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160 pages, Paperback
Published November 7, 2019
देखने के लिए हम बहुत ख़ूबसूरत और बड़ा आसमान देख सकते हैं। पर जीने के लिए… हम उतना ही आकाश जी पाएँगे… जितने आकाश को हमने, अपने घर की खिड़की में से जीना सीखा है।
यहाँ के बूढ़े लोगों को देखने में बहुत सुख है। उनका अपनी पहली कॉफ़ी पीना भी मुझे प्रेम लगता है। उनके पास बहुत वक़्त है। उन्हें कहीं जाना नहीं है। वह देर तक चिड़िया का अगल-बग़ल होना देखते रहते हैं। मुझे उनके भीतर चल रही हर हरकत बेहद पसंद आती है और अगर वह भीतर घट रही किसी बात पर मुस्कुराते हैं तो उनसे ख़ूबसूरत और कुछ नहीं होता। उनकी स्थिरता में एक नाटक है, कहानी है। वह अपने साथ अपना पूरा जीवन लिए कॉफ़ी पीते हैं।यूँ तो मेरी उन लोगों से, जो दुनिया देखने की लालसा को दिल में लिए अकेले ही राहों के हो लेते हैं, कुछ ख़ास लगाव है, उनके लेखक होने पर वह कुछ ज़्यादा अपने से लगते हैं | शायद मेरे अंदर की अधूरी लेखिका इस बात को कहना चाहता थी , सो उसने कह दी | शायद इसीलिए इस वृत्तांत से मुझे लगाव भी व और थोड़ी ईर्ष्या भी |
एक तरह से एक ही यात्रा में दो यात्रायें चल रही हैं।
अपने यात्रा-वृत्तांत को पढ़ते हुए लगा की किस कदर एक कहानी की तरह सुनाई दे रहा है। बस इसमें कहानी लिखने की जोड़-तोड़ नहीं है। ये अपनी सारी खामी के साथ जैसा-का-तैसा है। मैं इसे कतई काटना-छांटना भी नहीं चाहता हूँ।
यात्राएं ऐसी ही होती है। कुछ दिन बहुत अच्छे जाते हैं और कई दिनों आपको पता नहीं चलता की आप असल मैं कर क्या रहे हैं?