Mansarovar - Part 1 (Hindi)
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Read between July 6 - July 10, 2018
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सबल की शिकायतें सब सुनते हैं, निर्बल की फरियाद भी कोई नहीं सुनता! रग्घू
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जैसे किसी लाश को बाहर निकालते समय सम्बन्धियों का धैर्य छूट जाता है, रूके हुए आँसू निकल पड़ते हैं और शोक की तरंगें उठने लगती हैं, वही दशा करूणा की हुई।
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जानवर मारने से काम करता है; पर खाता है मन से। फूलमती बेकहे काम करती थी; पर खाती थी विष के कौर की तरह।
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‘किसी को अपना गुलाम बनाने के लिए पहले खुद भी उसका गुलाम बनना पडता है।’
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स्त्री पुरुष में विवाह की पहली शर्त यह है कि दोनों सोलहों आने एक-दुसरे के हो जाएं। ऐसे पुरूष तो कम हैं, जो स्त्री को जौ-भर विचलित होते देखकर शांत रह सकें, पर ऐसी स्त्रियां बहुत हैं, जो पति को स्वच्छंद समझती हैं।
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स्त्री के जीवन में प्यार न मिले तो उसका अंत हो जाना ही अच्छा।
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आदमी इसलिए थोडे ही जीना चाहता है कि रोता रहे। जब मालूम हो गया कि जीवन में दु:ख के सिवा कुछ नहीं है, तो आदमी जीकर क्या करे। किसलिए जिए? खाने और सोने और मर जाने के लिए?
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‘देखो, बच्चों को बहुत मारना-पीटना मत। मारने से बच्चे जिद्दी या बेहया हो जाते हैं। बच्चों के साथ आदमी को बच्चा बन जाना पड़ता है। जो तुम चाहो कि हम आराम से पड़े रहें और बच्चे चुपचाप बैठे रहें, हाथ-पैर न हिलाएँ, तो यह हो नहीं सकता। बच्चे तो स्वभाव के चंचल होते हैं। उन्हें हें किसी-न-किसी काम में फँसाए रखो। धेले का खिलौना हजार घुड़कियों से बढ़कर होता है।‘
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बच्चे नए-नए कुरते पहने, नवाब बने घूत रहे थे। प्यारी उन्हें प्यार करने के लिए गोद लेना चाहती, तो रोने का-सा मुंह बनाकर छुड़ाकर भाग जाते। वह क्या जानती थी कि ऐसे अवसर पर बहुधा अपने बच्चे भी निष्ठुर हो जाते हैं।
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जब हम किसी के हाथों अपना असाधारण हित होते देखते हैं, तो हम अपनी सारी बुराइयों उसके सामने खोलकर रख देते हैं। हम उसे दिखाना चाहते हैं कि हम आपकी इस कपा के सर्वथा योग्य नहीं है।
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अतीत चाहे दुख:द ही क्यों न हो, उसकी स्मतियॉ मधुर होती हैं।
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‘स्वामी, जब यह पत्र आपके हाथों में पहुँचेगा, तब तक में इस संसार से विदा हो जाऊँगी । मैं बड़ी अभागिन हूँ। मेरे लिए संसार में स्थान नहीं हे। आपको भी मेरे कारण क्लेश और निन्दा ही मिलेगी। मैने सोचकर देखा ओर यही निश्चय किया कि मेरे लिए मरना ही अच्छा हे। मुझ पर आपने जो दया की थी, उसके लिए आपको क्या प्रतिदान करूँ ? जीवन में मैंने कभी किसी वस्तु की इच्छा नहीं की, परन्तु झे दुःख है कि आपके चरणों पर सिर रखकर न मर सकी। मेरी अंतिम याचना है कि मेरे लिए आप शोक न कीजिएगा। ईश्वर आपको सदा सुखी रखे।’
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बूढ़े आदमियों की जान तो उनका भोजन हैं। अच्छा भोजन न मिले, तो वे किसके आधार पर रहें। चौधरी
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जवानी जोश हैं, बल हैं, दया हैं, साहस हैं, आत्मविश्वास हैं, गौरव हैं और वह सब कुछ - जीवन को पवित्र, उज्जवल और पूर्ण बना देता हैं। जवानी का नशा घमंड हैं, निर्दयता हैं, स्वार्थ हैं, शेखी हैं, विषम-वासना हैं, कटुता हैं और वह सब-कुछ - जो जीवन को पशुता, विकार और पतन की ओर ले जाता हैं।
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संसार को तो उन लोगों की प्रशंसा करने में आनन्द आता हैं, जो अपने घर को भाड़ में झोंक रहे हों गैरों के पीछे अपना सर्वनाश किये डालते हों। जो प्राणी घरवालों के लिए मरता हैं, उसकी प्रशंसा संसारवाले नहीं करते। वह तो उनकी दृष्टि में स्वार्थी हैं, कृपण हैं, संकीर्ण हृदय हैं, आचार-भ्रष्ट हैं। इसी तरह जो लोग बाहरवालों के लिए मरते हैं, उनकी प्रशंसा घरवाले क्यों करने लगे!