साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार के साथ दैनिक जागरण बेस्टसेलर रहने वाला अतुल कुमार राय का ये पहला उपन्यास आपको शानदार कथानक से रूबरू करवाता है, जो समकालीन उपन्यासों में कम देखने को मिलता है।
Atul Kumar Rai is a popular Hindi author, blogger, novelist, and screenwriter. He has got a different identity due to his unique style of writing, His many blogs have also been published by the big newspapers and magazines of India, due to which India’s most popular publisher has published their first Novel ‘Chandpur ki Chanda’ which is available on all online platforms. Apart from this Atul Kumar Rai is a Musician too, he has done his Post Graduation in Music from Banaras Hindu University. Also qualified UGC NET. Currently, he is living in Mumbai and writing stories, screenplay, and dialogue for Films and web series
अतुल कुमार राय एक लोकप्रिय हिंदी लेखक, ब्लॉगर, उपन्यासकार और पटकथा लेखक हैं। उनकी लेखन की अनूठी शैली के कारण उन्हें एक अलग पहचान मिली है, उनके कई ब्लॉग भारत के बड़े समाचार पत्रों और पत्रिकाओं द्वारा भी प्रकाशित किए गए हैं, जिसके कारण भारत के सबसे लोकप्रिय प्रकाशक ने अतुल का पहला उपन्यास ‘चांदपुर की चंदा’ प्रकाशित किया है जो उपलब्ध है अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल, ऑडिबल पर।
इसके अलावा अतुल कुमार राय एक संगीतकार भी हैं, उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर किया है। साथ ही यूजीसी नेट क्वालिफाई किया। फिलहाल वह मुंबई में रह रहे हैं और फिल्मों और वेब श्रृंखलाओं के लिए कहानियां, पटकथा और संवाद लिख रहे हैं।
ग्रामीण जीवन के सभी रंगों को समेटे हुए यह उपन्यास आपको हंसाती भी है रुलाती भी है और गांव समाज की समस्याओं पर सोचने को मजबूर भी करती हैं। उपन्यास की कथा इतनी कसी हुई है की पढ़ते हुए एक बार भी रुकने का मन नही करता। पढ़ते हुए ऐसा लगता है की सारे दृश्य आखों के घूम रहे हो। लेखक ने गांव के तीज त्योहार शादी ब्याह के जोश और उत्साह का जितनी सहजता से वर्णन किया है उनती ही सहजता के साथ शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाएं, बाढ़ की समस्या और राहत शिविरों में होने वाले भ्रष्टाचार से लेकर दहेज प्रथा और लड़कियों की दयनीय स्थिति जैसे गंभीर मुद्दे को साथ उठाया है। जिस तरह से चांदपुर की चंदा महादेवी वर्मा को अपना आदर्श मानकर अपने हक के लिए आवाज़ उठाती है और अपने जैसी कई चंदाओ के भविष्य के लिए सपने देखती है उसी प्रकार से चंदा को अपना आदर्श बनाकर उनके जैसी कई लड़कियों का जीवन सुधर जाएं। इसी उम्मीद के साथ ये कहना गलत नही होगा की ये उपन्यास जरूर पढ़ा जाना चाहिए।
ग्राम जिसमें एक समाज रहता है, उस समाज के युवा जब राजनीति के शिकार होकर दिशाहीन होते हैं; तब गांव में खिलते पुष्पों का जीवन दूभर हो जाता है। एक ऐसे ही ग्रामीण जीवन में खिलते प्रेम की कथा है "चाँदपुर की चंदा"।
समाज जिसे मानव सभ्यता का आधार माना गया था, जिसका कार्य था एक दूसरे के सुख दुख में साथ निभाना। जब वही समाज एक दूसरे को सुखी देख जलने भुनने लगे तब दूषित हो उठता है।
अपनी राजनीति को चमकाने में लगे युवा नेता, जब गांव के युवाओं को नशे में डुबाने लगें, तब उस गांव का दम घुटने लगता है।
इस तरह का माहौल आज हर गांव का है। ऐसे ही गांव में जब दो युवाओं के हृदय में प्रेम के पुष्प खिलते हैं, तो बदनाम करने वाली सहस्त्रों आवाज़ गूंजने लगती हैं।
चंदा के हृदय में भी शशि के लिए प्रेम जागा है। पर उसने गांव की बेटियों को दहेज़ के बोझ में झुलसते भी देखा है। वह चाहती है गांव की बेटियों को पढ़ाना, उन्हें सशक्त बनाना।
इसी चाह और हृदय की गांठ को सुलझाती कहानी है, चंदा की।
मैं बहुत लंबे समय के बाद हिंदी साहित्य पढ़ने के लिए उत्साहित थी और मुझे कहना होगा कि इसे पढ़ते समय मुझे बिल्कुल भी निराशा नहीं हुई। चांदपुर की चंदा अतुल कुमार राय का 2023 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता उपन्यास है। लेखक आपको पूर्वांचल की ग्रामीण पृष्ठभूमि की सामाजिक समरसता, रीति-रिवाजों और बोलियों से भली-भांति परिचित कराता है। उन्होंने न केवल गांव की सुंदरता और सादगी का चित्रण किया बल्कि स्वास्थ्य देखभाल की कमी और अनुचित शिक्षा प्रणाली जैसी समस्याओं का भी उल्लेख किया। मंटू और उसकी प्रेमिका चंदा की कहानी के माध्यम से उन्होंने समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति, दहेज प्रथा की क्रूरता और लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध के बारे में भी बात की. अनेक सामाजिक सन्देशों से युक्त यह कहानी सरल एवं सुन्दर है तथा पाठकों को मंत्रमुग्ध करने में सक्षम है।
मैंने ये किताब कल रात खत्म की। अगर आप उत्तर प्रदेश या बिहार से हैं तो आप इस किताब से और भी ज़्यादा जुड़ाव महसूस करेंगे। कहानी पिंकी और मंटू की है, पिंकी ही चांदपुर की चंदा है। इस कहानी के ज़रिए औरतों की स्थिति, दहेज प्रथा, महिलाओं की शिक्षा जैसी कई अहम मुद्दों को उठाया गया है। एक बार जब आप इस किताब को पढ़ना शुरू करते हैं, तो आप इसमें खो जाते हैं। मुझे लेखन शैली बेहद पसंद आई, लेखक ने गांव के हर किरदार को बहुत खूबसूरती से और अलग-अलग ढंग से दर्शाया है।
*Chandpur Ki Chanda*, the debut novel by Atul Kumar Rai, is one of those rare stories that leave a lasting impact. I finished it in just two days, completely immersed in the world of Mantu, Chanda, and the village of Chandpur. The way the author brings the setting to life, from its rustic charm to its deeply rooted emotions, is truly commendable.
The characterization is on point—Mantu, Chanda, Rakesh, and the other characters feel incredibly real. The love story, the heartfelt love letters, and the raw emotions woven into the narrative make this book unforgettable. Some moments moved me to tears, and it’s been a long time since a love story touched my heart this deeply.
Romantic and rural narratives often run the risk of feeling repetitive, but this book does everything right. While there might be minor flaws, the sheer emotional depth of Mantu and Chanda’s story overshadowed any imperfections. If you enjoy Hindi literature, this is an absolute must-read!
जब कोई किताब किसी को अच्छी लगती है और वो बाकी लोगों को उसे पढ़ने का सुझाव देता है तो जाहिर सा एक प्रश्न आता है कि आपको इसमें क्या अच्छा लगा,ऐसा क्या था इसमें?
लेकिन इस पुस्तक के सन्दर्भ मे ये प्रश्न उचित नही बैठता, क्योंकि इसमें सब है। इसमें प्रेम है, इसमें विरह है, इसमें हास्य है, इसमें व्यंग है, इसमें कटाक्ष है, इसमें थ्रील है। अंग्रेजी मे एक शब्द है "कम्पलीट पैकेज", इस शब्द को इस पुस्तक के पीछे जोड़ दे तो अनुचित नही होगा।
साधारणतया जब मैं युवा (असली युवा, राजनैतिक पचास वर्षीय युवा नही ) लेखक की रचना पढ़ता हूँ तो वो एक स्टोरी टेलिंग होती है, उसके वाक्यों मे गूढता न होती है ना ही आपेक्षित होती है। परन्तु इस पुस्तक ने इस क्षेत्र मे भी बाजी मारी है, एक युवा लेखक द्वारा इतनी गूढ बातें लिखना सराहनीय है। लेखक ने शायद जीवन को महीनता से समझने का प्रयास किया है।
एक बात जो बढ़ते वक्त हिट करती रही कि लेखक ने पुस्तक की रूप रेखा तैयार करने मे बढ़िया चतुराई दिखाई है। जब कहानी थोड़ी गंभीर होने लगती है तो वो बहुत देर तक नही खिचती, थोड़ी देर बाद बड़े ही सरलता से उसमे हास्य अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता है। इससे एक औसत पाठक भी दिलचस्पी से कहानी के अंत तक बना रह सकता है।
इस किताब को पढ़ने के बाद एक और अच्छी बाद हुई कि हिन्द युग्म प्रकाशन की किताब फिर से उठाई जा सकती है। फिर से कहने का तात्पर्य ये है कि कुछ दिनों पहले एक हिन्द युग्म की ऐसी पुस्तक उठा ली थी जो इतने निचले दर्जे की थी कि वो क्योँ लिखी गई, कैसे लिखी गई, कैसे प्रकाशित हुई समझ के परे था, हिन्द युग्म की क्रेडिबिल्टी पर संदेह होने लगा था। इस किताब ने पुनः इस प्रकाशन पर विश्वास पैदा करने मे मदद की।
खैर, निष्कर्ष ये है कि किताब सौ प्रतिशत पठिनय है.. इसमें सब है ये सबके लिए है।
बेहद प्रशंसनीय उपन्यास। कहानी में आप खुद को डूबा हुआ पाते हैं। जैसे जैसे कथानक आगे बढ़ता है,आप चांदपुर में अपने को बैठा हुआ महसूस करते हैं। लेखक की शब्दों से छवि बनाने की कला शानदार है।
चांदपुर की चंदा कहानी है बलिया जिले के चांदपुर गाँव के मंटू और चंदा की जो स्कूल में एक साथ पढ़ते हैं। मंटू को चंदा से प्यार होता है और कहानी के बहुत शुरू में ही चंदा को भी मंटू से प्यार हो जाता है। उसके बाद कहानी में ऐसे उतार चढ़ाव आते है जिसकी वजह से यह दोनों प्रेमी एक दूसरे से दूर हो जाते हैं और फिर अथक प्रयास करते रहते हैं एक दूसरे तक वापिस आने की। इस प्रेम कहानी के समानांतर में लेखक ने पुरुष प्रधान गांव की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला हैं जहां पर लड़कियों की जिंदगी बिलकुल भी आसान नहीं है। हर घर में लड़कियों को बोझ समझा जाता है और जैसे तैसे भी उसकी शादी करके निपटारा किया जाता है । कहानी के माध्यम से लेखक ने भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों जैसे दहेज उत्पीड़न, लड़कियों की पढ़ाई, उनके आत्म निर्भर होने में आने वाली कठिनाइयों इत्यादि का बहुत ही विस्तार से वर्णन किया है। शुरू में लगती है की किताब एक प्रेम कहानी होगी लेकिन आगे चलकर इस कहानी को आगे बढ़ाने में मंटू का उतना हाथ नहीं होता जितना चंदा का होता है।
कहानी चंदा के जीवन में उत्पन्न हो रहे समस्याओं और साथ साथ गांव की बाकी लड़कियों के साथ हो रहे अन्याय के इर्द गिर्द घूमती है। किताब का अंत सुखद है लेकिन ऐसा लगता है जैसे लेखक और लिखना नहीं चाहते थे इसीलिए अचानक से कहानी एक सुखद मोड़ ले लेती है। आखिरी परिणाम को थोड़ा और रोचक बनाया जा सकता था लेकिन फिर भी यह किताब आपको बोर नहीं करती।
थोड़ी लम्बी जरूर है लेकिन पढ़ने योग्य है। आजकल के नये हिंदी लेखकों की जितनी भी किताबें मैंने पढ़ी उनमें यह काफी बेहतर लगी मुझे। कहानी को आगे बढ़ाने का तरीका अच्छा है, शब्दों और बोली का अच्छा उपयोग किया है, सीधी सीधी लिखी हुई लाईनें नहीं है जैसा अक्सर आजकल की किताबों में होता है। कुल मिलाकर एक अच्छा उपन्यास है जिसे बेहिचक पढ़ा जा सकता है।
एक शानदार रचना। इसमें अतुल कुमार राय जी ने पाठकों को अंत तक बांधे रखा । गाँव की एकता को बहुत ही उत्कृष्ट तरीक़े से दर्शाया है । साथ ही राजनीतिक कटाक्ष भी किया है । यह किताब आपको कई बात भावुक एवं सोचने पर विवश कर देती है । पिछले कुछ समय की सबसे बेहतरीन पुस्तक।
Never judge a book by its title. I picked this up after reading a very heavy non-fiction book, purely based on the title thinking it's a pulp fiction and will provide me with a quick bout of Joy.
But boy I couldn't have been more wrong. The book takes me to the places that have been long forgotten. They exist in a parallel India that almost never crosses the path with the urbans. You don't see them mention the paper either during and election campaign or after a tragic incident as their non-existent for the substantial part.
The book reminded me of rural India from the likes of Mulk Raj Anand, Prem Chandra but in a much more contemporary settings.
The book takes you to the journey of all the nine emotions and leaves you wanting for more. There is a surreal fluidity to the flow that keeps the reader engaged. Tragedy is so palpable that when the book concludes you feel relieved.
The author leaves you presently surprised by his focus on the detail and closure for so many of the characters that appear trivial during the narrative.
In a Life full of challenges, tragedies, lost hopes, loneliness and miseries be a Chanda.
नदी के किनारे एक गाँव में यह प्रेम की ऐसी कहानी है जो आपको हँसाएगी भी, रुलाएगी भी, समझाएगी भी, और हमारे समाज की असलियत दिखाएगी भी। यह कहानी कहने को तो चंदपुर की चंदा की है, पर असल में यह कहानी हर उस स्त्री की है जो आज भी "पिछड़ी" सोच से ग्रस्त लोगों से भरे समाज में अपना सिर ऊंचा करके रहती है। अब यह "पिछड़ी" सोच क्या है? यह मान लेना कि बेटी की पढ़ाई से ज़्यादा ज़रूरी है बेटी की सगाई। यह मान लेना कि पल्लू सही जगह रखना बेटी का काम है, पर अपनी निगाहों पर नियंत्रण रखना उनके बेटों का काम नहीं। बेटियों का स्थान तो चूल्हे-चौके पर है, और बेटों का स्थान चाय की टपरियों पर।
जब आप इस उपन्यास के द्वारा चंदपुर घूमने जाएंगे, तो आप पाएंगे खुद को मुख़ातिब होते उन आम समस्याओं से, जो चंदपुर जैसे गाँवों को आज भी जकड़े बैठी हैं, जबकि शहरी लोग उन समस्याओं को जानते तक नहीं। बस यही सब कुछ तो है इस किताब में, जो आपको इसे उठाकर पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। और हाँ, एक बात और—अगर इस किताब को पढ़ने से पहले आप महादेवी वर्मा जी को नहीं जानते, तो जान जाएंगे। तो देर किस बात की? जाग, तुझको दूर जाना।
"चाँदपुर की चंदा" को पढ़ने के बाद जो सबसे पहला विचार आता है वह यह, "शब्द अतुल जी की कलम से निकले हैं और कागज़ पर स्याही की खुशबू रेणु-जी की सी है।" शायद इससे बेहतर तरीके से मैं "चाँदपुर की चंदा" को परिभाषित नहीं कर सकता था। लेकिन यह तो हुई बात थोड़े परिष्कृत शब्दों में। पर अगर अतुल जी को दिल से कुछ कहना हो तो कहूँगा- "भैया जी, गर्दा उड़ा दिये!!"
किसी भी लेखन की उत्कृष्टता की पराकाष्ठा का एक आयाम यह भी है कि कहानी में समय, स्थान और समाज को कैसे निरूपित किया गया है। प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि उन्होंने समय, स्थान और समाज को पन्नों पर उतार दिया। और अतुल जी के लिखे में समय, स्थान और समाज, तीनों ही, कहानी में समाकलित चरित्रों की भाँति उभरते दिखते हैं। आप भारत में किसी भी कोने चले जाईये, यहाँ कस्बों, अंचलों का अपना एक किरदार होता है जो वहाँ रहने वालों की आँखों से लेकर रहने बतियाने के ढ़ंग में, पुरजोर छलक मारता है। और ह्यूमर तो इन कस्बों की मानो बपौती है। हर कहीं का अपना अलग फ्लेवर है पर भाव वही है। बिना फ़िल्टर, बेधड़क। शायद इसलिए क्योंकि ह्यूमर से जीवन सरल, सरस बना रहता है। हँसी-ठट्ठे में बड़ी-बड़ी मुसीबतें भी खेल लगने लगती हैं। अक्सर जब लोग अपने भाग्य और दुखों पर फूटकर रो नहीं पाते तो हँसने लग जाते हैं। ये यहाँ का डिफेंस-मेकेनिज़्म है। चाँदपुर भी ऐसा ही है। अपनी तमाम विषमताओं और सामाजिक उधेड़-बुन में उलझे हुए भी, खुली बाहों से आपका स्वागत करता है। आप चाहें तो फूँकन की दुकान पर कुमार सानू या मनोज तिवारी जी के गाने सुनते हुये चाँदपुर से दुनिया-ज़माने की बतकही कर सकते हैं। "चाँदपुर.." की कहानी को चार चाँद लगाते हैं चाँदपुर के चार चाँद (ये तो चिंगारी जी की कविता सा कुछ हो गया, ख़ैर..)। पहला तो चाँद, चाँदपुर खुद्दे है। दूसरा वो, जो सांझ ढले सरयू जी की सतह पर चित्रकारी करता-मिटाता रहता है। तीसरा, गोल चेहरे वाला मंटू। बबुआ इस्क हो तो मंटू जैसा हो। पूरब टोले के मंटू के ऑडियो प्लेयर से जो धाराप्रवाह प्रेम का राग उमड़ता है वह सुनामी से कम नहीं। और चौथा चाँद है, उत्तर टोला वाली चंदा। यही वो भूकंप हैं जो सुनामी का कारण हैं। पर चंदा सिर्फ किसी कैशोर्य से गुज़रती लड़की से कहीं बढ़कर है। एक तूफान संभाले बैठी है भीतर। यह तूफान हर उस लड़की का है जो समर्थ भी है और प्रतिभाशाली भी, पर समाज के सदियों पुराने रिवाज़ एक ना दिखने वाले पिंजरे की तरह उसे क़ैद किये हुए हैं। अंग्रेज़ी में कहते हैं, 'ग्लास सीलिंग��'
अतुल जी ने उपन्यास भर नहीं लिखा, पूरी झांकी लगा दी है अंचल की। निहायती खूबसूरत। आप अपने हिस्से की कहानी ढूंढ़ कर जी लीजिए। सब है यहाँ, परीक्षा में होने वाली नकल के रॅकेट, पाॅलिटिक्स, गांव की रामलीला, दहेज प्रथा, हौसले तोड़ डालने वाली बाढ़ और प्रेम.. निश्छल, नैसर्गिक प्रेम। यहाँ टिंडर और बंबल की इंस्टेंट सैटिंग नहीं है। दिल को कागज़ पर रख देने वाले पत्रों का पत्राचार है। प्रेम, जिसमें महीनों सिर्फ़ एक उत्तर की प्रतीक्षा में बीत जाते हैं। जिन्होंने प्रेम किया है(सचमुच का), उन्हें पता है पिया मिलन की आस प्रेम में सबसे खूबसूरत होती है। शायद, पिया और पिया मिलन से भी ज़्यादा।
दृश्यों की तुरपाई भी बड़ी कारीगरी से की गई है। गानों के द्वारा समय और मनोस्थिति का चित्रण कमाल है। और है निपट, शुद्ध, हंसी, ठहाके और आँसू। पढ़िये, बहुत कुछ दे जायेगा, चाँदपुर आपको।
चाँदपुर की चंदा (Chandpur Ki Chanda) by @author.atul
Ratings: 5/5 ⭐
I think we should also give equal focus to our own literature. Reading our regional and national works helps us understand our culture, our past, and the struggles that shaped us. Though Hindi is not my mother tongue, as an Indian I am trying to devote more time to Indian literature because it brings me closer to the soil and voices of my people. Chandpur ki Chanda is one such book that made me reflect deeply on rural realities and social issues.
Atul Kumar Rai’s Chandpur ki Chanda is a rural novel set in the heart of an Indian village. Through its characters and setting, it portrays the socio-economic challenges, traditions, and aspirations of common people. The story revolves around Mantu and Pinki, whose innocent love faces hurdles created by societal norms, power structures, and the persistence of injustice in rural life. Alongside, the novel highlights issues such as corruption, the dowry system, local politics, and the struggles of ordinary villagers against oppression, while also preserving the beauty of rural culture and values.
✍️ Personal Note:
I found it a little difficult at first to read because of the heavy use of rural dialects, but gradually I got used to it. And once I did, I realized how powerful the writing is — it vividly shows how social injustice prevailed in rural areas, how people fought against it, and how, amidst it all, the innocent love between Mantu and Pinki shines through. For me, it’s a 5-star read.
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना! जाग तुझको दूर जाना! पर तुझे है नाश पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना! जाग तुझको दूर जाना!
महादेवी वर्मा जी की यह कविता, उपन्यास की नायिका पिंकी उर्फ कुमारी चंदा पर एकदम सटीक बैठती है। पढ़ने में तेज, सिलाई-कढ़ाई में आगे, संगीत में निपुण, वो सारे गुण चंदा में हैं जो गाँव की एक कन्या में कूट-कूट के भरा होता है, पर कहते हैं न जीवन इतना आसान कहां प्यारे। वैसे ही चंदा के जीवन में भी परेशानियाँ ऐसे घेर कर बैठी है जैसे उनका अपना घर हो।
उपन्यास का नायक मंटू , एक आवारा किस्म का लड़का जो सुबह के दस बजे सो कर उठता है और दस बारह दिन में स्कूल जाता है, उसको कुमारी चंदा से प्यार हो जाता है। फिर आगे की कहानी कहती है यह उपन्यास... सामाजिक कुरीतियाँ, गाँव की राजनीति, लड़कियों के प्रति समाज की निम्न सोच, दहेज प्रथा से प्रताड़ित युवतियां , वो सबकुछ जो गाँवों में या फिर छोटे-छोटे शहरों में नहीं होनी चाहिए पर होती है।अतुल जी ने बखूबी तरीके से लिखा है। अतुल कुमार राय जी द्वारा लिखित यह उपन्यास बेहद सरल भाषी है, सहज भाव से और इतनी गहराई में सारी चीज़ों का चित्रण किया है और उनकी मज़बूत शैली वाकई में क़ाबिले तारीफ़ है। राय जी की लेखनी में ग्रामीण जीवन का मार्मिक चित्रण बेहद ही पसंदीदा हिस्सा रहा मेरा। आप सब भी पढ़िए इस उपन्यास को और अपने भाव प्रकट करिए।
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना! जाग तुझको दूर जाना! पर तुझे है नाश पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना! जाग तुझको दूर जाना!
महादेवी वर्मा जी की यह कविता, उपन्यास की नायिका पिंकी उर्फ कुमारी चंदा पर एकदम सटीक बैठती है। पढ़ने में तेज, सिलाई-कढ़ाई में आगे, संगीत में निपुण, वो सारे गुण चंदा में हैं जो गाँव की एक कन्या में कूट-कूट के भरा होता है, पर कहते हैं न जीवन इतना आसान कहां प्यारे। वैसे ही चंदा के जीवन में भी परेशानियाँ ऐसे घेर कर बैठी है जैसे उनका अपना घर हो।
उपन्यास का नायक मंटू , एक आवारा किस्म का लड़का जो सुबह के दस बजे सो कर उठता है और दस बारह दिन में स्कूल जाता है, उसको कुमारी चंदा से प्यार हो जाता है। फिर आगे की कहानी कहती है यह उपन्यास... सामाजिक कुरीतियाँ, गाँव की राजनीति, लड़कियों के प्रति समाज की निम्न सोच, दहेज प्रथा से प्रताड़ित युवतियां , वो सबकुछ जो गाँवों में या फिर छोटे-छोटे शहरों में नहीं होनी चाहिए पर होती है।अतुल जी ने बखूबी तरीके से लिखा है। अतुल कुमार राय जी द्वारा लिखित यह उपन्यास बेहद सरल भाषी है, सहज भाव से और इतनी गहराई में सारी चीज़ों का चित्रण किया है और उनकी मज़बूत शैली वाकई में क़ाबिले तारीफ़ है। राय जी की लेखनी में ग्रामीण जीवन का मार्मिक चित्रण बेहद ही पसंदीदा हिस्सा रहा मेरा। आप सब भी पढ़िए इस उपन्यास को और अपने भाव प्रकट करिए।
चाँदपुर की चन्दा” पढ़ते समय ऐसा लगा जैसे मैं किसी कहानी को नहीं, बल्कि किसी अपने को देख रही हूँ। चन्दा का मासूमपन, उसकी छोटी-छोटी खुशियाँ, और उसके भीतर का साफ दिल—यह सब मेरे दिल को गहराई तक छू गया।
कई बार पढ़ते-पढ़ते मैं रुक गई… चन्दा की सोच, उसके सपने, और उसके हालात देखकर लगा कि दुनिया इतनी बड़ी नहीं होती, जितना बड़ा एक बच्चे का दिल होता है। उसकी तकलीफ़ें किसी अजनबी की नहीं लगतीं—ऐसा महसूस होता है जैसे वह मेरे ही घर की बच्ची हो, जिसके लिए मैं खुद कुछ अच्छा होने की उम्मीद करती रहूँ। अतुल कुमार राय ने चाँदपुर के माहौल को जिस सादगी से लिखा है, उससे पूरा गाँव आँखों के सामने उतर आता है—कच्चे रास्ते, लोगों की बोली, घरों की गर्माहट, और जिंदगी की कड़वी-सच्ची बातें। और इन सबके बीच चन्दा… जो अपनी छोटी उम्र में ही बहुत कुछ झेलती है, पर फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ती।
कहानी खत्म होने के बाद भी दिल भरा-भरा सा रहा। एक हल्की सी उदासी… और साथ ही एक नरम-सी मुस्कान कि चन्दा जैसी मासूमियत आज भी दुनिया में कहीं न कहीं बची है।
यह किताब सिर्फ पढ़ी नहीं जाती, महसूस होती है—और खत्म होने के बाद भी दिल में बहुत देर तक रहती है। मेरे लिए “चाँदपुर की चन्दा” एक कहानी नहीं, एक अनुभव है।
I listened to this book in audible and the story and narrator did a great job. Throughout the story, we can see the unwavering love of Mantu towards Pinky. This takes place in a village named Chandpur, and a bit of comparison between village and city people. The book focuses mostly on Pinky's life and the difficulties faced by her in her household. At last, it delivers the message that a girl's decision or opinion is crucial in her life whether it's related to marriage or education, and how some households don't ask for the girl's opinion in marriage, and also discusses the problems of how boys are viewed in present-day society. It was fun listening to the audio book and if we are from an Indian household we can relate to it even more even though we are living in the modern-day world.
यह प्रेम कथा पर आधारित उपन्यास जिस मैं पूर्वांचल के आंचलिक भाषा का प्रयोग एवं उसके प्राकृतिक सौंदर्य का बहुत ही सुंदर वर्णन है लेखक ने पूर्वांचल के जन जीवन का बाढ़ एवं गरीबी से उनके संघर्ष को सूचित किया है साथ ही वहां की गिर रही शिक्षा पद्धति का भी वर्णन किया है
इस पुस्तक की काफ़ी तारीफ़ सुनी थी। सोचा था अन्य समानांतर उपन्यासों की भाँति इस��ें भी हम खोते ही जाएँगे। पर कहानी इतनी धीमी चल रही थी और रसहीन महसूस हो रही थी, कि १०% पढ़ने के बाद ही हथियार डालने को मजबूर होना पड़ा। डार्क हॉर्स, या बनारस टॉकीज काफ़ी बेहतर है। श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी भी उत्तम है। इसे फिर किसी दिन के लिए रखते हैं :)
One of the better creations in contemporary Hindi Literature. Replete with local and regional flavour, dialect and custom , the story goes on to portray a inimitableindian village. Great poetess Mahadevi Verma has been strewn beautifully adding an enchanting flavourto the story.
Yehi to hota aaya hai, ladkiyan biya di jati hai naukri se dukano se zameen jaydad se lekin wo biyahi nahi jati aapne premio se, ko sath hai wo pyar mein nahi or jo pyar mein hai wo sath nahi.
I would say a must read for every Hindi reader. What a beautiful book, and amazing work of Atul sir. You will fall in love with characters and with their simplicity, especially Rakesh, Jhanjha baba, Khedan. A rollercoaster of emotions. Masterpiece ✨