ऐसे नीरस किंतु सरस जीवन की कहानी कैसी होगी? कैसी होगी वह कहानी जिसके पात्र शिकायत करना नहीं जानते, हाँ! जीवन जीना अवश्य जानते हैं, प्रेम करना अवश्य जानते हैं, और जानते हैं सपने देखना। सपने शिकायतों का अच्छा विकल्प हैं। यह भी हो सकता है कि सपने देखने वालों के पास और कोई विकल्प ही न हो। यह भी हो सकता है कि शिकायत करने वाले यह जानते ही ना हों कि उन्हें शिकायत कैसे करनी चाहिये। या तो यह भी हो सकता है कि शिकायत करने वाले यह मानते ही न हों कि उनके जीवन में शिकायत करने जैसा कुछ है भी! ऐसे ही सपने देखने वाले किंतु जीवन को बिना किसी तुलना और बिना किसी शिकायत के जीने वाले, और हाँ, प्रेम करने वाले पात्रों की कथा है विनोदकुमार शुक्ल का उपन्यास “दीवार में एक खिड़की रहती थी”।
Vinod Kumar Shukla (born 1 January 1937) is a modern Hindi writer known for his surreal style that often borders on magic-realism and sometimes move beyond it. His works include the novels Naukar ki Kameez and Deewar Mein Ek Khirkee Rahati Thi (A Window lived in a Wall), which won the Sahitya Akademi Award for the best Hindi work in 1999.
His first collection of poems Lagbhag Jai Hind was published in 1971. Vah Aadmi Chala Gaya Naya Garam Coat Pehankar Vichar Ki Tarah was his second collection of poems, published in 1981 by Sambhavna Prakashan. Naukar Ki Kameez (The Servant's Shirt) was his first novel, brought out in 1979 by the same publisher. Per Par Kamra (Room on the Tree), a collection of short stories, was brought out in 1988, and another collection of poems in 1992, Sab Kuch Hona Bacha Rahega.
Vinod Kumar Shukla was a guest littérateur at the Nirala Srijanpeeth in AGRA from 1994 to 1996 during which he wrote two novels Khilega To Dekhenge and the refreshing Deewar Mein Ek Khirkee Rahati Thi. The latter has been translated into English by Prof. Satti Khanna of Duke University as A Window Lived in a Wall.
जैसे हाथी के आगे निकलने के बाद हाथी की खाली जगह छूटती जाती है, क्या किताबों के पढ़े जाने के बाद उनकी खाली जगह भी छूटती है? शायद ऐसा सभी किताबों के साथ नहीं होता होगा। जगह छूटती भी होगी तो भर जाती होगी। इस किताब की जगह मुश्किल से ही भरेगी। या शायद नहीं भरेगी।
इसमें सब कुछ अलग सा है। है वही सब कुछ, जो होता है, लेकिन थोड़ा अलग सा। हाथी अलग सा। खिड़की अलग सी। पेड़ अलग से। पेड़ पर बैठने वाला लड़का अलग सा। पेड़ पर बैठने वाले लड़के का दद्दा भी अलग सा। रघुवर प्रसाद और सोनसी तो खैर अलग से हैं ही, और कुछ और अलग से हो जाते हैं खिड़की से बाहर निकलने के बाद। कहानी कहीं से शुरू नहीं होती है और कहीं जाती नहीं है। उसे कोई जल्दी नहीं है। उसे कार्यालय नहीं जाना, न ही कक्षा पढानी है। कहानी भी रघुवर और सोनसी के साथ खिड़की से बाहर निकल जाती है, तालाब में चाँद की परछाईं के साथ छप छप करती रहती है, और सुबह होने से पहले वापस आकर सो जाती है। पढ़ने वाले को कहानी के गीले बाल देख के लगता है कि कहानी कहीं तो होकर आयी है, लेकिन कई बार वो भी खिड़की के परे देख नहीं पाता। एक बार देख पाने के बाद कहानी ख़तम होने पे जो जगह छूटती है, उसे भरना बहुत कठिन है।
Magical realism based in Chhattisgarh and written in Hindi! The magic is so overwhelming and sweeter than the Murakamis, Marquez, Esquivels I have read but also it happens so much closer to home.
Edit: Read it again after 8 years. Having a bias and fascination for elephants, the new edition cover with a beautiful water color elephant (and a challenge!) prompted me to pick it up again. However, this time I was aware of what I was seeking. Its not a plot intensive book. The magic lies in the writinhg style. Pretty abstract.
What I loved: - The conversations. Between Raghuveer Prasad and "Vibhagyadhyaksh". Funny, with catch 22 moments on Elephants, buffaloes, monkeys and what nots! -The chemistry between Sonasi and Raghuveer. Cuteness overloaded. Deep conversations with the face value of words spoken, and how they were interpreted differently! -Episodes with Sadhu and elephant were my favorites.
What I did not like: -The vagueness. -Too abstract for my taste.
Overall: Recommended if you like playing with words, enjoy works which are not plot centric. From recent reads, it reminded much of RetSamadhi.
Review on 11thJan2017: Simple village setting. A middle class Mathematics teacher stretching ends to meet living in a small room with a big window. This is the story of the couple's fascination with a pet elephant and his mahout Sadhu, a bluethroat bird, a nearby lake full of lotus and natural surroundings. Their imagination takes flight when they jump out through that window to enter a world of their own. (Magical realism???) The language is very simple. But the narration is abstract and vague.... which is why it would have won the Sahitya Akademi I guess... and which is why I couldn't like it much.
Having heard so much about the writings of the author,I had to read this acclaimed book. It’s nothing like what I have read: there’s Raghuvar Prasad who teaches mathematics to primary school children in a small town college who lives in a single rented room. He takes a jitney to the college and is on the verge of starting a married life with his wife. The story could have gone into any direction: about domestic life, about life’s purpose, about relentless struggles, about poverty or about battling social ills. It’s none of this: instead, we are taken to in a different realm altogether with the characters in the book through a window in the wall! And then you find yourself marvelling at the word play, the poetry that emerges from short sentences, the languor that envelops the pace, taking the reader to the sheer delight of what our imagination can lead us to discover. The writing touches upon the magic of simplicity,of wonder and joy in small things, the uniqueness that we miss in what we assume are the mundane matters of everyday life. It is not something to be boxed up neatly in a genre:it’s vibrant in terms of the imagery it evokes in the simplest of word play.
विनोद कुमार शुक्ल के बारे में गीत चतुर्वेदी जी ने कहा था - कि वो हवा में तैरने वाले कवि हैं।
और भाईसाहब ये उपन्यास - 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' पढ़ने के बाद मैं कतई नकार नहीं सकता। जिन्होंने विनोद कुमार शुक्ल की केवल कविताएँ पढ़ी हैं (जैसे कि मैं था), उन्हे ये तो समझ आ जाता है कि विनोद कुमार शुक्ल की imagination कहाँ तक है लेकिन जब ऐसे लोग उनका उपन्यास उठाते हैं - तब तो भाईसाहब ऐसे imagination और reality के बीच की दीवार हो जाती है ध्वस्त।
कहानी एक छोटे से कस्बे के गणित के अध्यापक रघुवर प्रसाद और उनकी पत्नी सोनसी की है। उनका जीवन बहुत अलग है। रघुवर प्रसाद को लेने एक हाथी आता है (रोज), उनके एक कमरे के घर में एक खिड़की है जिसके भीतर एक अलग ही दुनिया है - वहाँ बहुत तालाब हैं, नदियां हैं जिनका पानी बिल्कुल साफ है, एक बूढ़ी अम्मा हैं जो जब देखो कुछ ना कुछ बुहारती रहती हैं और रघुवर प्रसाद और उनकी पत्नी को चाय पिलाती हैं। नीलकंठ हैं, तितली हैं, उड़ने वाली रंगोली हैं, और बहुत कुछ है जो सिर्फ सपनों में होता है। और इस खिड़की में और कोई घुस नहीं सकता सिवाये रघुवर प्रसाद के घरवालों के।
सबसे बड़ी बात कहानी में कोई बड़ी घटना नहीं है, कोई हीरो या विलेन नहीं है। कोई दुख या दर्द नहीं है। कोई ऐसी घटना नहीं है जो असाधारण हो। सब इतना साधारण और सरल है कि वो सपने सा लगता है - एक अद्भुत सपना।
और विनोद कुमार शुक्ल की विशेषता ये है कि वो कहानी में - क्या है से ज्यादा वो बताते हैं - 'क्या नहीं है'। और ये अपने में एक अलग ही संसार बना देता है।
पूरे उपन्यास में भारत के मध्यवर्गीय जीवन के ऐसे साधारण से हिस्सों का जिक्र है जो पढ़कर लगता है कि यार सोच नहीं था इन चीजों को एक उपन्यास में डाला जा सकता है और वहाँ ये सटीक बैठेगा। कुछ बहुत सी ऐसी चीजें हैं जिनके बारे में अपना घर छोड़कर आने के कारण भूल ही गए। बहुत से ऐसे शब्द मिले जिनमे बचपन की महक शामिल है। उदाहरण के लिए -
भारत के मध्यवर्ग या कह लो असली जीवन के सबसे पड़ोस में अगर कोई किताब पढ़ी है तो वो ये है। और बड़ी बात ये - कि मध्यवर्ग की जो इमेज हमारे मन मे है कि वो परेशान है, पिसा जा रहा है, ऐसा कुछ नहीं है इसमें। एक बहुत साधारण सी कहानी कि कैसे वो अपना रोजमर्रा का जीवन जी रहे हैं।
कहानी की हर लाइन अपने में कविता। और हर लाइन आपको आगे पढ़ने के लिए ललायित करेगी।
और पूरी कहानी में एक hidden humour है जो आपको बहुत तेज़ हँसाएगा नहीं - गुदगुदी करेगा और उसका अपना सुख है।
अच्छा हाँ- कहानी में conversations बहूत अलग तरीके की हैं। रघुवर प्रसाद जब अपनी पत्नी से बात करते हैं तो बहुत अलग होती है जिसमे कहा कुछ और जाता है और सुना कुछ और जाता है। जब वो बाहर अपने साथ काम करने वाले लोगों से बात करते हैं तो वो अलग ही है - जिसमे हर बात पहले वाली से भिन्न है लेकिन फिर भी जुड़ी हुई किसी एक subtext से। रघुवर प्रसाद के अपने पिता से बातचीत बहुत साधारण है और हमारे आपके जीवन के सबसे निकट।
ये किताब दीवार में एक खिड़की रहती थी - हर भारतीय और बाहर वाले को एक बार तो पढ़नी ही चाहिए। और जो literature में interest रखते हैं उनके लिए तो must है। और जो विनोद कुमार शुक्ल और या फिर मानव कौल के fans हैं वो तो जरूर, जरूर, और जरूर ही पढ़ें। मानव कौल के लेखन की जड़ों की एक शाखा यहाँ से निकली हैं।
किताब पढ़ने के लिए - यहाँ जाएँ।
किताब के कुछ अंश दे रहा हूँ --
"साइकिल हाथी से आगे निकल जाएगी।" "यदि हाथी पैदल चले तो!" "हाथी पैदल चले क्या मतलब।" "यदि ना चले तो घोड़े पर चलेगा?" "नहीं सर! मैं कह रहा था, हाथी दौड़ेगा तो साइकिल आगे न निकाल पाए।" "हाँ, आखिर हाथी दौड़ेगा तो पैदल ही। भैंस को भागते हुए देखे हो। तेज दौड़ती है।" "नहीं सर! भैंस उतनी तेज नहीं दौड़ती जितनी तेज दौड़ते हुए दिखती है। भारी - भरकम होने के कारण ��सका दौड़ना तेज दौड़ना लगता है।"
"हाथी आगे-आगे निकलता जाता था और पीछे हाथी की खाली जगह छूटती जाती थी।"
"पत्नी खाना बनाते-बनाते पति को ���ेख लेती थी। हर बार देखने में उसे छूटा हुआ नया दिखता था। क्या देख लिया है यह पता नहीं चलता था। क्या देखना है यह भी नहीं मालूम था। देखने में इतना मालूम होता होगा कि यह नहीं देखा था।"
"आगे कहीं दोपहर घोड़े के आने का रास्ता खड़े-खड़े देख रही होगी। घोड़ा जैसे ही उसके पास आएगा, दोपहर होकर उसके साथ चलने लगेगी।"
"दृष्टि के जल से सूर्य बूझकर चंद्रमा हो गया था। और शाम हो गई थी। फिर रात हो गई। वे उठे तो ऐसे उठे जैसे दूसरे दिन की सुबह थी।"
"खिड़की से आकाश दिखता था, इसलिए खिड़की से झाँकते हुए बच्चे आकाश से झाँकते हुए लगते थे।"
"रघुवर प्रसाद ने जैसे सोनसी के दौड़ने को ही पकड़ा हुआ था। पकड़ा हुआ दौड़ना छूट कर दौड़ गया था।"
"देखने लेने से वस्तुओं को पा जाने का सुख मिल जाता तो कितना अच्छा होता। मिठाई को देखते ही खाने का सुख। ऐसा होता तो दिखाने के लिए थोड़ी चीजें होतीं और सबकी जरूरत पूरी हो जाती। अनजानी खुशी सोच समझकर हुए दुःख को भी दूर कर देती थी।"
"नीम के पेड़ के नीचे का अधिक अंधेरा हाथी के अंधेरे के आकार का था। रात के बीतने से जाता हुआ यह अंधेरा, शायद हाथी के आकार में छूट गया था। ज्यों ज्यों सुबह होगी हाथी के आकार का अंधेरा हाथी के आकार की सुबह होकर बाकी सुबह में घुलमिल जाएगी।
"क्या हम यहाँ से मृत्यु को देख सकते हैं?" "बचे जीवन को देख लेने के बाद फुरसत मिलेगी तब। जीवित आँखों से मृत्यु नहीं जीवन दिखता है।"
"सात दिनों के सप्ताह में एकाध दिन कौनसा दिन हो जाता था। यह कौन सा दिन कभी थोड़ा कभी पूरा बीत जाता था। बिना दिन का पता चले कि मंगलवार है या ब्रहस्पति काम हो जाता था। यद्यपि यह कौन सा दिन किसी भी दिन जैसा था, पर आज का दिन था। इस कौन से दिन की आज की सुबह थी। कौन से दिन के आज के पेड़ थे। पर आज के पेड़ वही पेड़ थे। सब कुछ वही था और दिन मालूम नहीं था।"
"कितने दिन हो गए को कितने दिन हो गए में ही रहने देना चाहिए। दिन को गिनती में नहीं समझना चाहिए। किसी को भी नहीं। गिनती चारदीवारी की तरह है जिसमे सब मिट जाता है। अंतहीन जैसा का भी गिनती में अंत हो जाता है। जो गिन नहीं गया उसकी विस्तार अनंत में रहता था, कि वह कभी भी कहीं भी है। चाहे कितना छोटा या कम क्यूँ ना हो।"
"वर्तमान का सुख इतना था कि भविष्य आगे उपेक्षित-सा रस्ते में पड़ा रहता, जब तक वहाँ पहुँचो तो लगता खुद बेचारा रस्ते से हटकर और आगे चला गया। "
ऐसे नीरस किंतु सरस जीवन की कहानी कैसी होगी? कैसी होगी वह कहानी जिसके पात्र शिकायत करना नहीं जानते, हाँ! जीवन जीना अवश्य जानते हैं, प्रेम करना अवश्य जानते हैं, और जानते हैं सपने देखना। सपने शिकायतों का अच्छा विकल्प हैं।
There is a window beyond which lives a world where if you don't find the right means, you can go to work riding an elephant, befriend a monk, resurrect lost children, drink the sweetest water out of the purest stream, bathe in a lake where a swimming moon chases you through budding lotuses. Though imagination is the essence of the story the emotions of the characters are very relatable. The story goes on in a very subtle way. It asks for patience in the beginning but as u go on u may experience the existence of a "khirkee" in your life too.
I am in awe of his writing, I have never read anything like this. The simplicity of this book is what stands out.
Highly Recommended. If you are into Hindi literature, please give this a try.
विनोदकुमार शुक्ल की साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कृति 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' को बाकी उपन्यासों की तरह मान लेना एक गंभीर भूल होगी। यह या तो उपन्यास की शक्ल में कविता है या फिर कविता की शक्ल में उपन्यास। शुक्ल जी बाहरी तौर पे नीरस दिख रहे छोटे शहर के निम्न मध्यमवर्गीय जीवन से रास ढूंढकर लाते हैं और हम पाठकों से रूबरू करवाते हैं। दाम्पत्य जीवन के श्रृंगार को उन्होनें अपनी अनूठी शैली में प्रस्तुत किया है। उपन्यास में जादू और यथार्थवाद का चमत्कृत कर देना वाला मिश्रण है। भाषा में प्रवाह ऐसा जो बाकी लेखकों में देखने को नहीं मिलता। यह उनकी शैली का ही कमाल है कि उनके कथानक में कोई बड़ी घटना नहीं है, कोई बड़े दार्शनिक सवाल नहीं हैं लेकिन इसके बावजूद पाठक मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते। मुराकामी और मार्क्वेज़ जैसे लेखकों की पंक्ति में अगर हिंदी से कोई उत्तराधिकारी चुनना हो तो निश्चित ही विनोदकुमार शुक्ल मेरी पहली पसंद होंगे।
Nothing much happens. Fondly imagined and leisurely written, this books borders on magical-realism of Marquez or Rushdie. There are seemingly nonsensical conversations, magical worlds which are never explained and characters who disappear but it all seems plausible, even obvious. Sure that could happen in this town! The author takes us to an almost Utopian world of a North-Indian village where nothing much happens and in to the life of a newly married couple. Wish one could stay back for a days in that gaon.
“दीवार में एक खिड़की रहती थी” उपन्यास के अंदर एक कविता है। या कि कविता की शक्ल में एक उपन्यास है। किसी भी प्रकार की जाँच-पड़ताल या शिकायत से मुक्त यह एक चित्र है। उपन्यास के नायक हैं एक छोटे शहर के महाविद्यालय के युवा और नवविवाहित व्याख्याता रघुवर प्रसाद। नायिका है रघुवर की पत्नी सोनसी। रघुवर प्रसाद शहर की एक पुरानी बस्ती में एक कमरे के घर में किराये पर रहते हैं। यह कमरा दो अन्य कमरों के बीच में है जहाँ एक ही कमरे में अन्य परिवार रहते हैं। यही कमरा रघुवर और सोनसी की दुनिया है। इसी कमरे में उनकी बैठक, रसोई और शयनकक्ष हैं। कमरे में एक ही दरवाजा और एक ही खिड़की है। कमरे के बाहर एक बरामदा है जिसके आगे वही सामान्य निम्न-मध्यम वर्गीय पुरानी बस्ती है। कमरे की खिड़की इस उपन्यास के केंद्र में है। यह वह खिड़की है जिसके पार कूदकर सोनसी और रघुवर प्रसाद एक जादुई दुनिया में पहुँच जाते हैं। शहर के इस हिस्से में नदी है, तालाब हैं, पशु हैं, पक्षी हैं, और जंगल भी। इन सबके साथ मानव रूप में एकमात्र उपस्थिति है एक बूढ़ी अम्मा की जो चाय की एक टपरी चलाती हैं। बूढ़ी अम्मा इतनी बूढ़ी हो चुकी हैं कि उनकी आयु में नाम का होना मायने नहीं रखता, उनका बूढ़ी अम्मा कहलाना पर्याप्त है। खिड़की के इस पार की दुनिया हर किसी को दिखायी नहीं देती। बाहर की दुनिया से इस दुनिया में जाने का रास्ता रघुवर प्रसाद के घर के अंदर जाकर खिड़की से कूदकर ही मिल सकता है। उपन्यास की भाषा संवादों की अनेक परतों को एक साथ दिखाती चलती है। पात्र जब दैनंदिन जीवन के सामान्य कार्य निपटा रहे होते हैं, तभी वे सपने भी देख रहे होते हैं और तभी वे प्रेम भी कर रहे होते हैं। कुछ उदाहरण देखिये:
“रघुवर प्रसाद कल की तैयारी में किताब खोलकर बैठ गये। पत्नी खाना बनाते-बनाते पति को देख लेती थी। हर बार देखने में उसे छूटा हुआ नया दिखता था। क्या देख लिया है यह पता नहीं चलता था। क्या देखना है यह भी नहीं मालूम था। देखने में इतना ही मालूम था कि इतना ही देखा था।”
यह भी:
“टैम्पो में हमेशा की तरह गाँव की औरतों और बूढ़ों की भीड़ थी। एक बूढ़ा डंडा लिये हुए बैठा था। विद्यार्थी नहीं थे इसलिये रघुवर प्रसाद ने अंदर घुसने की कोशिश की। टैम्पो वाले ने जगह बनाने के लिये कहा। टेम्पो में जगह होती तो मिलती। ऐसा नहीं था कि बाहर मैदान से थोड़ी जगह ले लेते और टैम्पो में रख देते तो जगह बन जाती। बिना जगह के वे टैम्पो में घुस गये। जब टैम्पो चली तब उनको लगा कि दम नहीं घुटेगा। लड़्कियों-औरतों के बीच बैठे हुए आगे जब उनको कोई विद्यार्थी देखेगा तो अटपटा नहीं लगेगा, क्योंकि विद्यार्थी सोचेगा कि रघुवर प्रसाद के बैठने के बाद औरतें बैठी होंगी। औरतों के बाद रघुवर प्रसाद बैठे होंगे ऐसा विद्यार्थी क्यों सोचेगा।…"
नीरस किंतु सरस जीवन की कहानी कैसी होगी? कैसी होगी वह कहानी जिसके पात्र ��िकायत करना नहीं जानते, हाँ! जीवन जीना अवश्य जानते हैं, प्रेम करना अवश्य जानते हैं, और जानते हैं सपने देखना। सपने शिकायतों का अच्छा विकल्प हैं। यह भी हो सकता है कि सपने देखने वालों के पास और कोई विकल्प ही न हो। यह भी हो सकता है कि शिकायत करने वाले यह जानते ही ना हों कि उन्हें शिकायत कैसे करनी चाहिये। या तो यह भी हो सकता है कि शिकायत करने वाले यह मानते ही न हों कि उनके जीवन में शिकायत करने जैसा कुछ है भी! ऐसे ही सपने देखने वाले किंतु जीवन को बिना किसी तुलना और बिना किसी शिकायत के जीने वाले, और हाँ, प्रेम करने वाले पात्रों की कथा है विनोदकुमार शुक्ल का उपन्यास “दीवार में एक खिड़की रहती थी”।
विनोद कुमार शुक्ल को plot-फ्लोट ज़रुरत नहीं पड़ती. एक नयी नयी शादी है, एक हांथी है, एक सायकल और एक महाविद्यालय. बस कहानी चलती रहेगी और विनोद कुमार शुक्ल जो दिखाएँगे वो आप देखते रहेंगे. उपन्यास surreal visuals से भरा है. बहुत सुन्दर शब्दों में लिखे गए चित्र,जो सिर्फ सुन्दर ही नहीं मजेदार भी हैं. कभी आप लाइनों पर हंस देंगे कभी कई कई बार पढ़कर खुद को amuse करते रहेंगे.
जैसे अगर रात भर आपके घर के बहार एक हांथी खड़ा हो, और खड़े खड़े सुबह हो जाए तो आप इस बात को कैसे कहेंगे. विनोद कुमार शुक्ल इसे कुछ इस तरह कहते हैं -"रात के बीतने से जाता हुआ अँधेरा शायद हांथी के आकार में छूट गया था. ज्यों ज्यों सुबह होगी हांथी के आकार का अँधेरा हांथी के आकार की सुबह होकर बाकि सुबह में घुलमिल जाएगा." किताब की एक लाइन जो काफी famous है शायद "हांथी आगे-आगे निकलता जाता था और पीछे हांथी की खली जगह छूटती जाती थी". या ये की "आज के दिन आज की चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दे रही थी".
विनोद कुमार शुक्ल की कविताएँ मैं पढ़ चुकी हूँ, कुछ बहुत पसंद हैं, कुछ समझ नहीं आतीं और कुछ पसंद भी हैं पर समझ भी नहीं आतीं (कविता-अंतिम समय तक के लिए). पर 'दीवार में एक खिड़की रहती है' मेरी favourite किताबों में से एक हैं. क्योंकि ये प्यार की कहानी है, किसी के साथ रहने की कहानी है, साथ-साथ रहकर भी प्यार करते रहने की कहानी है.
This one's a passive, delightful read. Nothing seemingly happens but you stay for the abstract narration of Vinod Kumar Shukla. The novel is a metaphorical window to the lives of a couple living in rural India. It's amusing to read about their mundane, simple life and the choices that arise out of that simplicity.
Honestly, I started enjoying the book after I realised that it's not going anywhere, and I don't need to understand some hidden meaning. There is no plot or anything of key significance. The conversations between the characters are funny at times and their monologues a mix of profoundness or absolute vagueness - maybe not to them.
This one's a leisure reading, not a page turner but perhaps that is how it was intended to be. I look forward to reading Naukar ki Kameez.
पति-पत्नी प्रेम का अद्भुत चित्रण! इस से पूर्व मैं कभी पति-पत्नी के सम्बन्ध में प्रेम का इतना सुन्दर वर्णन नहीं पढ़ा था. मैं (शायद कोई भी) इस पुस्तक का उपयुक्त वर्णन नहीं कर सकता. इसे (सहजता से) पढ़ना ही एकमात्र मार्ग है. (अधिक विस्तृत व्याख्या योगेश तिवारी जी ने अपनी पुस्तक में की है: विनोद कुमार शुक्ल: खिड़की के अंदर और बाहर link) इसके अलावा अनेक गहरे विषय बहुत ही सरलता के साथ वर्णित हैं. जैसे- पर्यावरण का क्षय, संयुक्त परिवारों का टूटना, शहरों द्वारा गाँव को ग्रास बनाना, एकल परिवारों में कलह, आदि.
यह उपन्यास का सुझाव मुझे इंस्टाग्राम के द्वारा मिला था। में बहुत समय से हिंदी साहित्य को पढ़ना चाहती थी। यह काफी वर्षो के बाद मेरी पहली हिंदी उपन्यास की किताब है। इसे पढ़ने के अनुभव को में कुछ इस तरह बयां करना चाहूंगी -
किताब पढ़ते पढ़ते उपन्यास के किरदार मेरे साथ चलने लगे और मुझे पता भी न चला। किताब पढ़ने के बाद एवं उसे पूर्ण करने के बाद भी सारे किरदार मेरे पीछे चलते रहे फिर भी आभास न हुआ! इस किताब के पूर्ण होने पर मुझे इतना दुःख हुआ की उससे मेरे ह्रदय में हाथी के आकार की एक खिड़की बन गई है। उसका प्रयोग अब सोनसी और रघुवर प्रसाद व और कई किरदार आने जाने के लिए करते है। यह उन उपन्यासों में से है जो हमेशा मेरे साथ रहेगा।
विनोद कुमार शुकल ने जो जादुई दुनिया रची है, जिसमे ज्यादा कुछ होता नहीं है पर झिंदगी जादुई होने का अहसास जरूर होता है। हर सुबह, हर शाम, हर हाथी की सवारी, हर साईकिल की सवारी, हर वाकिया शुकलजी ने कुछ इस तरह बयां किआ है की वह जादुई लगाने लगता है। सोनसी और रघुवर प्रसाद का रिश्ता बेहद प्यारा है। रघुवर प्रसाद मुझे नए झमाने के शब्द का इस्तेमाल करूँ तो "pookie" लगे।
में खुद को खुशनसीब समझती हु की मुझे यह किताब पढ़ने का सुझाव मिला। यह उपन्यास विनोद कुमार शुकल की तरफ से साहित्य जगत को एक बहुत बड़ा तोहफा है। जो भी वाचक खुशनुमा, रोजमर्रा की झिंदगी को जादुई बनाती, याद करते है मुख पर मुस्कान लाने वाले उपन्यास को पढ़ना चाहते है, उन्हें यह जरूर से पढ़ना चाहिए।
उपन्यास : दीवार में एक खिड़की रहती थी रचनाकार : विनोद कुमार शुक्ल
उपन्यास की पृष्ठभूमि : ये उपन्यास एक नवविवाहित जोड़े के माध्यम से जीवन के असल सुख को दर्शाता है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए सोनसी (पत्नी) और रघुवर प्रसाद ( पति ) के जीवन से लगाव होने लगता है। मन अनायास ही कमरे में एक ऐसी खिड़की की तलाश करने लग जाता है जिससे निकल कर हम भौतिक सुख से परे आध्यात्मिक सुख की तलाश करें।
ये कहानी नवदम्पति की है। बहुत सरल शब्दों में कहूँ तो कैसे वे दोनों मिल कर अपनी गृहस्थी चलाते हैं। एक दूसरे का साथ देते हैं। जब दो लोग साथ चलते हैं तो जीवन पथ पर नए नए अनुभव को बटोरते चलते हैं। उन्हीं अनुभव की दास्तां कह लीजिए " दीवार में एक खिड़की रहती है "
कहानी का सारांश - रघुवर प्रसाद एक महाविद्यालय में गणित के व्याख्याता ( लेक्चरर ) हैं। दोनों हाथों से लिखने में महारथ हासिल है और बहुत सादा जीवन व्यापन करते हैं। उनकी पत्नी ( सोनसी ) अपने पति से बहुत प्रेम करती है। अपने बड़ो का बहुत आदर और सत्कार करती है और जीवन पथ पर हमेशा अपने पति का साथ देती है। उनके कमरे में एक खिड़की है। खिड़की को फांद कर वे दूसरी दुनिया में चले जाते हैं जहाँ बाहें फैलाये तालाब, नदी, बंदर, वृक्ष, खग, चट्टान उनकी प्रतीक्षा करते हैं। वहाँ दोनों एकांत में समय बिताते हैं, बूढ़ी अम्मा से उनकी नज़दीकियां बढ़ती हैं और वे प्रेम भी करते हैं। रास्ते में ऑटो की जगह हाथी ले लेता है। साधू नाम का एक व्यक्ति हाथी पर बै�� रघुवर प्रसाद को महाविद्यालय छोड़ने लग जाता है। उस हाथी के प्रति लगाव भी बहुत ख़ूबसूरती से दर्शाया गया है। इस कहानी में विभागाध्यक्ष हैं जिन्हें प्रकृति से प्रेम तो है परंतु ये कहना ग़लत न होगा कि वो ताज़िर भी हैं। इतनी सी कहानी है इस उपन्यास की। कोई रोचक या कोई अप्रिय घटना नहीं है यहाँ, कोई किरदार ऐसा नहीं है जिसे खलनायक का दर्ज़ा दिया जा सके। लेकिन यही इस उपन्यास की सबसे रोचक और सुंदर बात भी है। भाषा में सरलता है और शिल्प ऐसा कि आप कहानी से कभी अलगाव महसूस नहीं करेंगे।
इस उपन्यास को क्यों पढ़ें
जब कोई कहानी ऐसी आ जाती है जो आप ख़ुद देखते हैं या देख सकते हैं तो मन में इस ख़्याल का आना अनिवार्य हो जाता है कि क्यों इस कहानी को पढ़ा जाये? अपने विवेक अनुसार में जितना समझ पाया हूँ उसे कुछ बिन्दुओं में आप के सामने प्रस्तुत करता हूँ
१ - इस उपन्यास का मूल आधार है प्रेम, कहानी के शुरू से अंत तक प्रेम के अंकुरित होने से लेके प्रेम रूपी वृक्ष को फलते हुए देखना इस उपन्यास का सौंदर्य है। पति पत्नी का प्रेम, जानवरों से प्रेम, माँ बाप का बच्चों से प्रेम, अपने कर्त्तव्य से प्रेम, अकिंचन के लिए प्रेम, प्रकृति से प्रेम, किताबों से प्रेम। देखिए कितने तरह से प्रेम को जीवन का आधार मान कर हर परिस्थिति में जीवन व्यापन किया जा सकता है वो भी संतोष के साथ। इसका अनूठा उदाहरण है " दीवार में एक खिड़की रहती थी "
२- भाषा शैली - विनोद कुमार शुक्ल ने बता दिया कि संवाद कितने सरल और कितने सजीव तरीक़े से पेश किए जा सकते हैं। उन्होंने संवाद में भावनाओं का ऐसा अनूठा मिश्रण पेश किया जो इससे पहले कभी मैंने व्यक्तिगत दौर पर नहीं पढ़ा था। इसे समझने के लिए कुछ उदाहरण उपन्यास से पेश करना चाहूँगा
• “हाथी अचानक एक दिन नहीं जा सकता , वो जिस दिन जाएगा, रोज़ की तरह जाएगा" ।
शहर से अचानक ग़ायब होने के संदर्भ में साधू ओर रघुवर प्रसाद के मध्य इस वार्तालाप को परत दर परत देखने में पता लगता है कि कितनी इच्छायें, कितना लगाव और कैसी दुविधा है साधू के मन में कि सब कुछ एक बार में नहीं छोड़ा जा सकता है। शायद वो कहना चाह रहा है ज़िम्मेदारी के बोझ से नहीं भागा जा सकता है।
• प्रेम कीड़ा करते वक़्त जब रंगोली बिगड़ जाती है और "गुड़िया" ( एक छोटी बच्ची जो सदा खिड़की से झाँकती है और रघुवर प्रसाद को जानती है ) उनसे पूछती है कि ये रंगोली किसने बिगाड़ी उस समय सोनसी का बंदरों पर इल्ज़ाम लगाना और धीरे से रघुवर प्रसाद का कहना " हम फिर बिगाड़ देंगे " उनकी चंचलता की तरफ़ हमारा ध्यान केंद्रित करता है। वो अपनी पत्नी के साथ और समय बिताना चाहते हैं और उन्हें अपनी बाहों में कैद कर इस दुनिया से परे दूसरे दुनिया में ले जाना चाहते हैं।
३- इस उपन्यास में प्रेम की उतेजना, आलिंगन पाश की क्रिया, दो जिस्मों का मिलन इस ख़ूबसूरती से दर्शाया गया है कि उसकी सुंदरता भी बनी रहे और पढ़ने वालों के मध्य उपन्यास की गरिमा भी कायम रहे। उदाहरण :
• " कमरे के अन्दर के फूल की एक कली इतने एकान्त के एक क्षण को भी वे छोड़ना नहीं चाहते थे। उस बगीचे की सारी कलियों को चुन लेना चाहते थे कि सोनसी उनको गूंथे और वे सोनसी का शृंगार करें। रघुवर प्रसाद और सोनसी प्रेम का समय पा रहे थे। सोनसी एक-एक क्षणों को गूंथती और रघुवर प्रसाद सोनसी के थोड़े-थोड़े निर्वस्त्र शरीर को अलंकृत करते। सोनसी पूरी अलंकृत होकर निकली थी" ।
• "रघुवर प्रसाद ने सोनसी के कड़ों को देखा। उन्होंने दाहिने हाथ से सोनसी के बाएँ हाथ को पकड़ा। सोनसी ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की। जिससे कड़ा काली चिकनी चट्टान में खड़-खड़ घिसाता गया" । आलिंगन के क्रिया को इस तरह सुंदर संकेत द्वारा लिखना लेखनी की परिपक्वता दर्शाता है।
४- गृहस्थी के जीवन से निकलते हुए कहानी को एक अलग मोड़ पर ले जाता हुआ तीसरा सबसे प्रमुख किरदार हाथी जो सबके मन में अपने लिए एक प्रेम भरी जगह अंकित करने में क़ामयाब रहता है। मानव का आपस में प्रेम दिखाते हुए सभी पात्रों का हाथी से लगाव और उसके प्रति चिंता देखने योग्य है। सोनसी का उसको रोटी खिलाना, साधू के अभाव में नवदम्पति का उसकी देख रेख करना, महाविद्यालय में छुट्टी की अर्जी देना और उसके लिए खाने का इंतेज़ाम करना जैसे अनेक प्रसंगो द्वारा ग्रामीण जीवन में लोगों का जीव जंतुओं से जो लगाव होता है उसे भी हमारे सामने प्रस्तुत बहुत ही रोचक तरीक़े से प्रस्तुत किया है लेखक ने। उदाहरण :
५- जीवन के अनेक छोटे छोटे महत्वपूर्ण बिन्दुओं का समावेश, भावनाओं का सैलाब, ज़िम्मेदारियों का अहसास, प्रेम की पराकाष्टा ही शायद इस उपन्यास का केंद्र है।
I was quite intrigued by the title of the book, that’s why I picked up. It's originally written in Hindi, but I read the translated version. This book will take the reader to another world, provided the reader is ready to go. When I first started it, I was a bit sceptical as to where the story is going until I realised there is no story at all. The book is not about story, it's about the everyday life of a newlywed couple with a little twist. Raghuveer and Sonsi are two happy people who live a simple life. They neither dwell on past regrets nor they plan for their future. They live by the moment. It was nice to read a book which was untouched by technology. It is difficult to imagine a life without our phones, televisions, laptops, but this book would defiantly give a glimpse of that life. I can sum up this book as an afternoon dream, a beautiful one for sure.
It made me laugh out loud several times, touched my heart, made me pine for the window and the world beyond it but left me unsatisfied in the end.
Vinod Kumar Shukl have a style of writing like none other. Some of those sentences are so much fun to read again and again. His device of characters saying one thing and listening another is also very interesting. There is no plot here. This book is all slice of life and the craft of the author.
A classic of epic proportions. The narration, the magic realism, the metaphors. All in perfect Symphony to create this literary masterpiece. Highly recommended, no matter what your favourite genre is !
This book actually tests your imagination level. Its greatness depends on how well you can dive into the world of imagination. Also the word plays were so poetic i immediately fell in love with.
The book offers dreams as a content of its plot, as well as a dreaminess in how it reads. Often an otherwise normal narrative would feature something imperfect: either in the grammar of its language or in the picture that it paints. A part of me would quietly wonder how it could be so, but a dream shows no awareness of its absurdities and makes you doubt your own doubts. The rest of me went along with the plot, and soon, even that part which had stopped some way behind, maybe realising that it was on its own now, hastened and came following after. It was then only in hindsight once I had taken a break from the book that the question re-emerged: where did the plot take me? But one has to get on with their day, dreams don't deserve deliberation.
Amidst such dreaminess is set the love story of the book. The book starts with the author, Vinod Kumar Shukla, dedicating it to his wife. A short poem on companionship follows it. The first chapter introduces the protagonist to be a college lecturer, much like the author himself, who is in his early 20s and newly wed. Thereon starts the domestic love story of Raghuwar Prasad and Sonsi which moves from gradual familiarity to a firm companionship. Otherwise confined to a single-room flat in a rural town of the 90s Chhattisgarh which is often shared with visiting family members, the titular window offers them a portal to a free, kind, beautiful world endowed with natural richness, a place for them to be with just each other.
Not that the real world on the other side is unkind to them. Vinod Kumar Shukla's world, on both sides of the window, is innocent and free of malice, even if one side is much less magical. He relies on the mundane instead of the dramatic to make the world come alive. The reader peering into it might feel that it's a world of limited means, but the characters don't nurse any complaint. It's almost as if the author's own empathy, honesty, and simplicity shine through them.
Finally, we have the sadhu and his elephant, the latter being the most important character besides the married couple. It waltzes in and out of the scene and remains a constant source of intrigue for other characters as well as the reader. Like most other aspects of the story, it doesn't have any grand purpose. It is just there to be seen. And I must admit: there is always a joy in seeing an elephant.
The book is a highly experimental piece of work, nothing like any other Hindi work that I have read before. The descriptions of light, shadow, darkness, colour, and even human interactions are quite whimsical, invoking awe, amusement, and sometimes, confusion. The language is utterly simple. Even the interactions are a series of short lines rather than monologues. A few words, either spatially local to Chhattisgarh or temporally local to the 90s, may be unfamiliar but much of their meaning can be gathered from the context.
I am sure some of the essence of the book has escaped me, and I might appreciate it better if I were to discuss it with someone more familiar with Vinod Kumar Shukla's body of work. Still, I am happy with what I could gather and enjoyed the experience. Not the powerful kind to force its reader, but a gentle read that stays with you in bits and pieces like a dream you had long ago.
मुझे याद भी नहीं कि आखिरी बार मैंने कोई हिंदी पुस्तक कब पढ़ी थी। इस किताब की अनेकों प्रशंसाओं को सुनने के बाद मैंने इसे पढ़ने का निर्णय लिया। तब मुझे ये नहीं पता था कि ये हमेशा के लिए मेरे दिल में एक बहुत प्यारी जगह बना लेगी। विभिन्न भावनाओं से मैं इस तरह सराबोर हो चुकी हूं कि व्यक्त करने को शब्द भी कम भी कम पड़ जाएं। (जितनी हिंदी स्कूल में पढ़ी थी,उसका उपयोग कर अपने भावों को शब्द देने का ये प्रयत्न किया है मैंने। 🤭🥺)
विनोद कुमार शुक्ल जी का ये उपन्यास, सिर्फ़ एक कहानी नहीं है, यह जीवन को कविता की नज़र से देखने का अनुभव है। उनकी लेखनी बेहद सरल, सहज और पारदर्शी है, लेकिन उसी सादगी में गहरी संवेदनाएँ और अर्थ छिपे हैं। इस उपन्यास की सबसे ख़ूबसूरत बात है इसकी सरलता और काव्यात्मक व्याख्या। खिड़की यहाँ सिर्फ़ एक खिड़की नहीं रहती, बल्कि सपनों, स्मृतियों और कल्पनाओं का रास्ता बन जाती है। हाथी की छवि भी कहीं दूर से आती हुई गहरी और भव्य प्रतीत होती है - जैसे जीवन का कोई बड़ा, रहस्यमय रूप हमारे सामने खड़ा हो।
शुक्ल जी की भाषा का सौंदर्य इस बात में है कि यह पाठक को कठिनाई में नहीं डालती, बल्कि सहजता से बहा ले जाती है। साधारण घटनाएँ और दृश्य, उनकी कलम से निकलकर, असाधारण बन जाते हैं। किताब के पन्नों पर बिखरे हुए कई वाक्य-खंड और उद्धरण इतने सुंदर हैं कि उन्हें बार-बार पढ़ने का मन करता है। 💕
दीवार में एक खिड़की रहती थी हमें यह एहसास कराती है कि जीवन की साधारण-सी दीवारें, खिड़कियाँ और क्षण, जब कवि की दृष्टि से देखे जाएँ, तो कितने जादुई और अर्थपूर्ण हो सकते हैं। यह पुस्तक धीमे-धीमे पढ़ने और आत्मसात करने लायक है - जैसे कोई शांत संध्या, जिसमें हर छाया और हर आवाज़ जीवंत लगती है। ✨
अगर आप हिंदी साहित्य में रुचि रखते हैं,या कभी आप अपने पूरे जीवन में सिर्फ एक हिन्दी भाषा में लिखी किताब पढ़ना चाहें,तो "दीवार में एक खिड़की रहती थी" को जरूर पढ़े! 💌
क्या कमाल है, बीना किसी बहुत महत्वपूर्ण घटना के रघुवर प्रसाद और सोनसी की ज़िंदगी कितनी आराम से अपने कल्पना के खिड़की 🪟 से आना जाना करती है। अद्भुत और कल्पना के स्तर को आसमान तक ले जाने वाली उपन्यास। लेखनी ने जिस तरह शब्दों की दुनिया को अपने रंगों से भरा है ऐसा लगता है जैसे आप किसी जंगल से गुज़र रहे हो और आपके बगल से पानी को धारा बह रही हो और सिर्फ़ पक्षियों,जानवरों, पेड़ पौधों और पानी के कल कल की आवाज़ आपके कानों को मद्धिम से एहसास करा रही हो।
छत्तीसगढ़ में बचपन बिताया है मैंने तो कई शब्द मुझे मेरे बचपन के तरफ़ ले जाने में भी मदद करते हुए लगे जो खूबसूरत था ।
ये किताब मेरी पहली हिंदी की किताब है । सोच रही हूँ की ऐसा क्यों ही हुआ ,की लगभग १५ वर्ष लग गए इस हिंदी की किताब को पहला बनने में । क्या हमें ऐसा समझने में समय लग गया या पुरानी डब्बे में फसी सोच में से निकलने में देर हुई । क्या कहीं ना कहीं हम पे कोलोनियल रंग को अब जंग लगी और वो परत अब नई तरक़्क़ी और देश में जाग रहे विश्वास के आगे बह गई ।
पर मुझे ख़ुशी है की आख़िर ये रत्न मुझे मिला , कोहिनूर से कम नहीं लगा । मैं अपने आस पास लोगों को इसकी रोशनी बता पाऊँगी और शायद कोहिनूर के जाने का दुख कुछ बाँट पाऊँगी।
शायद मैंने काफ़ी दिनों में पहली हिन्दी की ऐसी किताब पढ़ी है जिसमें "जादुई यथार्थवाद" (Magic Realism) है, वो भी विनोद कुमार शुक्ल के मरणोपरांत। इसमें Magic Realism के साथ-साथ सरल जीवन की एक खूबसूरत एवं दार्शनिक व्याख्या है, जो शायद इस उपन्यास को थोड़ी अलग बनाती है। Wish to read more of Hindi literature in the coming months!
If there is a book in this world i want to keep on reading again and again , it is this. The beautiful story and it's characters and the magic they weave around themselves. The description of the surroundings and the story, ohh everything is so simply magical. A story of a man and a woman in humble surroundings with a little magical realism around. What's not to love.
‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ विनोद कुमार शुक्ल की कल्पना और संवेदना की एक विलक्षण उड़ान है। "खिड़की" लेखक की दृष्टि है, एक ऐसी दृष्टि जो सामान्य और नीरस को असाधारण बना देती है। "खिड़की" प्रतीक बन जाती है उम्मीद, आज़ादी और कल्पना का।
यह किताब असल में किसी कहानी से ज़्यादा एक अनुभूति है।
हिंदी में लोगों के प्रेमचंद के ऊपर नीचे कुछ समझ नहीं आता. यार और भी लोग अच्छा लिख लेते हैं. हम भी लिखेंगे किसी दिन. पर अभी तो शुक्ल जी की बात करनी है. शुक्ल जी ने जाने क्या ही लिख दिया है पर अच्छा है.
इनका लिखने का तरीका वाकई अजीबोगरीब है. मतलब एक महाविद्यालय में एक व्याख्याता हैं – रघुवर प्रसाद और उनकी पत्नी हैं सोनसी. दोनों बहुत ही ग्रामीण परिवेश में, एक साधारण से घर में रहते हैं. घर में एक खिड़की है जिस से कूद के निकल जाओ तो बाहर नदी बहती है, तालाब है, बन्दर हैं, बुढ़िया है, और जाने क्या क्या है. रघुवर को महाविद्यालय ले जाने के लिए कभी कभी साधू बाबा हाथी पे आते हैं. सबकुछ अमूर्त और भावात्मक सा लगता है. शब्द बहुत ज्यादा जाने पहचाने हैं.
पुस्तक में कोई दुखद घटना नहीं है. कोई कहानी ही नहीं है. बस दो लोग जी रहे हैं और हमें आपको उन्हें देखना है. जीते हुए. और फिर भी ये पढ़ना आपके लिए एक अविस्मरणीय घटना होगी. आप याद रखेंगे हर उस छोटे छोटे मोटिफ को जो लेखक ने इस्तेमाल किया है. अपनी बात कहने के लिए या कभी कभी ना कहने के लिए. गूलर के पेड़ पे बैठा बच्चा बीड़ी पीता हुआ अपने पिता से छुपकर, एक पति जो अपनी पत्नी से प्रेम करता है, ऐसा निष्कपट प्रेम जो आपसे सपने में बातें करवाता है.
एक विभागाध्यक्ष साहब जो जब चाहे तब छुट्टी दे देते हैं. आपको महाविद्यालय से घर छोड़ देते हैं. आपके जीवन में हस्तक्षेप करते हैं उसी तरह जैसे कोई बड़ा भाई करेगा. पड़ोसी जो आपके दरवाज़े का ध्यान रखते हैं. ये छोटे शहरों का, भोले लोगों का उपन्यास है. दुर्गन्ध यहाँ सिर्फ बस स्टैंड पे निवास करती है क्यूंकि बस स्टैंड सूचक है बाहरी दुनिया का. यहाँ की दुनिया में तो फूल है, हवा है, और दूर कहीं होते हवन की महक है.
इस पुस्तक की भाषा में ही कहूँ तो जब आप इसे पढ़ेंगे तो आपके सामने इसके शब्द होंगे. शब्द न होने से पहले आपके सामने वह चित्र होगा जिसमे वो शब्द नहीं होंगे. पर उन शब्दों की आहट होगी. फिर थोड़ी समय में आप होंगे और शब्द होंगे. और वह चित्र इंतजार करेगा जब आप पुस्तक बंद करेंगे. पुस्तक अलग रखते ही फिर चित्र होगा. और शब्द फिर भी होंगे पर चित्र भी होगा.
तो ऐसी कुछ एबस्ट्रेक्ट सी भाषा है जिसका अर्थ है भी और न भी हो तो मज़ा तो है.