिस थानों में भेज दिया जाता था, ताकि जहाँ जरूरत पड़े उन्हें भर लिया जाए।

