"दीवार में एक खिड़की रहती थी" (उपन्यास) और "सब कुछ होना बचा रहेगा" (कविता-संग्रह) पढ़ने के बाद मुझे कुछ अधूरा लग रहा था. जिस दृष्टि से शुक्ल जी (और उनके पात्र) जीवन को देखते हैं, वह पूर्णतः समझ में नहीं आ रहा था. बहुत से प्रश्न थे, जैसे- उनकी कविताओं के और खण्डों के नाम इतने लम्बे और विचित्र क्यों होते हैं, पात्रों की प्रेरणा कब और कहाँ से मिली, आदि. योगेश तिवारी जी की लिखी ये टिप्पणियां पढ़ कर उनमें से बहुत से प्रश्नों के उत्तर मिल गए.