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Chandpur Ki Chanda । चाँदपुर की चंदा
साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार के साथ दैनिक जागरण बेस्टसेलर रहने वाला अतुल कुमार राय का ये पहला उपन्यास आपको शानदार कथानक से रूबरू करवाता है, जो समकालीन उपन्यासों में कम देखने को मिलता है।
- GenresFictionIndian Literature
287 pages, Paperback
First published January 16, 2022
About the author
Atul Kumar Rai
2 books21 followersAtul Kumar Rai is an award-winning Indian Hindi novelist, lyricist, and screenwriter based in Mumbai, originally hailing from Ballia, Uttar Pradesh.
His debut novel, Chandpur Ki Chanda, won the prestigious Sahitya Akademi Yuva Puraskar (2023) and was honored with the Jagran Kriti Bestseller Award (2025) presented by the Union Home Minister of India.
Deeply rooted in the soil, Atul believes in telling stories and penning lyrics that capture the true essence, folk flavor, and human emotions of heartland India. His screen work includes dialogue writing for the Hindi film Sherdil: The Pilibhit Saga (2022) and Audible Originals, with more feature films and web series currently in the pipeline.
Apart from writing, he holds a Master’s degree in Music from Banaras Hindu University and is UGC NET qualified."
His debut novel, Chandpur Ki Chanda, won the prestigious Sahitya Akademi Yuva Puraskar (2023) and was honored with the Jagran Kriti Bestseller Award (2025) presented by the Union Home Minister of India.
Deeply rooted in the soil, Atul believes in telling stories and penning lyrics that capture the true essence, folk flavor, and human emotions of heartland India. His screen work includes dialogue writing for the Hindi film Sherdil: The Pilibhit Saga (2022) and Audible Originals, with more feature films and web series currently in the pipeline.
Apart from writing, he holds a Master’s degree in Music from Banaras Hindu University and is UGC NET qualified."
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Community Reviews
Displaying 1 - 30 of 43 reviews
January 26, 2022
ग्रामीण जीवन के सभी रंगों को समेटे हुए यह उपन्यास आपको हंसाती भी है रुलाती भी है और गांव समाज की समस्याओं पर सोचने को मजबूर भी करती हैं। उपन्यास की कथा इतनी कसी हुई है की पढ़ते हुए एक बार भी रुकने का मन नही करता। पढ़ते हुए ऐसा लगता है की सारे दृश्य आखों के घूम रहे हो। लेखक ने गांव के तीज त्योहार शादी ब्याह के जोश और उत्साह का जितनी सहजता से वर्णन किया है उनती ही सहजता के साथ शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाएं, बाढ़ की समस्या और राहत शिविरों में होने वाले भ्रष्टाचार से लेकर दहेज प्रथा और लड़कियों की दयनीय स्थिति जैसे गंभीर मुद्दे को साथ उठाया है।
जिस तरह से चांदपुर की चंदा महादेवी वर्मा को अपना आदर्श मानकर अपने हक के लिए आवाज़ उठाती है और अपने जैसी कई चंदाओ के भविष्य के लिए सपने देखती है उसी प्रकार से चंदा को अपना आदर्श बनाकर उनके जैसी कई लड़कियों का जीवन सुधर जाएं। इसी उम्मीद के साथ ये कहना गलत नही होगा की ये उपन्यास जरूर पढ़ा जाना चाहिए।
जिस तरह से चांदपुर की चंदा महादेवी वर्मा को अपना आदर्श मानकर अपने हक के लिए आवाज़ उठाती है और अपने जैसी कई चंदाओ के भविष्य के लिए सपने देखती है उसी प्रकार से चंदा को अपना आदर्श बनाकर उनके जैसी कई लड़कियों का जीवन सुधर जाएं। इसी उम्मीद के साथ ये कहना गलत नही होगा की ये उपन्यास जरूर पढ़ा जाना चाहिए।
January 14, 2025
ग्राम जिसमें एक समाज रहता है, उस समाज के युवा जब राजनीति के शिकार होकर दिशाहीन होते हैं; तब गांव में खिलते पुष्पों का जीवन दूभर हो जाता है। एक ऐसे ही ग्रामीण जीवन में खिलते प्रेम की कथा है "चाँदपुर की चंदा"।
समाज जिसे मानव सभ्यता का आधार माना गया था, जिसका कार्य था एक दूसरे के सुख दुख में साथ निभाना। जब वही समाज एक दूसरे को सुखी देख जलने भुनने लगे तब दूषित हो उठता है।
अपनी राजनीति को चमकाने में लगे युवा नेता, जब गांव के युवाओं को नशे में डुबाने लगें, तब उस गांव का दम घुटने लगता है।
इस तरह का माहौल आज हर गांव का है। ऐसे ही गांव में जब दो युवाओं के हृदय में प्रेम के पुष्प खिलते हैं, तो बदनाम करने वाली सहस्त्रों आवाज़ गूंजने लगती हैं।
चंदा के हृदय में भी शशि के लिए प्रेम जागा है। पर उसने गांव की बेटियों को दहेज़ के बोझ में झुलसते भी देखा है। वह चाहती है गांव की बेटियों को पढ़ाना, उन्हें सशक्त बनाना।
इसी चाह और हृदय की गांठ को सुलझाती कहानी है, चंदा की।
समाज जिसे मानव सभ्यता का आधार माना गया था, जिसका कार्य था एक दूसरे के सुख दुख में साथ निभाना। जब वही समाज एक दूसरे को सुखी देख जलने भुनने लगे तब दूषित हो उठता है।
अपनी राजनीति को चमकाने में लगे युवा नेता, जब गांव के युवाओं को नशे में डुबाने लगें, तब उस गांव का दम घुटने लगता है।
इस तरह का माहौल आज हर गांव का है। ऐसे ही गांव में जब दो युवाओं के हृदय में प्रेम के पुष्प खिलते हैं, तो बदनाम करने वाली सहस्त्रों आवाज़ गूंजने लगती हैं।
चंदा के हृदय में भी शशि के लिए प्रेम जागा है। पर उसने गांव की बेटियों को दहेज़ के बोझ में झुलसते भी देखा है। वह चाहती है गांव की बेटियों को पढ़ाना, उन्हें सशक्त बनाना।
इसी चाह और हृदय की गांठ को सुलझाती कहानी है, चंदा की।
September 22, 2023
मैं बहुत लंबे समय के बाद हिंदी साहित्य पढ़ने के लिए उत्साहित थी और मुझे कहना होगा कि इसे पढ़ते समय मुझे बिल्कुल भी निराशा नहीं हुई।
चांदपुर की चंदा अतुल कुमार राय का 2023 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता उपन्यास है।
लेखक आपको पूर्वांचल की ग्रामीण पृष्ठभूमि की सामाजिक समरसता, रीति-रिवाजों और बोलियों से भली-भांति परिचित कराता है।
उन्होंने न केवल गांव की सुंदरता और सादगी का चित्रण किया बल्कि स्वास्थ्य देखभाल की कमी और अनुचित शिक्षा प्रणाली जैसी समस्याओं का भी उल्लेख किया।
मंटू और उसकी प्रेमिका चंदा की कहानी के माध्यम से उन्होंने समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति, दहेज प्रथा की क्रूरता और लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध के बारे में भी बात की.
अनेक सामाजिक सन्देशों से युक्त यह कहानी सरल एवं सुन्दर है तथा पाठकों को मंत्रमुग्ध करने में सक्षम है।
चांदपुर की चंदा अतुल कुमार राय का 2023 साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता उपन्यास है।
लेखक आपको पूर्वांचल की ग्रामीण पृष्ठभूमि की सामाजिक समरसता, रीति-रिवाजों और बोलियों से भली-भांति परिचित कराता है।
उन्होंने न केवल गांव की सुंदरता और सादगी का चित्रण किया बल्कि स्वास्थ्य देखभाल की कमी और अनुचित शिक्षा प्रणाली जैसी समस्याओं का भी उल्लेख किया।
मंटू और उसकी प्रेमिका चंदा की कहानी के माध्यम से उन्होंने समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति, दहेज प्रथा की क्रूरता और लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध के बारे में भी बात की.
अनेक सामाजिक सन्देशों से युक्त यह कहानी सरल एवं सुन्दर है तथा पाठकों को मंत्रमुग्ध करने में सक्षम है।
March 18, 2025
*Chandpur Ki Chanda*, the debut novel by Atul Kumar Rai, is one of those rare stories that leave a lasting impact. I finished it in just two days, completely immersed in the world of Mantu, Chanda, and the village of Chandpur. The way the author brings the setting to life, from its rustic charm to its deeply rooted emotions, is truly commendable.
The characterization is on point—Mantu, Chanda, Rakesh, and the other characters feel incredibly real. The love story, the heartfelt love letters, and the raw emotions woven into the narrative make this book unforgettable. Some moments moved me to tears, and it’s been a long time since a love story touched my heart this deeply.
Romantic and rural narratives often run the risk of feeling repetitive, but this book does everything right. While there might be minor flaws, the sheer emotional depth of Mantu and Chanda’s story overshadowed any imperfections. If you enjoy Hindi literature, this is an absolute must-read!
The characterization is on point—Mantu, Chanda, Rakesh, and the other characters feel incredibly real. The love story, the heartfelt love letters, and the raw emotions woven into the narrative make this book unforgettable. Some moments moved me to tears, and it’s been a long time since a love story touched my heart this deeply.
Romantic and rural narratives often run the risk of feeling repetitive, but this book does everything right. While there might be minor flaws, the sheer emotional depth of Mantu and Chanda’s story overshadowed any imperfections. If you enjoy Hindi literature, this is an absolute must-read!
August 28, 2022
जब कोई किताब किसी को अच्छी लगती है और वो बाकी लोगों को उसे पढ़ने का सुझाव देता है तो जाहिर सा एक प्रश्न आता है कि आपको इसमें क्या अच्छा लगा,ऐसा क्या था इसमें?
लेकिन इस पुस्तक के सन्दर्भ मे ये प्रश्न उचित नही बैठता, क्योंकि इसमें सब है। इसमें प्रेम है, इसमें विरह है, इसमें हास्य है, इसमें व्यंग है, इसमें कटाक्ष है, इसमें थ्रील है। अंग्रेजी मे एक शब्द है "कम्पलीट पैकेज", इस शब्द को इस पुस्तक के पीछे जोड़ दे तो अनुचित नही होगा।
साधारणतया जब मैं युवा (असली युवा, राजनैतिक पचास वर्षीय युवा नही ) लेखक की रचना पढ़ता हूँ तो वो एक स्टोरी टेलिंग होती है, उसके वाक्यों मे गूढता न होती है ना ही आपेक्षित होती है। परन्तु इस पुस्तक ने इस क्षेत्र मे भी बाजी मारी है, एक युवा लेखक द्वारा इतनी गूढ बातें लिखना सराहनीय है। लेखक ने शायद जीवन को महीनता से समझने का प्रयास किया है।
एक बात जो बढ़ते वक्त हिट करती रही कि लेखक ने पुस्तक की रूप रेखा तैयार करने मे बढ़िया चतुराई दिखाई है। जब कहानी थोड़ी गंभीर होने लगती है तो वो बहुत देर तक नही खिचती, थोड़ी देर बाद बड़े ही सरलता से उसमे हास्य अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता है। इससे एक औसत पाठक भी दिलचस्पी से कहानी के अंत तक बना रह सकता है।
इस किताब को पढ़ने के बाद एक और अच्छी बाद हुई कि हिन्द युग्म प्रकाशन की किताब फिर से उठाई जा सकती है। फिर से कहने का तात्पर्य ये है कि कुछ दिनों पहले एक हिन्द युग्म की ऐसी पुस्तक उठा ली थी जो इतने निचले दर्जे की थी कि वो क्योँ लिखी गई, कैसे लिखी गई, कैसे प्रकाशित हुई समझ के परे था, हिन्द युग्म की क्रेडिबिल्टी पर संदेह होने लगा था। इस किताब ने पुनः इस प्रकाशन पर विश्वास पैदा करने मे मदद की।
खैर, निष्कर्ष ये है कि किताब सौ प्रतिशत पठिनय है.. इसमें सब है ये सबके लिए है।
लेकिन इस पुस्तक के सन्दर्भ मे ये प्रश्न उचित नही बैठता, क्योंकि इसमें सब है। इसमें प्रेम है, इसमें विरह है, इसमें हास्य है, इसमें व्यंग है, इसमें कटाक्ष है, इसमें थ्रील है। अंग्रेजी मे एक शब्द है "कम्पलीट पैकेज", इस शब्द को इस पुस्तक के पीछे जोड़ दे तो अनुचित नही होगा।
साधारणतया जब मैं युवा (असली युवा, राजनैतिक पचास वर्षीय युवा नही ) लेखक की रचना पढ़ता हूँ तो वो एक स्टोरी टेलिंग होती है, उसके वाक्यों मे गूढता न होती है ना ही आपेक्षित होती है। परन्तु इस पुस्तक ने इस क्षेत्र मे भी बाजी मारी है, एक युवा लेखक द्वारा इतनी गूढ बातें लिखना सराहनीय है। लेखक ने शायद जीवन को महीनता से समझने का प्रयास किया है।
एक बात जो बढ़ते वक्त हिट करती रही कि लेखक ने पुस्तक की रूप रेखा तैयार करने मे बढ़िया चतुराई दिखाई है। जब कहानी थोड़ी गंभीर होने लगती है तो वो बहुत देर तक नही खिचती, थोड़ी देर बाद बड़े ही सरलता से उसमे हास्य अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता है। इससे एक औसत पाठक भी दिलचस्पी से कहानी के अंत तक बना रह सकता है।
इस किताब को पढ़ने के बाद एक और अच्छी बाद हुई कि हिन्द युग्म प्रकाशन की किताब फिर से उठाई जा सकती है। फिर से कहने का तात्पर्य ये है कि कुछ दिनों पहले एक हिन्द युग्म की ऐसी पुस्तक उठा ली थी जो इतने निचले दर्जे की थी कि वो क्योँ लिखी गई, कैसे लिखी गई, कैसे प्रकाशित हुई समझ के परे था, हिन्द युग्म की क्रेडिबिल्टी पर संदेह होने लगा था। इस किताब ने पुनः इस प्रकाशन पर विश्वास पैदा करने मे मदद की।
खैर, निष्कर्ष ये है कि किताब सौ प्रतिशत पठिनय है.. इसमें सब है ये सबके लिए है।
November 9, 2024
बेहद प्रशंसनीय उपन्यास। कहानी में आप खुद को डूबा हुआ पाते हैं। जैसे जैसे कथानक आगे बढ़ता है,आप चांदपुर में अपने को बैठा हुआ महसूस करते हैं। लेखक की शब्दों से छवि बनाने की कला शानदार है।
May 24, 2023
चांदपुर की चंदा कहानी है बलिया जिले के चांदपुर गाँव के मंटू और चंदा की जो स्कूल में एक साथ पढ़ते हैं। मंटू को चंदा से प्यार होता है और कहानी के बहुत शुरू में ही चंदा को भी मंटू से प्यार हो जाता है। उसके बाद कहानी में ऐसे उतार चढ़ाव आते है जिसकी वजह से यह दोनों प्रेमी एक दूसरे से दूर हो जाते हैं और फिर अथक प्रयास करते रहते हैं एक दूसरे तक वापिस आने की। इस प्रेम कहानी के समानांतर में लेखक ने पुरुष प्रधान गांव की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला हैं जहां पर लड़कियों की जिंदगी बिलकुल भी आसान नहीं है। हर घर में लड़कियों को बोझ समझा जाता है और जैसे तैसे भी उसकी शादी करके निपटारा किया जाता है । कहानी के माध्यम से लेखक ने भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों जैसे दहेज उत्पीड़न, लड़कियों की पढ़ाई, उनके आत्म निर्भर होने में आने वाली कठिनाइयों इत्यादि का बहुत ही विस्तार से वर्णन किया है। शुरू में लगती है की किताब एक प्रेम कहानी होगी लेकिन आगे चलकर इस कहानी को आगे बढ़ाने में मंटू का उतना हाथ नहीं होता जितना चंदा का होता है।
कहानी चंदा के जीवन में उत्पन्न हो रहे समस्याओं और साथ साथ गांव की बाकी लड़कियों के साथ हो रहे अन्याय के इर्द गिर्द घूमती है। किताब का अंत सुखद है लेकिन ऐसा लगता है जैसे लेखक और लिखना नहीं चाहते थे इसीलिए अचानक से कहानी एक सुखद मोड़ ले लेती है। आखिरी परिणाम को थोड़ा और रोचक बनाया जा सकता था लेकिन फिर भी यह किताब आपको बोर नहीं करती।
थोड़ी लम्बी जरूर है लेकिन पढ़ने योग्य है। आजकल के नये हिंदी लेखकों की जितनी भी किताबें मैंने पढ़ी उनमें यह काफी बेहतर लगी मुझे। कहानी को आगे बढ़ाने का तरीका अच्छा है, शब्दों और बोली का अच्छा उपयोग किया है, सीधी सीधी लिखी हुई लाईनें नहीं है जैसा अक्सर आजकल की किताबों में होता है। कुल मिलाकर एक अच्छा उपन्यास है जिसे बेहिचक पढ़ा जा सकता है।
कहानी चंदा के जीवन में उत्पन्न हो रहे समस्याओं और साथ साथ गांव की बाकी लड़कियों के साथ हो रहे अन्याय के इर्द गिर्द घूमती है। किताब का अंत सुखद है लेकिन ऐसा लगता है जैसे लेखक और लिखना नहीं चाहते थे इसीलिए अचानक से कहानी एक सुखद मोड़ ले लेती है। आखिरी परिणाम को थोड़ा और रोचक बनाया जा सकता था लेकिन फिर भी यह किताब आपको बोर नहीं करती।
थोड़ी लम्बी जरूर है लेकिन पढ़ने योग्य है। आजकल के नये हिंदी लेखकों की जितनी भी किताबें मैंने पढ़ी उनमें यह काफी बेहतर लगी मुझे। कहानी को आगे बढ़ाने का तरीका अच्छा है, शब्दों और बोली का अच्छा उपयोग किया है, सीधी सीधी लिखी हुई लाईनें नहीं है जैसा अक्सर आजकल की किताबों में होता है। कुल मिलाकर एक अच्छा उपन्यास है जिसे बेहिचक पढ़ा जा सकता है।
September 2, 2026
i liked this book, good to read, with social message, friendship, village life background, parivesh, challenges, quite good to read
October 5, 2026
चाँदपुर की चंदा - 4.2/5
कुछ किताबें पढ़ते हुए लगता है कि हम कहानी पढ़ रहे हैं, और कुछ किताबों में ऐसा लगता है जैसे किसी गाँव की गली में बैठकर लोगों को आते-जाते देख रहे हों। अतुल कुमार राय की चाँदपुर की चंदा मेरे लिए दूसरी तरह की किताब रही। यह सिर्फ मंटू और चंदा की प्रेम कहानी नहीं है। प्रेम तो यहां दरवाजा है, जिसके भीतर जाने के बाद पूरा चाँदपुर दिखाई देने लगता है।
चाँदपुर, बलिया का वह गाँव जो हर साल बाढ़ में डूबता है, इस उपन्यास का सिर्फ स्थान नहीं है। वह लगभग एक जीवित पात्र है। उसकी मिट्टी, बोली, रिश्ते, राजनीति, गरीबी, त्योहार, शादी-ब्याह, स्कूल, अस्पताल, बाढ़ और छोटी-छोटी खुशियां मिलकर उस दुनिया को बनाते हैं जिसमें कहानी सांस लेती है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी है। लेखक ने गाँव को न तो सिर्फ खूबसूरत बना दिया है और न ही सिर्फ दुखों का संग्रहालय। यहां लोग हंसते भी हैं, प्रेम भी करते हैं, चुगली भी करते हैं, राजनीति भी करते हैं और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के साथ खड़े भी होते हैं।
मंटू और चंदा की कहानी पहली नजर में बहुत सीधी लगती है। दो युवा, एक गाँव, दोस्ती और धीरे-धीरे प्रेम में बदलता रिश्ता। लेकिन जिस समाज में ये दोनों रहते हैं, वहां प्रेम सिर्फ दो लोगों के बीच की निजी चीज नहीं रह जाता। परिवार, पैसा, सामाजिक प्रतिष्ठा, लड़की होने की सीमाएं, शादी और दहेज, सब धीरे-धीरे उस प्रेम के भीतर घुस आते हैं। यही वह जगह है जहां उपन्यास सामान्य प्रेम कहानी से आगे निकलता है।
मुझे मंटू का किरदार चंदा की तुलना में थोड़ा कमजोर लगा। वह बुरा पात्र नहीं है, बल्कि कहानी की भावनात्मक धुरी का एक जरूरी हिस्सा है, लेकिन कई जगह मुझे लगा कि लेखक के पास मंटू से ज्यादा महत्वपूर्ण बातें चंदा के माध्यम से कहने के लिए हैं। मंटू का प्रेम सहज और मासूम है, लेकिन चंदा की दुनिया कहीं ज्यादा कठिन है। वह सिर्फ प्रेमिका नहीं है। उसके सामने गरीबी, सामाजिक अपेक्षाएं, लड़की होने की मजबूरियां और अपने भविष्य को लेकर सवाल हैं।
और शायद इसी वजह से चंदा इस किताब का सबसे याद रहने वाला पात्र बन जाती है।
चंदा को पढ़ते हुए मुझे सबसे ज्यादा यह महसूस हुआ कि वह उन हजारों लड़कियों की प्रतिनिधि है जिनके सपने बहुत बड़े नहीं होते, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए भी उन्हें अपने आसपास की पूरी व्यवस्था से लड़ना पड़ता है। उसकी इच्छाएं असाधारण नहीं हैं। वह सम्मान चाहती है, पढ़ना चाहती है, अपने जीवन के बारे में फैसला करना चाहती है और अपने लिए एक बेहतर भविष्य देखना चाहती है। लेकिन ग्रामीण समाज में एक लड़की के लिए ये सामान्य इच्छाएं भी कई बार विद्रोह बन जाती हैं।
यहीं मुझे उपन्यास का सामाजिक पक्ष सबसे ज्यादा प्रभावी लगा।
लेखक ने दहेज और बेटियों के प्रति भेदभाव को किसी भाषण की तरह नहीं लिखा है। ये चीजें कहानी के जीवन का हिस्सा बनकर आती हैं। यही वजह है कि असर ज्यादा होता है। जब किसी किताब में लेखक अचानक कहता है कि समाज में दहेज गलत है, तो बात थोड़ी उपदेश जैसी लग सकती है। लेकिन जब आप देखते हैं कि वही व्यवस्था किसी परिवार के फैसले बदल रही है, किसी लड़की के भविष्य को सीमित कर रही है या किसी रिश्ते को प्रभावित कर रही है, तब बात कहीं ज्यादा भीतर जाती है।
इसी तरह शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था, बाढ़ और राहत शिविरों में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे भी कहानी में मौजूद हैं। चाँदपुर हर साल बाढ़ से जूझता है, लेकिन बाढ़ सिर्फ पानी नहीं लाती। वह गरीबी, प्रशासनिक लापरवाही और असमानता को भी सामने ला देती है। जिन लोगों के पास पहले से कम है, उनके लिए एक आपदा का अर्थ बाकी लोगों से बिल्कुल अलग होता है।
मुझे यह हिस्सा खास तौर पर अच्छा लगा क्योंकि लेखक ने गाँव की समस्याओं को किसी दूर बैठे शहरी पर्यवेक्षक की तरह नहीं देखा। भाषा और वातावरण में स्थानीय अनुभव दिखाई देता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की बोली और बोलचाल उपन्यास को उसकी अपनी आवाज देती है। शुरुआत में इस भाषा की लय पकड़ने में थोड़ा समय लगा, लेकिन एक बार अभ्यस्त होने के बाद यही भाषा किताब का सबसे बड़ा आकर्षण लगने लगी।
और यहां अतुल कुमार राय की सबसे बड़ी ताकत सामने आती है।
वह गांव को सिर्फ हिंदी में नहीं लिखते, गांव की आवाज में लिखने की कोशिश करते हैं।
मुहावरे, बातचीत, मजाक, ताने, स्थानीय संदर्भ और लोगों के बोलने का तरीका कहानी को किताब से निकालकर हमारे सामने खड़ा कर देते हैं। कई संवाद पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि इन्हें किसी लेखक ने बनाया नहीं है, बल्कि कहीं सुनकर लिख लिया है। मेरे लिए regional fiction की यही सबसे खूबसूरत चीज है।
चाँदपुर की चंदा को पढ़ते हुए मुझे कई बार प्रेमचंद की याद आई, लेकिन यह प्रेमचंद का गांव नहीं है। समय बदल चुका है। यहां मोबाइल है, सोशल मीडिया है, आधुनिक शिक्षा की आकांक्षा है, लेकिन उसके साथ वही पुराने सामाजिक ढांचे भी हैं। पुराना और नया एक ही जगह पर खड़े हैं।
यही शायद इस उपन्यास की असली दुनिया है।
एक तरफ मोबाइल और वायरल प्रेम-पत्र है, दूसरी तरफ दहेज और पितृसत्ता। एक तरफ लड़कियां पढ़ना चाहती हैं, दूसरी तरफ उनके भविष्य का फैसला परिवार करता है। एक तरफ गांव बदलना चाहता है, दूसरी तरफ राजनीति और व्यवस्था उसे उसी जगह खींचकर ले आती है।
यह विरोधाभास किताब को दिलचस्प बनाता है।
मुझे यह भी पसंद आया कि राजनीति कहानी में अलग से चिपकाई हुई चीज नहीं लगती। गांव की राजनीति आखिर गांव के जीवन से अलग कैसे हो सकती है? कौन किसके साथ है, किसका प्रभाव है, किसके पास पैसा है, किसकी पहुंच है, किसकी आवाज सुनी जाएगी, ये सब प्रेम और परिवार तक को प्रभावित करते हैं।
यही वजह है कि चाँदपुर की चंदा को सिर्फ “village romance” कहना मुझे थोड़ा कम करना लगता है।
यह rural social fiction भी है।
यह coming-of-age story भी है।
यह प्रेम कहानी भी है।
और कुछ हद तक यह उस छोटे से भारत का दस्तावेज भी है जिसे बड़े शहरों की भाषा में अक्सर सिर्फ “rural India” कहकर छोड़ दिया जाता है।
एक और चीज जो मुझे अच्छी लगी, वह है उपन्यास का humour। इतनी सारी गंभीर समस्याओं के बीच किताब पूरी तरह बोझिल नहीं हो जाती। गांव के लोग सिर्फ दुख झेलने के लिए मौजूद नहीं हैं। वे मजाक करते हैं, प्रेम करते हैं, लड़ते हैं, उत्सव मनाते हैं और अपनी परेशानियों के बीच भी जिंदगी को किसी तरह आगे बढ़ाते हैं।
यही चीज किताब को ज्यादा मानवीय बनाती है।
हालांकि मेरे लिए किताब पूरी तरह flawless नहीं थी।
सबसे बड़ी समस्या कुछ जगहों पर इसकी गति लगी। शुरुआत में लेखक कई पात्रों, स्थानों और परिवेश को काफी विस्तार से स्थापित करते हैं। कुछ पाठकों को यह immersion बहुत पसंद आएगा, लेकिन मेरे लिए कुछ हिस्से थोड़े खिंचे हुए महसूस हुए। कुछ जगहों पर लगा कि कहानी को आगे बढ़ाने के लिए उतने लंबे विवरण की जरूरत नहीं थी।
मंटू के साथ भी मेरी यही समस्या रही। चंदा के सामने उसका व्यक्तित्व कई बार थोड़ा फीका पड़ जाता है। मैं उसके प्रेम को समझता हूं, लेकिन उसकी आंतरिक दुनिया से उतना जुड़ नहीं पाया जितना चंदा से।
और शायद यही वजह है कि मेरे लिए इस किताब की सबसे बड़ी कहानी मंटू और चंदा का romance नहीं बल्कि चंदा की अपनी जिंदगी बन जाती है।
किताब के अंत तक मुझे यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगा कि चंदा अपने जीवन के साथ क्या करेगी, बजाय इसके कि मंटू और चंदा आखिर साथ होंगे या नहीं।
यह एक अच्छी बात है।
क्योंकि अगर प्रेम कहानी ही पूरी किताब का उद्देश्य होती, तो उपन्यास काफी छोटा हो सकता था।
लेकिन लेखक ने प्रेम को बहाना बनाकर एक पूरा सामाजिक संसार खड़ा किया है।
मुझे विशेष रूप से वह विचार पसंद आया कि चंदा सिर्फ अपने लिए नहीं, अपने जैसी दूसरी लड़कियों के लिए भी सपने देखती है। यहां महादेवी वर्मा का प्रभाव और चंदा का उनसे जुड़ाव भी अर्थपूर्ण लगता है। शिक्षा और आत्मनिर्भरता उसके लिए सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं बल्कि अपने आसपास की लड़कियों के भविष्य से जुड़ी चीज बन जाती है।
और शायद इसी वजह से उसका चरित्र किताब खत्म होने के बाद भी साथ रहता है।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि मेरे लिए इसकी “बड़ी कहानी” नहीं बल्कि छोटी-छोटी चीजें हैं।
गांव की सुबह।
बाढ़।
स्कूल।
शादियां।
त्योहार।
रिश्तेदारों की बातचीत।
प्रेम-पत्र।
गांव की राजनीति।
लड़कियों को लेकर परिवार की चिंता।
दहेज की चर्चा।
राहत शिविर।
और उन सबके बीच किसी का चुपचाप अपने भविष्य के बारे में सपना देखना।
इन चीजों से मिलकर चाँदपुर बनता है।
और जब किताब खत्म होती है तो लगता है कि कहानी खत्म हुई है, चाँदपुर नहीं।
यही regional literature की खूबसूरती है। वह हमें ऐसे स्थानों के भीतर ले जाता है जिनके बारे में हम शायद अखबारों या नक्शों में पढ़ते हैं, लेकिन जिनकी असली जिंदगी नहीं जानते।
चाँदपुर की चंदा मुझे इसलिए अच्छी लगी क्योंकि इसने गांव को nostalgia का postcard नहीं बनाया।
यहां मिट्टी की खुशबू भी है और कीचड़ भी।
प्रेम भी है और मजबूरी भी।
हंसी भी है और गरीबी भी।
त्योहार भी हैं और दहेज भी।
सपने भी हैं और उन्हें तोड़ने वाली व्यवस्था भी।
और शायद गांव को देखने का इससे ज्यादा ईमानदार तरीका यही है।
अगर मैं इसे सिर्फ प्रेम कहानी मानकर पढ़ता, तो शायद मेरी rating थोड़ी कम होती। लेकिन एक ग्रामीण सामाजिक उपन्यास के रूप में इसे देखने पर इसकी कई खूबियां सामने आती हैं।
यह बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने वाली किताब नहीं है। इसकी ताकत इसकी सहजता में है।
कभी-कभी यह बहुत बोलती है, कभी-कभी थोड़ा ज्यादा घूमती है, लेकिन इसकी आवाज अपनी है।
और आज जब हिंदी में बहुत-सी कहानियां शहरी middle-class दुनिया के इर्द-गिर्द घूमती हैं, तब चाँदपुर की चंदा जैसी किताब का आना जरूरी लगता है। यह हमें याद दिलाती है कि भारत सिर्फ महानगरों, corporate offices और शहरों की कहानी नहीं है।
भारत उन चाँदपुरों से भी बना है जहां हर साल बाढ़ आती है, जहां प्रेम-पत्र मोबाइल से वायरल हो सकता है लेकिन प्रेम को स्वीकार करना अभी भी आसान नहीं है, जहां लड़की के सपने परिवार की आर्थिक स्थिति से टकराते हैं और जहां राजनीति घर के भीतर तक पहुंचती है।
मेरे लिए चाँदपुर की चंदा की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह मुझे चाँदपुर से मिलवाती है।
और चंदा से भी।
मंटू और चंदा का प्रेम इस कहानी का सबसे आकर्षक हिस्सा हो सकता है, लेकिन उसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद वह लड़की है जो अपने आसपास की सीमाओं को पहचानती है और फिर भी सपने देखना बंद नहीं करती।
4.2/5 stars.
एक प्यारी, मिट्टी से जुड़ी, थोड़ी लंबी लेकिन बेहद जीवंत कहानी। प्रेम के बहाने गांव, समाज, राजनीति, गरीबी और लड़कियों के सपनों की दुनिया दिखाने वाला उपन्यास। हर हिस्सा मुझे समान रूप से मजबूत नहीं लगा, लेकिन चंदा और चाँदपुर दोनों को छोड़ना आसान नहीं था।
कुछ किताबें पढ़ते हुए लगता है कि हम कहानी पढ़ रहे हैं, और कुछ किताबों में ऐसा लगता है जैसे किसी गाँव की गली में बैठकर लोगों को आते-जाते देख रहे हों। अतुल कुमार राय की चाँदपुर की चंदा मेरे लिए दूसरी तरह की किताब रही। यह सिर्फ मंटू और चंदा की प्रेम कहानी नहीं है। प्रेम तो यहां दरवाजा है, जिसके भीतर जाने के बाद पूरा चाँदपुर दिखाई देने लगता है।
चाँदपुर, बलिया का वह गाँव जो हर साल बाढ़ में डूबता है, इस उपन्यास का सिर्फ स्थान नहीं है। वह लगभग एक जीवित पात्र है। उसकी मिट्टी, बोली, रिश्ते, राजनीति, गरीबी, त्योहार, शादी-ब्याह, स्कूल, अस्पताल, बाढ़ और छोटी-छोटी खुशियां मिलकर उस दुनिया को बनाते हैं जिसमें कहानी सांस लेती है। यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी है। लेखक ने गाँव को न तो सिर्फ खूबसूरत बना दिया है और न ही सिर्फ दुखों का संग्रहालय। यहां लोग हंसते भी हैं, प्रेम भी करते हैं, चुगली भी करते हैं, राजनीति भी करते हैं और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के साथ खड़े भी होते हैं।
मंटू और चंदा की कहानी पहली नजर में बहुत सीधी लगती है। दो युवा, एक गाँव, दोस्ती और धीरे-धीरे प्रेम में बदलता रिश्ता। लेकिन जिस समाज में ये दोनों रहते हैं, वहां प्रेम सिर्फ दो लोगों के बीच की निजी चीज नहीं रह जाता। परिवार, पैसा, सामाजिक प्रतिष्ठा, लड़की होने की सीमाएं, शादी और दहेज, सब धीरे-धीरे उस प्रेम के भीतर घुस आते हैं। यही वह जगह है जहां उपन्यास सामान्य प्रेम कहानी से आगे निकलता है।
मुझे मंटू का किरदार चंदा की तुलना में थोड़ा कमजोर लगा। वह बुरा पात्र नहीं है, बल्कि कहानी की भावनात्मक धुरी का एक जरूरी हिस्सा है, लेकिन कई जगह मुझे लगा कि लेखक के पास मंटू से ज्यादा महत्वपूर्ण बातें चंदा के माध्यम से कहने के लिए हैं। मंटू का प्रेम सहज और मासूम है, लेकिन चंदा की दुनिया कहीं ज्यादा कठिन है। वह सिर्फ प्रेमिका नहीं है। उसके सामने गरीबी, सामाजिक अपेक्षाएं, लड़की होने की मजबूरियां और अपने भविष्य को लेकर सवाल हैं।
और शायद इसी वजह से चंदा इस किताब का सबसे याद रहने वाला पात्र बन जाती है।
चंदा को पढ़ते हुए मुझे सबसे ज्यादा यह महसूस हुआ कि वह उन हजारों लड़कियों की प्रतिनिधि है जिनके सपने बहुत बड़े नहीं होते, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए भी उन्हें अपने आसपास की पूरी व्यवस्था से लड़ना पड़ता है। उसकी इच्छाएं असाधारण नहीं हैं। वह सम्मान चाहती है, पढ़ना चाहती है, अपने जीवन के बारे में फैसला करना चाहती है और अपने लिए एक बेहतर भविष्य देखना चाहती है। लेकिन ग्रामीण समाज में एक लड़की के लिए ये सामान्य इच्छाएं भी कई बार विद्रोह बन जाती हैं।
यहीं मुझे उपन्यास का सामाजिक पक्ष सबसे ज्यादा प्रभावी लगा।
लेखक ने दहेज और बेटियों के प्रति भेदभाव को किसी भाषण की तरह नहीं लिखा है। ये चीजें कहानी के जीवन का हिस्सा बनकर आती हैं। यही वजह है कि असर ज्यादा होता है। जब किसी किताब में लेखक अचानक कहता है कि समाज में दहेज गलत है, तो बात थोड़ी उपदेश जैसी लग सकती है। लेकिन जब आप देखते हैं कि वही व्यवस्था किसी परिवार के फैसले बदल रही है, किसी लड़की के भविष्य को सीमित कर रही है या किसी रिश्ते को प्रभावित कर रही है, तब बात कहीं ज्यादा भीतर जाती है।
इसी तरह शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था, बाढ़ और राहत शिविरों में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे भी कहानी में मौजूद हैं। चाँदपुर हर साल बाढ़ से जूझता है, लेकिन बाढ़ सिर्फ पानी नहीं लाती। वह गरीबी, प्रशासनिक लापरवाही और असमानता को भी सामने ला देती है। जिन लोगों के पास पहले से कम है, उनके लिए एक आपदा का अर्थ बाकी लोगों से बिल्कुल अलग होता है।
मुझे यह हिस्सा खास तौर पर अच्छा लगा क्योंकि लेखक ने गाँव की समस्याओं को किसी दूर बैठे शहरी पर्यवेक्षक की तरह नहीं देखा। भाषा और वातावरण में स्थानीय अनुभव दिखाई देता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की बोली और बोलचाल उपन्यास को उसकी अपनी आवाज देती है। शुरुआत में इस भाषा की लय पकड़ने में थोड़ा समय लगा, लेकिन एक बार अभ्यस्त होने के बाद यही भाषा किताब का सबसे बड़ा आकर्षण लगने लगी।
और यहां अतुल कुमार राय की सबसे बड़ी ताकत सामने आती है।
वह गांव को सिर्फ हिंदी में नहीं लिखते, गांव की आवाज में लिखने की कोशिश करते हैं।
मुहावरे, बातचीत, मजाक, ताने, स्थानीय संदर्भ और लोगों के बोलने का तरीका कहानी को किताब से निकालकर हमारे सामने खड़ा कर देते हैं। कई संवाद पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि इन्हें किसी लेखक ने बनाया नहीं है, बल्कि कहीं सुनकर लिख लिया है। मेरे लिए regional fiction की यही सबसे खूबसूरत चीज है।
चाँदपुर की चंदा को पढ़ते हुए मुझे कई बार प्रेमचंद की याद आई, लेकिन यह प्रेमचंद का गांव नहीं है। समय बदल चुका है। यहां मोबाइल है, सोशल मीडिया है, आधुनिक शिक्षा की आकांक्षा है, लेकिन उसके साथ वही पुराने सामाजिक ढांचे भी हैं। पुराना और नया एक ही जगह पर खड़े हैं।
यही शायद इस उपन्यास की असली दुनिया है।
एक तरफ मोबाइल और वायरल प्रेम-पत्र है, दूसरी तरफ दहेज और पितृसत्ता। एक तरफ लड़कियां पढ़ना चाहती हैं, दूसरी तरफ उनके भविष्य का फैसला परिवार करता है। एक तरफ गांव बदलना चाहता है, दूसरी तरफ राजनीति और व्यवस्था उसे उसी जगह खींचकर ले आती है।
यह विरोधाभास किताब को दिलचस्प बनाता है।
मुझे यह भी पसंद आया कि राजनीति कहानी में अलग से चिपकाई हुई चीज नहीं लगती। गांव की राजनीति आखिर गांव के जीवन से अलग कैसे हो सकती है? कौन किसके साथ है, किसका प्रभाव है, किसके पास पैसा है, किसकी पहुंच है, किसकी आवाज सुनी जाएगी, ये सब प्रेम और परिवार तक को प्रभावित करते हैं।
यही वजह है कि चाँदपुर की चंदा को सिर्फ “village romance” कहना मुझे थोड़ा कम करना लगता है।
यह rural social fiction भी है।
यह coming-of-age story भी है।
यह प्रेम कहानी भी है।
और कुछ हद तक यह उस छोटे से भारत का दस्तावेज भी है जिसे बड़े शहरों की भाषा में अक्सर सिर्फ “rural India” कहकर छोड़ दिया जाता है।
एक और चीज जो मुझे अच्छी लगी, वह है उपन्यास का humour। इतनी सारी गंभीर समस्याओं के बीच किताब पूरी तरह बोझिल नहीं हो जाती। गांव के लोग सिर्फ दुख झेलने के लिए मौजूद नहीं हैं। वे मजाक करते हैं, प्रेम करते हैं, लड़ते हैं, उत्सव मनाते हैं और अपनी परेशानियों के बीच भी जिंदगी को किसी तरह आगे बढ़ाते हैं।
यही चीज किताब को ज्यादा मानवीय बनाती है।
हालांकि मेरे लिए किताब पूरी तरह flawless नहीं थी।
सबसे बड़ी समस्या कुछ जगहों पर इसकी गति लगी। शुरुआत में लेखक कई पात्रों, स्थानों और परिवेश को काफी विस्तार से स्थापित करते हैं। कुछ पाठकों को यह immersion बहुत पसंद आएगा, लेकिन मेरे लिए कुछ हिस्से थोड़े खिंचे हुए महसूस हुए। कुछ जगहों पर लगा कि कहानी को आगे बढ़ाने के लिए उतने लंबे विवरण की जरूरत नहीं थी।
मंटू के साथ भी मेरी यही समस्या रही। चंदा के सामने उसका व्यक्तित्व कई बार थोड़ा फीका पड़ जाता है। मैं उसके प्रेम को समझता हूं, लेकिन उसकी आंतरिक दुनिया से उतना जुड़ नहीं पाया जितना चंदा से।
और शायद यही वजह है कि मेरे लिए इस किताब की सबसे बड़ी कहानी मंटू और चंदा का romance नहीं बल्कि चंदा की अपनी जिंदगी बन जाती है।
किताब के अंत तक मुझे यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगा कि चंदा अपने जीवन के साथ क्या करेगी, बजाय इसके कि मंटू और चंदा आखिर साथ होंगे या नहीं।
यह एक अच्छी बात है।
क्योंकि अगर प्रेम कहानी ही पूरी किताब का उद्देश्य होती, तो उपन्यास काफी छोटा हो सकता था।
लेकिन लेखक ने प्रेम को बहाना बनाकर एक पूरा सामाजिक संसार खड़ा किया है।
मुझे विशेष रूप से वह विचार पसंद आया कि चंदा सिर्फ अपने लिए नहीं, अपने जैसी दूसरी लड़कियों के लिए भी सपने देखती है। यहां महादेवी वर्मा का प्रभाव और चंदा का उनसे जुड़ाव भी अर्थपूर्ण लगता है। शिक्षा और आत्मनिर्भरता उसके लिए सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं बल्कि अपने आसपास की लड़कियों के भविष्य से जुड़ी चीज बन जाती है।
और शायद इसी वजह से उसका चरित्र किताब खत्म होने के बाद भी साथ रहता है।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि मेरे लिए इसकी “बड़ी कहानी” नहीं बल्कि छोटी-छोटी चीजें हैं।
गांव की सुबह।
बाढ़।
स्कूल।
शादियां।
त्योहार।
रिश्तेदारों की बातचीत।
प्रेम-पत्र।
गांव की राजनीति।
लड़कियों को लेकर परिवार की चिंता।
दहेज की चर्चा।
राहत शिविर।
और उन सबके बीच किसी का चुपचाप अपने भविष्य के बारे में सपना देखना।
इन चीजों से मिलकर चाँदपुर बनता है।
और जब किताब खत्म होती है तो लगता है कि कहानी खत्म हुई है, चाँदपुर नहीं।
यही regional literature की खूबसूरती है। वह हमें ऐसे स्थानों के भीतर ले जाता है जिनके बारे में हम शायद अखबारों या नक्शों में पढ़ते हैं, लेकिन जिनकी असली जिंदगी नहीं जानते।
चाँदपुर की चंदा मुझे इसलिए अच्छी लगी क्योंकि इसने गांव को nostalgia का postcard नहीं बनाया।
यहां मिट्टी की खुशबू भी है और कीचड़ भी।
प्रेम भी है और मजबूरी भी।
हंसी भी है और गरीबी भी।
त्योहार भी हैं और दहेज भी।
सपने भी हैं और उन्हें तोड़ने वाली व्यवस्था भी।
और शायद गांव को देखने का इससे ज्यादा ईमानदार तरीका यही है।
अगर मैं इसे सिर्फ प्रेम कहानी मानकर पढ़ता, तो शायद मेरी rating थोड़ी कम होती। लेकिन एक ग्रामीण सामाजिक उपन्यास के रूप में इसे देखने पर इसकी कई खूबियां सामने आती हैं।
यह बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने वाली किताब नहीं है। इसकी ताकत इसकी सहजता में है।
कभी-कभी यह बहुत बोलती है, कभी-कभी थोड़ा ज्यादा घूमती है, लेकिन इसकी आवाज अपनी है।
और आज जब हिंदी में बहुत-सी कहानियां शहरी middle-class दुनिया के इर्द-गिर्द घूमती हैं, तब चाँदपुर की चंदा जैसी किताब का आना जरूरी लगता है। यह हमें याद दिलाती है कि भारत सिर्फ महानगरों, corporate offices और शहरों की कहानी नहीं है।
भारत उन चाँदपुरों से भी बना है जहां हर साल बाढ़ आती है, जहां प्रेम-पत्र मोबाइल से वायरल हो सकता है लेकिन प्रेम को स्वीकार करना अभी भी आसान नहीं है, जहां लड़की के सपने परिवार की आर्थिक स्थिति से टकराते हैं और जहां राजनीति घर के भीतर तक पहुंचती है।
मेरे लिए चाँदपुर की चंदा की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह मुझे चाँदपुर से मिलवाती है।
और चंदा से भी।
मंटू और चंदा का प्रेम इस कहानी का सबसे आकर्षक हिस्सा हो सकता है, लेकिन उसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद वह लड़की है जो अपने आसपास की सीमाओं को पहचानती है और फिर भी सपने देखना बंद नहीं करती।
4.2/5 stars.
एक प्यारी, मिट्टी से जुड़ी, थोड़ी लंबी लेकिन बेहद जीवंत कहानी। प्रेम के बहाने गांव, समाज, राजनीति, गरीबी और लड़कियों के सपनों की दुनिया दिखाने वाला उपन्यास। हर हिस्सा मुझे समान रूप से मजबूत नहीं लगा, लेकिन चंदा और चाँदपुर दोनों को छोड़ना आसान नहीं था।
July 2, 2026
Chandpur ki Chanda
चांदपुर की चंदा : स्मृतियों, मिट्टी और जिजीविषा का उपन्यास
(अतुल कुमार राय)
रूसी साहित्यकारों और विक्टोरियन युग के महान लेखकों ने मुझे काफी प्रभावित किया है। इस तथ्य के बावजूद, मैं विश्व साहित्य की तुलना में क्षेत्रीय साहित्य के महत्व के प्रति हमेशा सचेत रहा हूँ। क्षेत्रीय साहित्य अक्सर जाति, लैंगिक असमानता और ग्रामीण जीवन जैसे जमीनी मुद्दों पर प्रकाश डालता है, और हाशिए पर पड़े लोगों की आवाज़ों का प्रामाणिक चित्रण प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त, जब भाषाएँ और बोलियाँ सार्वजनिक जीवन से धीरे-धीरे पीछे हट रही हैं, तब क्षेत्रीय साहित्य की भूमिका भावी पीढ़ियों के लिए स्थानीय संस्कृति और रीति-रिवाजों का लिखित विवरण और स्मृति के दस्तावेज़ के रूप में और भी महत्वपूर्ण हो गई है । समृद्ध क्षेत्रीय साहित्य के अभाव में, उन लोकगीतों, मुहावरों, देवस्थानों, रिश्तों और जीवन-शैलियों को सुरक्षित रखना कठिन होगा, जिन्हें विकास और प्रवासन धीरे-धीरे विस्मृति की ओर धकेल रहे हैं।
वर्ष 2026 की शुरुआत में, मैंने मूल हिंदी पुस्तकें या हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में भारतीय साहित्य के अंग्रेजी अनुवाद अधिक पढ़ने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप, मैंने गौतम दुबे की 'चक्का जाम', अशोक पांडे की 'लप्पुझन्ना' (दोनों मूल रूप से हिंदी) और जोगिंदर पॉल की 'A Drop of Blood (उर्दू से अंग्रेजी अनुवाद) पढ़ीं। इस सुविचारित इरादे को जारी रखते हुए, जून 2026 के अंतिम सप्ताह में, मैंने युवा लेखक श्री अतुल कुमार राय के हिंदी उपन्यास " चांदपुर की चंदा" को पढ़ना समाप्त किया। संयोगवश, यह पुस्तक साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार - 2023 की विजेता है और यह पुरस्कार इसे मिलना बिल्कुल उचित है। साहित्य की कोई भी अच्छी रचना भौगोलिक सीमाओं या समय से बंधी नहीं होती, लेकिन यदि किसी को एक ऐसी कहानी पढ़ने को मिले जो अच्छी हो, जन्मस्थान के करीब हो और समकालीन हो तो पढ़ने का आनंद कई गुना बढ़ जाता है। आप अब केवल पाठक नहीं रह जाते, बल्कि एक बेहद उत्सुक और गहन पर्यवेक्षक बन जाते हैं और कभी-कभी स्वयं एक पात्र भी।
इस लघु उपन्यास (287 पृष्ठों) ने मेरे हृदय को इस प्रकार सुकून दिया जैसा बहुत कम पुस्तकें दे पाती हैं और मेरे उन भावों को छुआ जो मेरे वर्तमान जीवन में अक्सर अछूते रह जाते हैं । क्योंकि यह पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में सरयू नदी के किनारे बसे एक छोटे से गाँव की कहानी कहता है और तीन से छह वर्ष की आयु (1971-74) मैंने बलिया जिले के अपने ननिहाल में बिताई है। आधुनिक मनोविज्ञान मानता है कि जीवन का यही काल व्यक्ति की भावनात्मक संरचना की नींव रखता है। उपन्यास पढ़ते समय मुझे बार-बार लगा कि मैं केवल एक कहानी नहीं पढ़ रहा हूँ, बल्कि अपने ही मनोवैज्ञानिक भूगोल में लौट रहा हूँ और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एक व्यक्ति के रूप में मैं काफी हद तक इस उपन्यास की कहानी के स्थान की परिस्थितियों का परिणाम हूँ।
हालांकि यह उपन्यास हिंदी में लिखा गया है, फिर भी इसे पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो कोई कहानी मेरी मातृभाषा भोजपुरी में सुनाई जा रही हो। स्नेह भरे भाव, संबोधित करने के तरीके, बोलचाल की भाषा, स्थानीय मुहावरों और कहावतों का व्यापक उपयोग और गालियों का सटीक और वास्तविक प्रयोग इस प्रकार से किया गया है कि मानो कोई किताब नहीं पढ़ रहे हों, बल्कि गांव में किसी रिश्तेदार या दोस्त से बातचीत कर रहे हों। जगह, लोग, दैनिक जीवन और विवाह-त्योहारों का वर्णन इतना आत्मीय है कि बचपन के शुरुआती वर्षों के जीवित अनुभव की पुरानी यादें उमड़ पड़ीं। मिट्टी की खुशबू, हवा का स्पर्श, बदलते मौसमों के अद्वितीय रूप से भिन्न और परस्पर अनन्य अनुभव, चांदनी रातों का जादुई एहसास, गांव से कुछ दूरी पर स्थित आम के बागों की शांति और भोजन का स्वाद - सब कुछ जीवंत हो उठा। सरस्वती पूजा और विजयदशमी के समय आयोजित होने वाले ग्राम नाटकों को लेकर एक अटूट और सर्वव्यापी उत्साह का माहौल वर्णन इतना सटीक और यथार्थवादी है कि मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपने बचपन के उन दिनों में पहुँच गया हूँ जब मैं 8 साल की उम्र तक गाँवों में रहता था।
सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, गाँव-विशिष्ट देवताओं (जैसे डीह बाबा, काली माई, पिपरा पर के बरहम बाबा, और बउरहवा बाबा) का उल्लेख, उस क्षेत्र की अनूठी विशेषता को दर्शाता है। गंगा-सरयू के किनारे वाले इलाके, जिसे 'दियारा' कहा जाता है, का वर्णन बहुत प्रामाणिक और सटीक है। सहथवार, हल्दी चक्की, बलिहार, सुरेमनपुर, ददरी मेला, टीएस बांध (डैम), और बेआसी ढाला जैसी जगहों का बार-बार ज़िक्र, पढ़ने वाले को सीधे कहानी की जगह पर ले जाता है। किताब पढ़ते हुए जब कभी भी इन जगहों का ज़िक्र आया, तो मुझे अपनी ज़िंदगी की दो घटनाएँ याद आ गईं: एक बार गंगा में डूबना (मैं लगभग डूब ही गया था, लेकिन मेरे एक मामा की सूझबूझ ने मुझे बचा लिया) और दूसरी बार ददरी मेले में खो जाना, जहाँ से मुझे कुछ बुरे लोगों के चंगुल से बचाया गया था; वे मुझे किसी अनजान जगह ले जा रहे थे—शायद किसी शहर में मुझे अपाहिज बनाकर भीख मंगवाने के इरादे से।
मेरा मन तो बहुत है, पर किताब की कहानी बताना ठीक नहीं लग रहा, क्योंकि मैं उन मित्रों के अनुभव को पहले से सीमित नहीं करना चाहता जो इसे पढ़ने के लिए प्रेरित होंगे। फिर भी, मुझे ऐसा लगता है कि किताब का पृष्ठभूमि, मुख्य विषय और उसका अंदाज़ समझाने का जोखिम लिया जा सकता है और इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।
यह उपन्यास एक खूबसूरत मर्मस्पर्शी प्रेम-कहानी होने के अलावा समकालीन समाज के कई कड़वे सवालों से टकराते हुए, हमारी ग्रामीण संस्कृति की विलुप्त होती वो झाँकी है, जो पन्ने दर पन्ने एक ऐसे महावृत्तांत का रूप धारण कर लेती है जिसमें हम डूबते चले जाते हैं और हँसते, गाते, रोते और मुस्कुराते हुए महसूस करते हैं। यह ग्रामीण जीवन में व्यापक सामाजिक पतन, उत्तर प्रदेश में शिक्षा और परीक्षा प्रणाली की विफलता, राजनीतिक भ्रष्टाचार और पंचायती राज की अवधारणा के विकृतिकरण का दुखद वृत्तांत भी है। इस उपन्यास में चार मुख्य पात्र हैं, पिंकी (चंदा), मंटू, झाँझा बाबा (जंगबहादुर सिंह) और राकेश; प्रत्येक अपने-अपने तरीके से आदर्शवादी और पवित्र। परिस्थितियों के कारण चारों ही खुद को बेहद विवश और सीमित महसूस करते हैं, लेकिन वे कभी हार नहीं मानते। और इस तरह, समकालीन ग्रामीण जीवन के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य का प्रामाणिक चित्रण होने के साथ-साथ, यह निराशा और हताशा के माहौल में सकारात्मकता की कहानी भी है।
गाँव चांदपुर में घटित यह कहानी मंटू और राकेश के बीच अटूट दोस्ती, दो किशोरों (मंटू और पिंकी ) के बीच का शुद्ध और युवा प्रेम, तथा पहले प्यार के सपनों और समाज की अपेक्षाओं के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। सबसे अहम बात यह है कि यह पिंकी की दिल को छू लेने वाली कहानी है - उसकी पवित्रता, उसकी हिम्मत और उसके कभी न हार मानने वाले जज़्बे की; जीने की वह इच्छा जिसे हिंदी में 'जिजीविषा' कहा जाता है। दहेज के नाम पर बलि दी जाने वाली कई युवतियों की दुखद कहानियों के माध्यम से, यह उपन्यास एक बहुत ही ठोस तर्क प्रस्तुत करता है कि हम अपने सीमित संसाधनों को दहेज के लिए बचाने के बजाय लड़कियों की शिक्षा पर खर्च करें। क्योंकि, दहेज की कोई भी रकम लड़की के साथ अच्छे बर्ताव और खुशहाल ज़िंदगी की गारंटी नहीं दे सकती, लेकिन एक पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर लड़की न सिर्फ़ परिवार को, बल्कि पूरे समाज को बदल सकती है। एक युवा, प्रतिभाशाली और आदर्श किशोरी की यह कहानी, झाँझा बाबा के चरित्र के माध्यम से, लंबे समय से चली आ रही सामाजिक मान्यताओं और परंपराओं पर गहरे प्रश्न उठाती है। मंटू के सदा भरोसेमंद और समर्पित मित्र राकेश के चरित्र के माध्यम से, कहानी जीवन में सच्ची दोस्ती के महत्व पर बल देती है। दूसरे पहलू पर, बेरोज़गार और कम पढ़े-लिखे गाँव के लड़कों की बढ़ती मनमानी, आवारापन, गुंडागर्दी और अश्लील व भद्दी हरकतों का मुद्दा बहुत असरदार ढंग से उठाया गया है - कभी मज़ाकिया अंदाज़ में तो कभी मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, उचित महत्व के साथ । और अगर आपको भोजपुरी शादी के गीतों, खासकर हल्दी, चुमावन, मट्टीकोड़, गुरहथी जैसी रस्मों के गीतों में दिलचस्पी है, लेकिन इतने सालों से आपने उन्हें सुना नहीं है, तो यह किताब आपको भोजपुरी इलाके के किसी गाँव के मंडप तक ले जाएगी। इसी उपन्यास के एक चरित्र, चिंगारी जी कवि के शब्दों में - “अपनी संस्कृति में सर्वप्रथम लोकगायन की परम्परा रही है और हमेशा याद रखिए, हँसी-मजाक एक तरफ़, लेकिन कोई भी संस्कृति तभी टिकती है जब समाज अपने लोकाचार का सम्मान करता है।”
इस उपन्यास के बारे में मेरी आखिरी और स्थायी राय है कि, यह एक दिल को छू लेने वाली और विचारोत्तेजक रचना है जो अंतिम पृष्ठ पढ़ने के बाद भी लंबे समय तक मन में बसी रहती है। हास्य, व्यंग्य, आंचलिक शब्दावली और ग्रामीण जीवन की सहज लय का ऐसा स्वाभाविक संयोजन बहुत कम देखने को मिलता है। इन्हीं गुणों ने इस उपन्यास को मेरे लिए अत्यंत आत्मीय बना दिया। ‘चंदा’ नाम से मेरा एक निजी भावनात्मक जुड़ाव भी है। मेरी एक हमउम्र मौसी का नाम भी चंदा है। बचपन में बलिया के ननिहाल में बिताए उन्हीं वर्षों में हम खेल के साथी थे। आज संयोग से वह भी गुड़गांव में रहती हैं। मुझे विश्वास है कि यह उपन्यास उन्हें भी उतना ही आत्मीय लगेगा जितना मुझे लगा, शायद उससे भी अधिक।
अंततः महादेवी वर्मा की मशहूर कविता 'जाग तुझको दूर जाना' का बार-बार ज़िक्र और हिंदी की इस सबसे मशहूर कवयित्री के प्रति पिंकी का लगाव, मुझे बहुत संवेदनशील और प्रेरणादायक लगा। यह कविता मानो पिंकी (चंदा) के मन, उसकी जिजीविषा और उसके नैतिक साहस की काव्यात्मक प्रतिध्वनि बन जाती है।
चांदपुर की चंदा : स्मृतियों, मिट्टी और जिजीविषा का उपन्यास
(अतुल कुमार राय)
रूसी साहित्यकारों और विक्टोरियन युग के महान लेखकों ने मुझे काफी प्रभावित किया है। इस तथ्य के बावजूद, मैं विश्व साहित्य की तुलना में क्षेत्रीय साहित्य के महत्व के प्रति हमेशा सचेत रहा हूँ। क्षेत्रीय साहित्य अक्सर जाति, लैंगिक असमानता और ग्रामीण जीवन जैसे जमीनी मुद्दों पर प्रकाश डालता है, और हाशिए पर पड़े लोगों की आवाज़ों का प्रामाणिक चित्रण प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त, जब भाषाएँ और बोलियाँ सार्वजनिक जीवन से धीरे-धीरे पीछे हट रही हैं, तब क्षेत्रीय साहित्य की भूमिका भावी पीढ़ियों के लिए स्थानीय संस्कृति और रीति-रिवाजों का लिखित विवरण और स्मृति के दस्तावेज़ के रूप में और भी महत्वपूर्ण हो गई है । समृद्ध क्षेत्रीय साहित्य के अभाव में, उन लोकगीतों, मुहावरों, देवस्थानों, रिश्तों और जीवन-शैलियों को सुरक्षित रखना कठिन होगा, जिन्हें विकास और प्रवासन धीरे-धीरे विस्मृति की ओर धकेल रहे हैं।
वर्ष 2026 की शुरुआत में, मैंने मूल हिंदी पुस्तकें या हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में भारतीय साहित्य के अंग्रेजी अनुवाद अधिक पढ़ने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप, मैंने गौतम दुबे की 'चक्का जाम', अशोक पांडे की 'लप्पुझन्ना' (दोनों मूल रूप से हिंदी) और जोगिंदर पॉल की 'A Drop of Blood (उर्दू से अंग्रेजी अनुवाद) पढ़ीं। इस सुविचारित इरादे को जारी रखते हुए, जून 2026 के अंतिम सप्ताह में, मैंने युवा लेखक श्री अतुल कुमार राय के हिंदी उपन्यास " चांदपुर की चंदा" को पढ़ना समाप्त किया। संयोगवश, यह पुस्तक साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार - 2023 की विजेता है और यह पुरस्कार इसे मिलना बिल्कुल उचित है। साहित्य की कोई भी अच्छी रचना भौगोलिक सीमाओं या समय से बंधी नहीं होती, लेकिन यदि किसी को एक ऐसी कहानी पढ़ने को मिले जो अच्छी हो, जन्मस्थान के करीब हो और समकालीन हो तो पढ़ने का आनंद कई गुना बढ़ जाता है। आप अब केवल पाठक नहीं रह जाते, बल्कि एक बेहद उत्सुक और गहन पर्यवेक्षक बन जाते हैं और कभी-कभी स्वयं एक पात्र भी।
इस लघु उपन्यास (287 पृष्ठों) ने मेरे हृदय को इस प्रकार सुकून दिया जैसा बहुत कम पुस्तकें दे पाती हैं और मेरे उन भावों को छुआ जो मेरे वर्तमान जीवन में अक्सर अछूते रह जाते हैं । क्योंकि यह पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में सरयू नदी के किनारे बसे एक छोटे से गाँव की कहानी कहता है और तीन से छह वर्ष की आयु (1971-74) मैंने बलिया जिले के अपने ननिहाल में बिताई है। आधुनिक मनोविज्ञान मानता है कि जीवन का यही काल व्यक्ति की भावनात्मक संरचना की नींव रखता है। उपन्यास पढ़ते समय मुझे बार-बार लगा कि मैं केवल एक कहानी नहीं पढ़ रहा हूँ, बल्कि अपने ही मनोवैज्ञानिक भूगोल में लौट रहा हूँ और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एक व्यक्ति के रूप में मैं काफी हद तक इस उपन्यास की कहानी के स्थान की परिस्थितियों का परिणाम हूँ।
हालांकि यह उपन्यास हिंदी में लिखा गया है, फिर भी इसे पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो कोई कहानी मेरी मातृभाषा भोजपुरी में सुनाई जा रही हो। स्नेह भरे भाव, संबोधित करने के तरीके, बोलचाल की भाषा, स्थानीय मुहावरों और कहावतों का व्यापक उपयोग और गालियों का सटीक और वास्तविक प्रयोग इस प्रकार से किया गया है कि मानो कोई किताब नहीं पढ़ रहे हों, बल्कि गांव में किसी रिश्तेदार या दोस्त से बातचीत कर रहे हों। जगह, लोग, दैनिक जीवन और विवाह-त्योहारों का वर्णन इतना आत्मीय है कि बचपन के शुरुआती वर्षों के जीवित अनुभव की पुरानी यादें उमड़ पड़ीं। मिट्टी की खुशबू, हवा का स्पर्श, बदलते मौसमों के अद्वितीय रूप से भिन्न और परस्पर अनन्य अनुभव, चांदनी रातों का जादुई एहसास, गांव से कुछ दूरी पर स्थित आम के बागों की शांति और भोजन का स्वाद - सब कुछ जीवंत हो उठा। सरस्वती पूजा और विजयदशमी के समय आयोजित होने वाले ग्राम नाटकों को लेकर एक अटूट और सर्वव्यापी उत्साह का माहौल वर्णन इतना सटीक और यथार्थवादी है कि मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपने बचपन के उन दिनों में पहुँच गया हूँ जब मैं 8 साल की उम्र तक गाँवों में रहता था।
सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, गाँव-विशिष्ट देवताओं (जैसे डीह बाबा, काली माई, पिपरा पर के बरहम बाबा, और बउरहवा बाबा) का उल्लेख, उस क्षेत्र की अनूठी विशेषता को दर्शाता है। गंगा-सरयू के किनारे वाले इलाके, जिसे 'दियारा' कहा जाता है, का वर्णन बहुत प्रामाणिक और सटीक है। सहथवार, हल्दी चक्की, बलिहार, सुरेमनपुर, ददरी मेला, टीएस बांध (डैम), और बेआसी ढाला जैसी जगहों का बार-बार ज़िक्र, पढ़ने वाले को सीधे कहानी की जगह पर ले जाता है। किताब पढ़ते हुए जब कभी भी इन जगहों का ज़िक्र आया, तो मुझे अपनी ज़िंदगी की दो घटनाएँ याद आ गईं: एक बार गंगा में डूबना (मैं लगभग डूब ही गया था, लेकिन मेरे एक मामा की सूझबूझ ने मुझे बचा लिया) और दूसरी बार ददरी मेले में खो जाना, जहाँ से मुझे कुछ बुरे लोगों के चंगुल से बचाया गया था; वे मुझे किसी अनजान जगह ले जा रहे थे—शायद किसी शहर में मुझे अपाहिज बनाकर भीख मंगवाने के इरादे से।
मेरा मन तो बहुत है, पर किताब की कहानी बताना ठीक नहीं लग रहा, क्योंकि मैं उन मित्रों के अनुभव को पहले से सीमित नहीं करना चाहता जो इसे पढ़ने के लिए प्रेरित होंगे। फिर भी, मुझे ऐसा लगता है कि किताब का पृष्ठभूमि, मुख्य विषय और उसका अंदाज़ समझाने का जोखिम लिया जा सकता है और इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।
यह उपन्यास एक खूबसूरत मर्मस्पर्शी प्रेम-कहानी होने के अलावा समकालीन समाज के कई कड़वे सवालों से टकराते हुए, हमारी ग्रामीण संस्कृति की विलुप्त होती वो झाँकी है, जो पन्ने दर पन्ने एक ऐसे महावृत्तांत का रूप धारण कर लेती है जिसमें हम डूबते चले जाते हैं और हँसते, गाते, रोते और मुस्कुराते हुए महसूस करते हैं। यह ग्रामीण जीवन में व्यापक सामाजिक पतन, उत्तर प्रदेश में शिक्षा और परीक्षा प्रणाली की विफलता, राजनीतिक भ्रष्टाचार और पंचायती राज की अवधारणा के विकृतिकरण का दुखद वृत्तांत भी है। इस उपन्यास में चार मुख्य पात्र हैं, पिंकी (चंदा), मंटू, झाँझा बाबा (जंगबहादुर सिंह) और राकेश; प्रत्येक अपने-अपने तरीके से आदर्शवादी और पवित्र। परिस्थितियों के कारण चारों ही खुद को बेहद विवश और सीमित महसूस करते हैं, लेकिन वे कभी हार नहीं मानते। और इस तरह, समकालीन ग्रामीण जीवन के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य का प्रामाणिक चित्रण होने के साथ-साथ, यह निराशा और हताशा के माहौल में सकारात्मकता की कहानी भी है।
गाँव चांदपुर में घटित यह कहानी मंटू और राकेश के बीच अटूट दोस्ती, दो किशोरों (मंटू और पिंकी ) के बीच का शुद्ध और युवा प्रेम, तथा पहले प्यार के सपनों और समाज की अपेक्षाओं के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। सबसे अहम बात यह है कि यह पिंकी की दिल को छू लेने वाली कहानी है - उसकी पवित्रता, उसकी हिम्मत और उसके कभी न हार मानने वाले जज़्बे की; जीने की वह इच्छा जिसे हिंदी में 'जिजीविषा' कहा जाता है। दहेज के नाम पर बलि दी जाने वाली कई युवतियों की दुखद कहानियों के माध्यम से, यह उपन्यास एक बहुत ही ठोस तर्क प्रस्तुत करता है कि हम अपने सीमित संसाधनों को दहेज के लिए बचाने के बजाय लड़कियों की शिक्षा पर खर्च करें। क्योंकि, दहेज की कोई भी रकम लड़की के साथ अच्छे बर्ताव और खुशहाल ज़िंदगी की गारंटी नहीं दे सकती, लेकिन एक पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर लड़की न सिर्फ़ परिवार को, बल्कि पूरे समाज को बदल सकती है। एक युवा, प्रतिभाशाली और आदर्श किशोरी की यह कहानी, झाँझा बाबा के चरित्र के माध्यम से, लंबे समय से चली आ रही सामाजिक मान्यताओं और परंपराओं पर गहरे प्रश्न उठाती है। मंटू के सदा भरोसेमंद और समर्पित मित्र राकेश के चरित्र के माध्यम से, कहानी जीवन में सच्ची दोस्ती के महत्व पर बल देती है। दूसरे पहलू पर, बेरोज़गार और कम पढ़े-लिखे गाँव के लड़कों की बढ़ती मनमानी, आवारापन, गुंडागर्दी और अश्लील व भद्दी हरकतों का मुद्दा बहुत असरदार ढंग से उठाया गया है - कभी मज़ाकिया अंदाज़ में तो कभी मामले की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए, उचित महत्व के साथ । और अगर आपको भोजपुरी शादी के गीतों, खासकर हल्दी, चुमावन, मट्टीकोड़, गुरहथी जैसी रस्मों के गीतों में दिलचस्पी है, लेकिन इतने सालों से आपने उन्हें सुना नहीं है, तो यह किताब आपको भोजपुरी इलाके के किसी गाँव के मंडप तक ले जाएगी। इसी उपन्यास के एक चरित्र, चिंगारी जी कवि के शब्दों में - “अपनी संस्कृति में सर्वप्रथम लोकगायन की परम्परा रही है और हमेशा याद रखिए, हँसी-मजाक एक तरफ़, लेकिन कोई भी संस्कृति तभी टिकती है जब समाज अपने लोकाचार का सम्मान करता है।”
इस उपन्यास के बारे में मेरी आखिरी और स्थायी राय है कि, यह एक दिल को छू लेने वाली और विचारोत्तेजक रचना है जो अंतिम पृष्ठ पढ़ने के बाद भी लंबे समय तक मन में बसी रहती है। हास्य, व्यंग्य, आंचलिक शब्दावली और ग्रामीण जीवन की सहज लय का ऐसा स्वाभाविक संयोजन बहुत कम देखने को मिलता है। इन्हीं गुणों ने इस उपन्यास को मेरे लिए अत्यंत आत्मीय बना दिया। ‘चंदा’ नाम से मेरा एक निजी भावनात्मक जुड़ाव भी है। मेरी एक हमउम्र मौसी का नाम भी चंदा है। बचपन में बलिया के ननिहाल में बिताए उन्हीं वर्षों में हम खेल के साथी थे। आज संयोग से वह भी गुड़गांव में रहती हैं। मुझे विश्वास है कि यह उपन्यास उन्हें भी उतना ही आत्मीय लगेगा जितना मुझे लगा, शायद उससे भी अधिक।
अंततः महादेवी वर्मा की मशहूर कविता 'जाग तुझको दूर जाना' का बार-बार ज़िक्र और हिंदी की इस सबसे मशहूर कवयित्री के प्रति पिंकी का लगाव, मुझे बहुत संवेदनशील और प्रेरणादायक लगा। यह कविता मानो पिंकी (चंदा) के मन, उसकी जिजीविषा और उसके नैतिक साहस की काव्यात्मक प्रतिध्वनि बन जाती है।
July 17, 2024
एक शानदार रचना। इसमें अतुल कुमार राय जी ने पाठकों को अंत तक बांधे रखा । गाँव की एकता को बहुत ही उत्कृष्ट तरीक़े से दर्शाया है । साथ ही राजनीतिक कटाक्ष भी किया है । यह किताब आपको कई बात भावुक एवं सोचने पर विवश कर देती है । पिछले कुछ समय की सबसे बेहतरीन पुस्तक।
July 9, 2022
Worthy to be read!!
September 2, 2024
Never judge a book by its title. I picked this up after reading a very heavy non-fiction book, purely based on the title thinking it's a pulp fiction and will provide me with a quick bout of Joy.
But boy I couldn't have been more wrong. The book takes me to the places that have been long forgotten. They exist in a parallel India that almost never crosses the path with the urbans. You don't see them mention the paper either during and election campaign or after a tragic incident as their non-existent for the substantial part.
The book reminded me of rural India from the likes of Mulk Raj Anand, Prem Chandra but in a much more contemporary settings.
The book takes you to the journey of all the nine emotions and leaves you wanting for more. There is a surreal fluidity to the flow that keeps the reader engaged. Tragedy is so palpable that when the book concludes you feel relieved.
The author leaves you presently surprised by his focus on the detail and closure for so many of the characters that appear trivial during the narrative.
In a Life full of challenges, tragedies, lost hopes, loneliness and miseries be a Chanda.
Highly recommended.
But boy I couldn't have been more wrong. The book takes me to the places that have been long forgotten. They exist in a parallel India that almost never crosses the path with the urbans. You don't see them mention the paper either during and election campaign or after a tragic incident as their non-existent for the substantial part.
The book reminded me of rural India from the likes of Mulk Raj Anand, Prem Chandra but in a much more contemporary settings.
The book takes you to the journey of all the nine emotions and leaves you wanting for more. There is a surreal fluidity to the flow that keeps the reader engaged. Tragedy is so palpable that when the book concludes you feel relieved.
The author leaves you presently surprised by his focus on the detail and closure for so many of the characters that appear trivial during the narrative.
In a Life full of challenges, tragedies, lost hopes, loneliness and miseries be a Chanda.
Highly recommended.
November 15, 2024
नदी के किनारे एक गाँव में यह प्रेम की ऐसी कहानी है जो आपको हँसाएगी भी, रुलाएगी भी, समझाएगी भी, और हमारे समाज की असलियत दिखाएगी भी। यह कहानी कहने को तो चंदपुर की चंदा की है, पर असल में यह कहानी हर उस स्त्री की है जो आज भी "पिछड़ी" सोच से ग्रस्त लोगों से भरे समाज में अपना सिर ऊंचा करके रहती है। अब यह "पिछड़ी" सोच क्या है? यह मान लेना कि बेटी की पढ़ाई से ज़्यादा ज़रूरी है बेटी की सगाई। यह मान लेना कि पल्लू सही जगह रखना बेटी का काम है, पर अपनी निगाहों पर नियंत्रण रखना उनके बेटों का काम नहीं। बेटियों का स्थान तो चूल्हे-चौके पर है, और बेटों का स्थान चाय की टपरियों पर।
जब आप इस उपन्यास के द्वारा चंदपुर घूमने जाएंगे, तो आप पाएंगे खुद को मुख़ातिब होते उन आम समस्याओं से, जो चंदपुर जैसे गाँवों को आज भी जकड़े बैठी हैं, जबकि शहरी लोग उन समस्याओं को जानते तक नहीं। बस यही सब कुछ तो है इस किताब में, जो आपको इसे उठाकर पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। और हाँ, एक बात और—अगर इस किताब को पढ़ने से पहले आप महादेवी वर्मा जी को नहीं जानते, तो जान जाएंगे। तो देर किस बात की? जाग, तुझको दूर जाना।
जब आप इस उपन्यास के द्वारा चंदपुर घूमने जाएंगे, तो आप पाएंगे खुद को मुख़ातिब होते उन आम समस्याओं से, जो चंदपुर जैसे गाँवों को आज भी जकड़े बैठी हैं, जबकि शहरी लोग उन समस्याओं को जानते तक नहीं। बस यही सब कुछ तो है इस किताब में, जो आपको इसे उठाकर पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। और हाँ, एक बात और—अगर इस किताब को पढ़ने से पहले आप महादेवी वर्मा जी को नहीं जानते, तो जान जाएंगे। तो देर किस बात की? जाग, तुझको दूर जाना।
March 8, 2025
Cringe as fucking hell
October 5, 2026
पहली बार जब मैंने चांदपुर की चंदा का नाम सुना था, तो मुझे लगा था कि यह शायद एक सीधी-सादी प्रेम कहानी होगी। लेकिन किताब पढ़ने के बाद महसूस हुआ कि यह केवल प्रेम की कहानी नहीं, बल्कि एक पूरे गाँव, उसके लोगों, उनकी उम्मीदों, संघर्षों और सामाजिक सच्चाइयों की कहानी है।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह गाँव को किसी आदर्श जगह की तरह प्रस्तुत नहीं करता। लेखक गाँव की उन समस्याओं को भी सामने लाते हैं जिन पर अक्सर बात नहीं होती। लड़कियों की शिक्षा पर सीमाएँ, कम उम्र में विवाह, दहेज की वजह से टूटती ज़िंदगियाँ, यहाँ तक कि आत्महत्या जैसे दर्दनाक मुद्दे कहानी का हिस्सा बनते हैं। पढ़ते हुए कई बार दुख होता है कि आज भी समाज के कुछ हिस्सों में ऐसी परिस्थितियाँ मौजूद हैं।
मुझे पुस्तक का यह पक्ष भी बहुत अच्छा लगा कि लेखक केवल नकारात्मक तस्वीर नहीं दिखाते। गाँव की राजनीति में स्वार्थ, गुटबाज़ी और व्यक्तिगत लाभ की मानसिकता दिखती है, लेकिन साथ ही यह भी देखने को मिलता है कि संकट के समय वही लोग एक-दूसरे के साथ खड़े भी हो जाते हैं। आपसी झगड़ों और मतभेदों के बावजूद एक सामुदायिक भावना बनी रहती है, जो गाँव की असली ताकत है।
इस पूरी कहानी में झाझा बाबा का चरित्र मेरे लिए सबसे प्रभावशाली पात्रों में से एक रहा। वे उन लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करने की कोशिश करते हैं। ऐसे पात्र हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि समाज की अच्छाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दूसरी ओर, गाँव से निकलकर पढ़-लिखकर सफल होने वाले लोगों का दृष्टिकोण भी बहुत वास्तविक तरीके से दिखाया गया है। विशेष रूप से वह प्रसंग, जब एक इंजीनियर बनने के बाद बेटा अपने पिता से सब कुछ बेचकर चांदपुर छोड़ने की बात करता है, मुझे बहुत विचारोत्तेजक लगा। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि गाँव और शहर, जड़ों और महत्वाकांक्षाओं के बीच के संघर्ष की कहानी है।
चंदा का चरित्र भी गाँव की अनेक लड़कियों की कहानी को सामने लाता है। उसके माध्यम से यह समझ आता है कि प्रतिभा और सपनों की कमी नहीं होती, लेकिन अवसर और सामाजिक परिस्थितियाँ अक्सर उनके रास्ते में खड़ी हो जाती हैं।
लेखक की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उन्होंने किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं लिखी, बल्कि पूरे चांदपुर को एक जीवंत पात्र बना दिया है। पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे हम गाँव की गलियों में घूम रहे हों, लोगों की बातें सुन रहे हों और उनकी खुशियों व परेशानियों को करीब से देख रहे हों।
कुल मिलाकर, "चांदपुर की चंदा" मेरे लिए प्रेम कहानी से कहीं अधिक एक सामाजिक उपन्यास साबित हुई। यह गाँव के जीवन की सुंदरता और उसकी समस्याओं, दोनों को ईमानदारी से सामने रखती है। झाझा बाबा जैसे पात्र, चंदा की कहानी और गाँव के बदलते सामाजिक ताने-बाने ने इस पुस्तक को मेरे लिए यादगार बना दिया। यह केवल पढ़ने की नहीं, महसूस करने की किताब है।
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अगर आप ऐसी कहानियाँ पसंद करते हैं जो प्रेम के साथ-साथ समाज, रिश्तों, संघर्षों और बदलते ग्रामीण जीवन की सच्ची तस्वीर दिखाएँ, तो "चांदपुर की चंदा" अवश्य पढ़नी चाहिए।
इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह गाँव को किसी आदर्श जगह की तरह प्रस्तुत नहीं करता। लेखक गाँव की उन समस्याओं को भी सामने लाते हैं जिन पर अक्सर बात नहीं होती। लड़कियों की शिक्षा पर सीमाएँ, कम उम्र में विवाह, दहेज की वजह से टूटती ज़िंदगियाँ, यहाँ तक कि आत्महत्या जैसे दर्दनाक मुद्दे कहानी का हिस्सा बनते हैं। पढ़ते हुए कई बार दुख होता है कि आज भी समाज के कुछ हिस्सों में ऐसी परिस्थितियाँ मौजूद हैं।
मुझे पुस्तक का यह पक्ष भी बहुत अच्छा लगा कि लेखक केवल नकारात्मक तस्वीर नहीं दिखाते। गाँव की राजनीति में स्वार्थ, गुटबाज़ी और व्यक्तिगत लाभ की मानसिकता दिखती है, लेकिन साथ ही यह भी देखने को मिलता है कि संकट के समय वही लोग एक-दूसरे के साथ खड़े भी हो जाते हैं। आपसी झगड़ों और मतभेदों के बावजूद एक सामुदायिक भावना बनी रहती है, जो गाँव की असली ताकत है।
इस पूरी कहानी में झाझा बाबा का चरित्र मेरे लिए सबसे प्रभावशाली पात्रों में से एक रहा। वे उन लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करने की कोशिश करते हैं। ऐसे पात्र हमें यह विश्वास दिलाते हैं कि समाज की अच्छाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। दूसरी ओर, गाँव से निकलकर पढ़-लिखकर सफल होने वाले लोगों का दृष्टिकोण भी बहुत वास्तविक तरीके से दिखाया गया है। विशेष रूप से वह प्रसंग, जब एक इंजीनियर बनने के बाद बेटा अपने पिता से सब कुछ बेचकर चांदपुर छोड़ने की बात करता है, मुझे बहुत विचारोत्तेजक लगा। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि गाँव और शहर, जड़ों और महत्वाकांक्षाओं के बीच के संघर्ष की कहानी है।
चंदा का चरित्र भी गाँव की अनेक लड़कियों की कहानी को सामने लाता है। उसके माध्यम से यह समझ आता है कि प्रतिभा और सपनों की कमी नहीं होती, लेकिन अवसर और सामाजिक परिस्थितियाँ अक्सर उनके रास्ते में खड़ी हो जाती हैं।
लेखक की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उन्होंने किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं लिखी, बल्कि पूरे चांदपुर को एक जीवंत पात्र बना दिया है। पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे हम गाँव की गलियों में घूम रहे हों, लोगों की बातें सुन रहे हों और उनकी खुशियों व परेशानियों को करीब से देख रहे हों।
कुल मिलाकर, "चांदपुर की चंदा" मेरे लिए प्रेम कहानी से कहीं अधिक एक सामाजिक उपन्यास साबित हुई। यह गाँव के जीवन की सुंदरता और उसकी समस्याओं, दोनों को ईमानदारी से सामने रखती है। झाझा बाबा जैसे पात्र, चंदा की कहानी और गाँव के बदलते सामाजिक ताने-बाने ने इस पुस्तक को मेरे लिए यादगार बना दिया। यह केवल पढ़ने की नहीं, महसूस करने की किताब है।
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अगर आप ऐसी कहानियाँ पसंद करते हैं जो प्रेम के साथ-साथ समाज, रिश्तों, संघर्षों और बदलते ग्रामीण जीवन की सच्ची तस्वीर दिखाएँ, तो "चांदपुर की चंदा" अवश्य पढ़नी चाहिए।
February 12, 2024
"चाँदपुर की चंदा" को पढ़ने के बाद जो सबसे पहला विचार आता है वह यह, "शब्द अतुल जी की कलम से निकले हैं और कागज़ पर स्याही की खुशबू रेणु-जी की सी है।"
शायद इससे बेहतर तरीके से मैं "चाँदपुर की चंदा" को परिभाषित नहीं कर सकता था।
लेकिन यह तो हुई बात थोड़े परिष्कृत शब्दों में। पर अगर अतुल जी को दिल से कुछ कहना हो तो कहूँगा-
"भैया जी, गर्दा उड़ा दिये!!"
किसी भी लेखन की उत्कृष्टता की पराकाष्ठा का एक आयाम यह भी है कि कहानी में समय, स्थान और समाज को कैसे निरूपित किया गया है। प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि उन्होंने समय, स्थान और समाज को पन्नों पर उतार दिया। और अतुल जी के लिखे में समय, स्थान और समाज, तीनों ही, कहानी में समाकलित चरित्रों की भाँति उभरते दिखते हैं।
आप भारत में किसी भी कोने चले जाईये, यहाँ कस्बों, अंचलों का अपना एक किरदार होता है जो वहाँ रहने वालों की आँखों से लेकर रहने बतियाने के ढ़ंग में, पुरजोर छलक मारता है।
और ह्यूमर तो इन कस्बों की मानो बपौती है। हर कहीं का अपना अलग फ्लेवर है पर भाव वही है। बिना फ़िल्टर, बेधड़क। शायद इसलिए क्योंकि ह्यूमर से जीवन सरल, सरस बना रहता है। हँसी-ठट्ठे में बड़ी-बड़ी मुसीबतें भी खेल लगने लगती हैं। अक्सर जब लोग अपने भाग्य और दुखों पर फूटकर रो नहीं पाते तो हँसने लग जाते हैं। ये यहाँ का डिफेंस-मेकेनिज़्म है।
चाँदपुर भी ऐसा ही है। अपनी तमाम विषमताओं और सामाजिक उधेड़-बुन में उलझे हुए भी, खुली बाहों से आपका स्वागत करता है। आप चाहें तो फूँकन की दुकान पर कुमार सानू या मनोज तिवारी जी के गाने सुनते हुये चाँदपुर से दुनिया-ज़माने की बतकही कर सकते हैं।
"चाँदपुर.." की कहानी को चार चाँद लगाते हैं चाँदपुर के चार चाँद (ये तो चिंगारी जी की कविता सा कुछ हो गया, ख़ैर..)।
पहला तो चाँद, चाँदपुर खुद्दे है। दूसरा वो, जो सांझ ढले सरयू जी की सतह पर चित्रकारी करता-मिटाता रहता है। तीसरा, गोल चेहरे वाला मंटू। बबुआ इस्क हो तो मंटू जैसा हो। पूरब टोले के मंटू के ऑडियो प्लेयर से जो धाराप्रवाह प्रेम का राग उमड़ता है वह सुनामी से कम नहीं। और चौथा चाँद है, उत्तर टोला वाली चंदा। यही वो भूकंप हैं जो सुनामी का कारण हैं।
पर चंदा सिर्फ किसी कैशोर्य से गुज़रती लड़की से कहीं बढ़कर है। एक तूफान संभाले बैठी है भीतर। यह तूफान हर उस लड़की का है जो समर्थ भी है और प्रतिभाशाली भी, पर समाज के सदियों पुराने रिवाज़ एक ना दिखने वाले पिंजरे की तरह उसे क़ैद किये हुए हैं। अंग्रेज़ी में कहते हैं, 'ग्लास सीलिंग।'
अतुल जी ने उपन्यास भर नहीं लिखा, पूरी झांकी लगा दी है अंचल की। निहायती खूबसूरत। आप अपने हिस्से की कहानी ढूंढ़ कर जी लीजिए। सब है यहाँ, परीक्षा में होने वाली नकल के रॅकेट, पाॅलिटिक्स, गांव की रामलीला, दहेज प्रथा, हौसले तोड़ डालने वाली बाढ़ और प्रेम.. निश्छल, नैसर्गिक प्रेम। यहाँ टिंडर और बंबल की इंस्टेंट सैटिंग नहीं है। दिल को कागज़ पर रख देने वाले पत्रों का पत्राचार है।
प्रेम, जिसमें महीनों सिर्फ़ एक उत्तर की प्रतीक्षा में बीत जाते हैं। जिन्होंने प्रेम किया है(सचमुच का), उन्हें पता है पिया मिलन की आस प्रेम में सबसे खूबसूरत होती है। शायद, पिया और पिया मिलन से भी ज़्यादा।
दृश्यों की तुरपाई भी बड़ी कारीगरी से की गई है। गानों के द्वारा समय और मनोस्थिति का चित्रण कमाल है। और है निपट, शुद्ध, हंसी, ठहाके और आँसू। पढ़िये, बहुत कुछ दे जायेगा, चाँदपुर आपको।
शायद इससे बेहतर तरीके से मैं "चाँदपुर की चंदा" को परिभाषित नहीं कर सकता था।
लेकिन यह तो हुई बात थोड़े परिष्कृत शब्दों में। पर अगर अतुल जी को दिल से कुछ कहना हो तो कहूँगा-
"भैया जी, गर्दा उड़ा दिये!!"
किसी भी लेखन की उत्कृष्टता की पराकाष्ठा का एक आयाम यह भी है कि कहानी में समय, स्थान और समाज को कैसे निरूपित किया गया है। प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि उन्होंने समय, स्थान और समाज को पन्नों पर उतार दिया। और अतुल जी के लिखे में समय, स्थान और समाज, तीनों ही, कहानी में समाकलित चरित्रों की भाँति उभरते दिखते हैं।
आप भारत में किसी भी कोने चले जाईये, यहाँ कस्बों, अंचलों का अपना एक किरदार होता है जो वहाँ रहने वालों की आँखों से लेकर रहने बतियाने के ढ़ंग में, पुरजोर छलक मारता है।
और ह्यूमर तो इन कस्बों की मानो बपौती है। हर कहीं का अपना अलग फ्लेवर है पर भाव वही है। बिना फ़िल्टर, बेधड़क। शायद इसलिए क्योंकि ह्यूमर से जीवन सरल, सरस बना रहता है। हँसी-ठट्ठे में बड़ी-बड़ी मुसीबतें भी खेल लगने लगती हैं। अक्सर जब लोग अपने भाग्य और दुखों पर फूटकर रो नहीं पाते तो हँसने लग जाते हैं। ये यहाँ का डिफेंस-मेकेनिज़्म है।
चाँदपुर भी ऐसा ही है। अपनी तमाम विषमताओं और सामाजिक उधेड़-बुन में उलझे हुए भी, खुली बाहों से आपका स्वागत करता है। आप चाहें तो फूँकन की दुकान पर कुमार सानू या मनोज तिवारी जी के गाने सुनते हुये चाँदपुर से दुनिया-ज़माने की बतकही कर सकते हैं।
"चाँदपुर.." की कहानी को चार चाँद लगाते हैं चाँदपुर के चार चाँद (ये तो चिंगारी जी की कविता सा कुछ हो गया, ख़ैर..)।
पहला तो चाँद, चाँदपुर खुद्दे है। दूसरा वो, जो सांझ ढले सरयू जी की सतह पर चित्रकारी करता-मिटाता रहता है। तीसरा, गोल चेहरे वाला मंटू। बबुआ इस्क हो तो मंटू जैसा हो। पूरब टोले के मंटू के ऑडियो प्लेयर से जो धाराप्रवाह प्रेम का राग उमड़ता है वह सुनामी से कम नहीं। और चौथा चाँद है, उत्तर टोला वाली चंदा। यही वो भूकंप हैं जो सुनामी का कारण हैं।
पर चंदा सिर्फ किसी कैशोर्य से गुज़रती लड़की से कहीं बढ़कर है। एक तूफान संभाले बैठी है भीतर। यह तूफान हर उस लड़की का है जो समर्थ भी है और प्रतिभाशाली भी, पर समाज के सदियों पुराने रिवाज़ एक ना दिखने वाले पिंजरे की तरह उसे क़ैद किये हुए हैं। अंग्रेज़ी में कहते हैं, 'ग्लास सीलिंग।'
अतुल जी ने उपन्यास भर नहीं लिखा, पूरी झांकी लगा दी है अंचल की। निहायती खूबसूरत। आप अपने हिस्से की कहानी ढूंढ़ कर जी लीजिए। सब है यहाँ, परीक्षा में होने वाली नकल के रॅकेट, पाॅलिटिक्स, गांव की रामलीला, दहेज प्रथा, हौसले तोड़ डालने वाली बाढ़ और प्रेम.. निश्छल, नैसर्गिक प्रेम। यहाँ टिंडर और बंबल की इंस्टेंट सैटिंग नहीं है। दिल को कागज़ पर रख देने वाले पत्रों का पत्राचार है।
प्रेम, जिसमें महीनों सिर्फ़ एक उत्तर की प्रतीक्षा में बीत जाते हैं। जिन्होंने प्रेम किया है(सचमुच का), उन्हें पता है पिया मिलन की आस प्रेम में सबसे खूबसूरत होती है। शायद, पिया और पिया मिलन से भी ज़्यादा।
दृश्यों की तुरपाई भी बड़ी कारीगरी से की गई है। गानों के द्वारा समय और मनोस्थिति का चित्रण कमाल है। और है निपट, शुद्ध, हंसी, ठहाके और आँसू। पढ़िये, बहुत कुछ दे जायेगा, चाँदपुर आपको।
July 2, 2026
Imagine living in a society where girls are only allowed to study till the 12th grade and are then forced to get married. A society where having dreams or ambitions is considered wrong. Sadly, such societies still exist.
Reading Chandpur ki Chanda by Atul Kumar Rai made me realize how lucky I am to have parents who believe in the importance of education and have always given me the freedom to make my own decisions.
The story follows Chanda, who lives with her uncle, aunt, elder sister, and grandmother in the village of Chandpur. At its heart, it is also a love story between Chanda (Pinki) and Shashi (Mantu), and the struggles they go through to finally be together.
The character that stayed with me the most was Chanda. Despite living in such difficult circumstances, she never gave up on her education and even encouraged other girls in the village to study. That determination made her a truly inspiring character.
One line that kept coming to my mind while reading was that if every girl had someone like Jhanjha Baba in her life, it would become so much easier for her to dream big and fly freely with confidence.
I would rate this book 3/5 ⭐.
The reason is that I couldn’t connect much with Mantu’s character. I genuinely sympathized with everything that happened to his aunt and cousin sister, but I still didn’t find his character strong or memorable enough. I also felt that a few portions of the book were unnecessarily stretched. Some scenes could have been shorter, and I found myself skipping a few paragraphs just to stay engaged.
Overall, it’s a meaningful story with an important social message, and Chanda’s journey is definitely the highlight of the book for me.
Reading Chandpur ki Chanda by Atul Kumar Rai made me realize how lucky I am to have parents who believe in the importance of education and have always given me the freedom to make my own decisions.
The story follows Chanda, who lives with her uncle, aunt, elder sister, and grandmother in the village of Chandpur. At its heart, it is also a love story between Chanda (Pinki) and Shashi (Mantu), and the struggles they go through to finally be together.
The character that stayed with me the most was Chanda. Despite living in such difficult circumstances, she never gave up on her education and even encouraged other girls in the village to study. That determination made her a truly inspiring character.
One line that kept coming to my mind while reading was that if every girl had someone like Jhanjha Baba in her life, it would become so much easier for her to dream big and fly freely with confidence.
I would rate this book 3/5 ⭐.
The reason is that I couldn’t connect much with Mantu’s character. I genuinely sympathized with everything that happened to his aunt and cousin sister, but I still didn’t find his character strong or memorable enough. I also felt that a few portions of the book were unnecessarily stretched. Some scenes could have been shorter, and I found myself skipping a few paragraphs just to stay engaged.
Overall, it’s a meaningful story with an important social message, and Chanda’s journey is definitely the highlight of the book for me.
September 11, 2025
📚 Book Review 📚
चाँदपुर की चंदा (Chandpur Ki Chanda) by @author.atul
Ratings: 5/5 ⭐
I think we should also give equal focus to our own literature. Reading our regional and national works helps us understand our culture, our past, and the struggles that shaped us. Though Hindi is not my mother tongue, as an Indian I am trying to devote more time to Indian literature because it brings me closer to the soil and voices of my people. Chandpur ki Chanda is one such book that made me reflect deeply on rural realities and social issues.
Atul Kumar Rai’s Chandpur ki Chanda is a rural novel set in the heart of an Indian village. Through its characters and setting, it portrays the socio-economic challenges, traditions, and aspirations of common people. The story revolves around Mantu and Pinki, whose innocent love faces hurdles created by societal norms, power structures, and the persistence of injustice in rural life. Alongside, the novel highlights issues such as corruption, the dowry system, local politics, and the struggles of ordinary villagers against oppression, while also preserving the beauty of rural culture and values.
✍️ Personal Note:
I found it a little difficult at first to read because of the heavy use of rural dialects, but gradually I got used to it. And once I did, I realized how powerful the writing is — it vividly shows how social injustice prevailed in rural areas, how people fought against it, and how, amidst it all, the innocent love between Mantu and Pinki shines through. For me, it’s a 5-star read.
चाँदपुर की चंदा (Chandpur Ki Chanda) by @author.atul
Ratings: 5/5 ⭐
I think we should also give equal focus to our own literature. Reading our regional and national works helps us understand our culture, our past, and the struggles that shaped us. Though Hindi is not my mother tongue, as an Indian I am trying to devote more time to Indian literature because it brings me closer to the soil and voices of my people. Chandpur ki Chanda is one such book that made me reflect deeply on rural realities and social issues.
Atul Kumar Rai’s Chandpur ki Chanda is a rural novel set in the heart of an Indian village. Through its characters and setting, it portrays the socio-economic challenges, traditions, and aspirations of common people. The story revolves around Mantu and Pinki, whose innocent love faces hurdles created by societal norms, power structures, and the persistence of injustice in rural life. Alongside, the novel highlights issues such as corruption, the dowry system, local politics, and the struggles of ordinary villagers against oppression, while also preserving the beauty of rural culture and values.
✍️ Personal Note:
I found it a little difficult at first to read because of the heavy use of rural dialects, but gradually I got used to it. And once I did, I realized how powerful the writing is — it vividly shows how social injustice prevailed in rural areas, how people fought against it, and how, amidst it all, the innocent love between Mantu and Pinki shines through. For me, it’s a 5-star read.
April 26, 2026
क्या किताब थी ये! अपने आप में ही एक दुनिया थी जैसे, तमाम दुनियादारी के साथ निश्चल प्रेम से लिप्त अतुल कुमार राय की यह रचना हमें नव रस के सारे रसों से परिचित कर देती है।
कहानी जहां फिल्मी बोलचाल और बत्कही से शुरू होती है, वही कब ये सामाजिक संरचनाओं पर एक कड़ा प्रहार करने लगती है, यह पता ही नहीं लगने देती है अतुल जी की यह रचना। भाषा इतनी अधिक कसी हुई है जैसे जितना पढ़ो उतना रमते जाओ बस।
कहानी में इतने अधिक पात्र होने के बावजूद कहानी किसी भी मोड़ पर यह लगने नहीं देती कि काफी ज्यादा हो रहा है अब। कहानी आपको अपने शब्दों के बाढ़ में डुबो देती है, कभी पूछती है कि क्या तुमने कभी ऐसा प्रेम किया है तो कभी झंझोर कर कहती है क्या कभी हम बदल पाएंगे या बस अपने को खुश रखने की व्यस्तता को ही जीवन का सार मांगकर जीवन जीते रहेंगे!
कहानी में चांदपुर गांव में जब बाढ़ आजाती है और बाढ़ शिविरों की असलियत से हम सब वाकिफ होते है तो लगता है जैसे किसी ने फूल वाली बगिया से निकालकर अंधेरे कोने में ला खड़ा किया है जहां सब देखा तो जा सकता है लेकिन किया कुछ भी नहीं।
कहानी की नायिका चंदा तो एक नए उम्मीद को समेटे चांदपुर को बेहतर बनाने के उज्ज्वल सपने लिए अपने प्रेम को पा कर कुछ कर दिखाने के लिए निकल पड़ती है , लेकिन कितने ही ऐसी नायिकाएं सामाजिक खांचों में पिस कर अपना दम तोड़ देती हैं। कभी दहेज तो कभी छेड़खानी तो कभी प्रताड़ना उन्हें कभी कुछ बनने का वक्त और साहस ही नहीं देती।
कहानी का अंत तो काफी सुखद है और मेरे दिल में कोई टीस नहीं उठी क्योंकि चांदपुर की चंदा को अपना शिशिर जो मिल गया! सिर्फ शिशिर ही नहीं बल्कि पूरा चांदपुर का सहयोग भी मिला जो, सबसे ज्यादा तो एक ऐसे व्यक्ति का सहयोग मिला जिसने चंदा के पिता होना का फर्ज निभाया!
कहानी जहां फिल्मी बोलचाल और बत्कही से शुरू होती है, वही कब ये सामाजिक संरचनाओं पर एक कड़ा प्रहार करने लगती है, यह पता ही नहीं लगने देती है अतुल जी की यह रचना। भाषा इतनी अधिक कसी हुई है जैसे जितना पढ़ो उतना रमते जाओ बस।
कहानी में इतने अधिक पात्र होने के बावजूद कहानी किसी भी मोड़ पर यह लगने नहीं देती कि काफी ज्यादा हो रहा है अब। कहानी आपको अपने शब्दों के बाढ़ में डुबो देती है, कभी पूछती है कि क्या तुमने कभी ऐसा प्रेम किया है तो कभी झंझोर कर कहती है क्या कभी हम बदल पाएंगे या बस अपने को खुश रखने की व्यस्तता को ही जीवन का सार मांगकर जीवन जीते रहेंगे!
कहानी में चांदपुर गांव में जब बाढ़ आजाती है और बाढ़ शिविरों की असलियत से हम सब वाकिफ होते है तो लगता है जैसे किसी ने फूल वाली बगिया से निकालकर अंधेरे कोने में ला खड़ा किया है जहां सब देखा तो जा सकता है लेकिन किया कुछ भी नहीं।
कहानी की नायिका चंदा तो एक नए उम्मीद को समेटे चांदपुर को बेहतर बनाने के उज्ज्वल सपने लिए अपने प्रेम को पा कर कुछ कर दिखाने के लिए निकल पड़ती है , लेकिन कितने ही ऐसी नायिकाएं सामाजिक खांचों में पिस कर अपना दम तोड़ देती हैं। कभी दहेज तो कभी छेड़खानी तो कभी प्रताड़ना उन्हें कभी कुछ बनने का वक्त और साहस ही नहीं देती।
कहानी का अंत तो काफी सुखद है और मेरे दिल में कोई टीस नहीं उठी क्योंकि चांदपुर की चंदा को अपना शिशिर जो मिल गया! सिर्फ शिशिर ही नहीं बल्कि पूरा चांदपुर का सहयोग भी मिला जो, सबसे ज्यादा तो एक ऐसे व्यक्ति का सहयोग मिला जिसने चंदा के पिता होना का फर्ज निभाया!
September 11, 2025
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना!
पर तुझे है नाश पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!
महादेवी वर्मा जी की यह कविता, उपन्यास की नायिका पिंकी उर्फ कुमारी चंदा पर एकदम सटीक बैठती है। पढ़ने में तेज, सिलाई-कढ़ाई में आगे, संगीत में निपुण, वो सारे गुण चंदा में हैं जो गाँव की एक कन्या में कूट-कूट के भरा होता है, पर कहते हैं न जीवन इतना आसान कहां प्यारे। वैसे ही चंदा के जीवन में भी परेशानियाँ ऐसे घेर कर बैठी है जैसे उनका अपना घर हो।
उपन्यास का नायक मंटू , एक आवारा किस्म का लड़का जो सुबह के दस बजे सो कर उठता है और दस बारह दिन में स्कूल जाता है, उसको कुमारी चंदा से प्यार हो जाता है। फिर आगे की कहानी कहती है यह उपन्यास...
सामाजिक कुरीतियाँ, गाँव की राजनीति, लड़कियों के प्रति समाज की निम्न सोच, दहेज प्रथा से प्रताड़ित युवतियां , वो सबकुछ जो गाँवों में या फिर छोटे-छोटे शहरों में नहीं होनी चाहिए पर होती है।अतुल जी ने बखूबी तरीके से लिखा है।
अतुल कुमार राय जी द्वारा लिखित यह उपन्यास बेहद सरल भाषी है, सहज भाव से और इतनी गहराई में सारी चीज़ों का चित्रण किया है और उनकी मज़बूत शैली वाकई में क़ाबिले तारीफ़ है। राय जी की लेखनी में ग्रामीण जीवन का मार्मिक चित्रण बेहद ही पसंदीदा हिस्सा रहा मेरा।
आप सब भी पढ़िए इस उपन्यास को और अपने भाव प्रकट करिए।
धन्यवाद राय जी!
@epicreadsindiaa
जाग तुझको दूर जाना!
पर तुझे है नाश पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!
महादेवी वर्मा जी की यह कविता, उपन्यास की नायिका पिंकी उर्फ कुमारी चंदा पर एकदम सटीक बैठती है। पढ़ने में तेज, सिलाई-कढ़ाई में आगे, संगीत में निपुण, वो सारे गुण चंदा में हैं जो गाँव की एक कन्या में कूट-कूट के भरा होता है, पर कहते हैं न जीवन इतना आसान कहां प्यारे। वैसे ही चंदा के जीवन में भी परेशानियाँ ऐसे घेर कर बैठी है जैसे उनका अपना घर हो।
उपन्यास का नायक मंटू , एक आवारा किस्म का लड़का जो सुबह के दस बजे सो कर उठता है और दस बारह दिन में स्कूल जाता है, उसको कुमारी चंदा से प्यार हो जाता है। फिर आगे की कहानी कहती है यह उपन्यास...
सामाजिक कुरीतियाँ, गाँव की राजनीति, लड़कियों के प्रति समाज की निम्न सोच, दहेज प्रथा से प्रताड़ित युवतियां , वो सबकुछ जो गाँवों में या फिर छोटे-छोटे शहरों में नहीं होनी चाहिए पर होती है।अतुल जी ने बखूबी तरीके से लिखा है।
अतुल कुमार राय जी द्वारा लिखित यह उपन्यास बेहद सरल भाषी है, सहज भाव से और इतनी गहराई में सारी चीज़ों का चित्रण किया है और उनकी मज़बूत शैली वाकई में क़ाबिले तारीफ़ है। राय जी की लेखनी में ग्रामीण जीवन का मार्मिक चित्रण बेहद ही पसंदीदा हिस्सा रहा मेरा।
आप सब भी पढ़िए इस उपन्यास को और अपने भाव प्रकट करिए।
धन्यवाद राय जी!
@epicreadsindiaa
October 7, 2025
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना!
पर तुझे है नाश पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!
महादेवी वर्मा जी की यह कविता, उपन्यास की नायिका पिंकी उर्फ कुमारी चंदा पर एकदम सटीक बैठती है। पढ़ने में तेज, सिलाई-कढ़ाई में आगे, संगीत में निपुण, वो सारे गुण चंदा में हैं जो गाँव की एक कन्या में कूट-कूट के भरा होता है, पर कहते हैं न जीवन इतना आसान कहां प्यारे। वैसे ही चंदा के जीवन में भी परेशानियाँ ऐसे घेर कर बैठी है जैसे उनका अपना घर हो।
उपन्यास का नायक मंटू , एक आवारा किस्म का लड़का जो सुबह के दस बजे सो कर उठता है और दस बारह दिन में स्कूल जाता है, उसको कुमारी चंदा से प्यार हो जाता है। फिर आगे की कहानी कहती है यह उपन्यास...
सामाजिक कुरीतियाँ, गाँव की राजनीति, लड़कियों के प्रति समाज की निम्न सोच, दहेज प्रथा से प्रताड़ित युवतियां , वो सबकुछ जो गाँवों में या फिर छोटे-छोटे शहरों में नहीं होनी चाहिए पर होती है।अतुल जी ने बखूबी तरीके से लिखा है।
अतुल कुमार राय जी द्वारा लिखित यह उपन्यास बेहद सरल भाषी है, सहज भाव से और इतनी गहराई में सारी चीज़ों का चित्रण किया है और उनकी मज़बूत शैली वाकई में क़ाबिले तारीफ़ है। राय जी की लेखनी में ग्रामीण जीवन का मार्मिक चित्रण बेहद ही पसंदीदा हिस्सा रहा मेरा।
आप सब भी पढ़िए इस उपन्यास को और अपने भाव प्रकट करिए।
धन्यवाद राय जी!
जाग तुझको दूर जाना!
पर तुझे है नाश पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!
महादेवी वर्मा जी की यह कविता, उपन्यास की नायिका पिंकी उर्फ कुमारी चंदा पर एकदम सटीक बैठती है। पढ़ने में तेज, सिलाई-कढ़ाई में आगे, संगीत में निपुण, वो सारे गुण चंदा में हैं जो गाँव की एक कन्या में कूट-कूट के भरा होता है, पर कहते हैं न जीवन इतना आसान कहां प्यारे। वैसे ही चंदा के जीवन में भी परेशानियाँ ऐसे घेर कर बैठी है जैसे उनका अपना घर हो।
उपन्यास का नायक मंटू , एक आवारा किस्म का लड़का जो सुबह के दस बजे सो कर उठता है और दस बारह दिन में स्कूल जाता है, उसको कुमारी चंदा से प्यार हो जाता है। फिर आगे की कहानी कहती है यह उपन्यास...
सामाजिक कुरीतियाँ, गाँव की राजनीति, लड़कियों के प्रति समाज की निम्न सोच, दहेज प्रथा से प्रताड़ित युवतियां , वो सबकुछ जो गाँवों में या फिर छोटे-छोटे शहरों में नहीं होनी चाहिए पर होती है।अतुल जी ने बखूबी तरीके से लिखा है।
अतुल कुमार राय जी द्वारा लिखित यह उपन्यास बेहद सरल भाषी है, सहज भाव से और इतनी गहराई में सारी चीज़ों का चित्रण किया है और उनकी मज़बूत शैली वाकई में क़ाबिले तारीफ़ है। राय जी की लेखनी में ग्रामीण जीवन का मार्मिक चित्रण बेहद ही पसंदीदा हिस्सा रहा मेरा।
आप सब भी पढ़िए इस उपन्यास को और अपने भाव प्रकट करिए।
धन्यवाद राय जी!
July 23, 2026
It's my first time reading Atul Kumar Rai.
Chadpur ki chanda iski likhavat itni pyaari hai. It's bhojpuri hindi it took me some time to get used to it.
This Book is love story off course par is book ko bs love story kehna iska apna he hoga.
Story is based in 2006 it's about the chandpur and it's people jaha pe aj bhi yeh socha jata hai ki ladkiyo ki padhai pr paise kharch na karke unke dahej ke liye paise bachaye jate hai aur yeh man liya jata hai ki itna jyda dahej untne he beti khus rahegi.
One thing I love about this book the most is Happy Ending. Unlike many authors Atul Kumar Rai ne yeh socha ki ek kahni achi hone ke liye,use yaad rakha jane ke liye har baar sad ending deni jaruri nhi hai.
This Book healed the scars that were left by gunahon ke dekha and reet ki machli.
Jis gaaon mein dahej ke liye ladkiyon ko pareshan Kiya jata hai,jinda jala jata hai,mara jata hai us gaaon mein pehli baar Bina dahej ke shaadi hue woh shaadi thi Chanda(Pinki) aur Shashi(Manto) ki.
Shaadi ke baad bhi Chanda gaav mein apne ek school kholkar ladkiyo ko padhati hai.Aur apni jaisi aur bhi Chandyo ki madat karti hai.
If you are still confused about this book please read it you'll love it.
Chadpur ki chanda iski likhavat itni pyaari hai. It's bhojpuri hindi it took me some time to get used to it.
This Book is love story off course par is book ko bs love story kehna iska apna he hoga.
Story is based in 2006 it's about the chandpur and it's people jaha pe aj bhi yeh socha jata hai ki ladkiyo ki padhai pr paise kharch na karke unke dahej ke liye paise bachaye jate hai aur yeh man liya jata hai ki itna jyda dahej untne he beti khus rahegi.
One thing I love about this book the most is Happy Ending. Unlike many authors Atul Kumar Rai ne yeh socha ki ek kahni achi hone ke liye,use yaad rakha jane ke liye har baar sad ending deni jaruri nhi hai.
This Book healed the scars that were left by gunahon ke dekha and reet ki machli.
Jis gaaon mein dahej ke liye ladkiyon ko pareshan Kiya jata hai,jinda jala jata hai,mara jata hai us gaaon mein pehli baar Bina dahej ke shaadi hue woh shaadi thi Chanda(Pinki) aur Shashi(Manto) ki.
Shaadi ke baad bhi Chanda gaav mein apne ek school kholkar ladkiyo ko padhati hai.Aur apni jaisi aur bhi Chandyo ki madat karti hai.
If you are still confused about this book please read it you'll love it.
This entire review has been hidden because of spoilers.
December 6, 2025
चाँदपुर की चन्दा” पढ़ते समय ऐसा लगा जैसे मैं किसी कहानी को नहीं, बल्कि किसी अपने को देख रही हूँ। चन्दा का मासूमपन, उसकी छोटी-छोटी खुशियाँ, और उसके भीतर का साफ दिल—यह सब मेरे दिल को गहराई तक छू गया।
कई बार पढ़ते-पढ़ते मैं रुक गई…
चन्दा की सोच, उसके सपने, और उसके हालात देखकर लगा कि दुनिया इतनी बड़ी नहीं होती, जितना बड़ा एक बच्चे का दिल होता है। उसकी तकलीफ़ें किसी अजनबी की नहीं लगतीं—ऐसा महसूस होता है जैसे वह मेरे ही घर की बच्ची हो, जिसके लिए मैं खुद कुछ अच्छा होने की उम्मीद करती रहूँ।
अतुल कुमार राय ने चाँदपुर के माहौल को जिस सादगी से लिखा है, उससे पूरा गाँव आँखों के सामने उतर आता है—कच्चे रास्ते, लोगों की बोली, घरों की गर्माहट, और जिंदगी की कड़वी-सच्ची बातें।
और इन सबके बीच चन्दा… जो अपनी छोटी उम्र में ही बहुत कुछ झेलती है, पर फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ती।
कहानी खत्म होने के बाद भी दिल भरा-भरा सा रहा।
एक हल्की सी उदासी… और साथ ही एक नरम-सी मुस्कान कि चन्दा जैसी मासूमियत आज भी दुनिया में कहीं न कहीं बची है।
यह किताब सिर्फ पढ़ी नहीं जाती, महसूस होती है—और खत्म होने के बाद भी दिल में बहुत देर तक रहती है।
मेरे लिए “चाँदपुर की चन्दा” एक कहानी नहीं, एक अनुभव है।
कई बार पढ़ते-पढ़ते मैं रुक गई…
चन्दा की सोच, उसके सपने, और उसके हालात देखकर लगा कि दुनिया इतनी बड़ी नहीं होती, जितना बड़ा एक बच्चे का दिल होता है। उसकी तकलीफ़ें किसी अजनबी की नहीं लगतीं—ऐसा महसूस होता है जैसे वह मेरे ही घर की बच्ची हो, जिसके लिए मैं खुद कुछ अच्छा होने की उम्मीद करती रहूँ।
अतुल कुमार राय ने चाँदपुर के माहौल को जिस सादगी से लिखा है, उससे पूरा गाँव आँखों के सामने उतर आता है—कच्चे रास्ते, लोगों की बोली, घरों की गर्माहट, और जिंदगी की कड़वी-सच्ची बातें।
और इन सबके बीच चन्दा… जो अपनी छोटी उम्र में ही बहुत कुछ झेलती है, पर फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ती।
कहानी खत्म होने के बाद भी दिल भरा-भरा सा रहा।
एक हल्की सी उदासी… और साथ ही एक नरम-सी मुस्कान कि चन्दा जैसी मासूमियत आज भी दुनिया में कहीं न कहीं बची है।
यह किताब सिर्फ पढ़ी नहीं जाती, महसूस होती है—और खत्म होने के बाद भी दिल में बहुत देर तक रहती है।
मेरे लिए “चाँदपुर की चन्दा” एक कहानी नहीं, एक अनुभव है।
May 5, 2026
here’s something quietly powerful about चाँदपुर की चंदा. It doesn’t try to impress you with big twists or dramatic turns—instead, it stays rooted in simplicity, and somehow that’s where its strength lies.
The story flows like a slow village evening. Nothing feels rushed. The characters, especially Chanda, feel real—like people you might have known or seen. Her emotions, her struggles, and the way society shapes her choices… all of it feels painfully authentic.
What stayed with me the most is how the book captures the tension between what the heart wants and what society allows. It doesn’t shout its message—it lets you feel it.
That said, the pace is slow, and if you're used to fast-moving plots, this might feel a bit too simple at times. But if you’re in the mood for something reflective and grounded, this book quietly delivers.
Final Thoughts:
Not a loud story, but a lasting one. The kind that lingers in the background of your thoughts long after you’ve turned the last page.
⭐ Rating: 4/5
The story flows like a slow village evening. Nothing feels rushed. The characters, especially Chanda, feel real—like people you might have known or seen. Her emotions, her struggles, and the way society shapes her choices… all of it feels painfully authentic.
What stayed with me the most is how the book captures the tension between what the heart wants and what society allows. It doesn’t shout its message—it lets you feel it.
That said, the pace is slow, and if you're used to fast-moving plots, this might feel a bit too simple at times. But if you’re in the mood for something reflective and grounded, this book quietly delivers.
Final Thoughts:
Not a loud story, but a lasting one. The kind that lingers in the background of your thoughts long after you’ve turned the last page.
⭐ Rating: 4/5
April 13, 2024
A Good Story
I listened to this book in audible and the story and narrator did a great job. Throughout the story, we can see the unwavering love of Mantu towards Pinky. This takes place in a village named Chandpur, and a bit of comparison between village and city people. The book focuses mostly on Pinky's life and the difficulties faced by her in her household. At last, it delivers the message that a girl's decision or opinion is crucial in her life whether it's related to marriage or education, and how some households don't ask for the girl's opinion in marriage, and also discusses the problems of how boys are viewed in present-day society. It was fun listening to the audio book and if we are from an Indian household we can relate to it even more even though we are living in the modern-day world.
I listened to this book in audible and the story and narrator did a great job. Throughout the story, we can see the unwavering love of Mantu towards Pinky. This takes place in a village named Chandpur, and a bit of comparison between village and city people. The book focuses mostly on Pinky's life and the difficulties faced by her in her household. At last, it delivers the message that a girl's decision or opinion is crucial in her life whether it's related to marriage or education, and how some households don't ask for the girl's opinion in marriage, and also discusses the problems of how boys are viewed in present-day society. It was fun listening to the audio book and if we are from an Indian household we can relate to it even more even though we are living in the modern-day world.
March 16, 2026
Chandpur ki Chanda by Atul Kumar Rai is a simple and heartfelt story set in a small village. The writing brings out the everyday life of the place very naturally and the story moves at a calm pace. What I liked the most was the innocence in the love story. It is sweet, honest and not overdramatic, which makes it feel very real.
The overall feel of the book reminded me of reads like Kasap and Kohber ki Shert. Stories that quietly talk about people, relationships and society without trying to shock the reader. Chandpur ki Chanda is a soft, emotional read that stays with you because of its simplicity.
The overall feel of the book reminded me of reads like Kasap and Kohber ki Shert. Stories that quietly talk about people, relationships and society without trying to shock the reader. Chandpur ki Chanda is a soft, emotional read that stays with you because of its simplicity.
September 26, 2026
Overall it's a good book ... Although in the beginning the pace of the story and the description of the characters and their surrounding, by the writer feels bit over but in the final part the novel became more and more interesting... Many of the issues are not resolved in the book, and feel like the writer intentionally keep them all unresolved to let the reader think more and more about it..... And finally I appreciate the writer for his perfect description of the life of the North Indian villages , their basic problems, dirty politics, women conditions, Orthodox and superstitions, and the social bonding among them, their custom and practices , their community participation in festivals , their emotions towards thier animal, land , tree etc.
Overall it's a good book to read....
Overall it's a good book to read....
December 15, 2022
एक प्रेम कथा पर आधारित उपन्यास
यह प्रेम कथा पर आधारित उपन्यास जिस मैं पूर्वांचल के आंचलिक भाषा का प्रयोग एवं उसके प्राकृतिक सौंदर्य का बहुत ही सुंदर वर्णन है लेखक ने पूर्वांचल के जन जीवन का बाढ़ एवं गरीबी से उनके संघर्ष को सूचित किया है साथ ही वहां की गिर रही शिक्षा पद्धति का भी वर्णन किया है
यह प्रेम कथा पर आधारित उपन्यास जिस मैं पूर्वांचल के आंचलिक भाषा का प्रयोग एवं उसके प्राकृतिक सौंदर्य का बहुत ही सुंदर वर्णन है लेखक ने पूर्वांचल के जन जीवन का बाढ़ एवं गरीबी से उनके संघर्ष को सूचित किया है साथ ही वहां की गिर रही शिक्षा पद्धति का भी वर्णन किया है
January 18, 2025
इस पुस्तक की काफ़ी तारीफ़ सुनी थी। सोचा था अन्य समानांतर उपन्यासों की भाँति इसमें भी हम खोते ही जाएँगे। पर कहानी इतनी धीमी चल रही थी और रसहीन महसूस हो रही थी, कि १०% पढ़ने के बाद ही हथियार डालने को मजबूर होना पड़ा।
डार्क हॉर्स, या बनारस टॉकीज काफ़ी बेहतर है। श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी भी उत्तम है। इसे फिर किसी दिन के लिए रखते हैं :)
डार्क हॉर्स, या बनारस टॉकीज काफ़ी बेहतर है। श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी भी उत्तम है। इसे फिर किसी दिन के लिए रखते हैं :)
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