छायावाद के चार स्तंभों में से एक और महाकव्य "कामायनी" के रचयिता श्री जयशंकर प्रसाद जी ने अपने जीवनकाल में गिनती के उपन्यास रचे, यह उपन्यास उनकी पहली ओपन्यासिक कृति थी और सन 1930 ई में प्रकाशित हुई थी। इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने उस युग के भारत में फ़ैल रहे सामाजिक, जातिगत आडंबरों पर तीखा प्रहार किया है। लेखक ने उस युग के बहुत से ज्वलंत मुद्दों को कहानी के पात्रों, कथानक आदि का सहारा लेकर पाठक के सामने रखा है।
कहानी के पात्र :- कहानी बहुत लंबी है और इसमें ढेर सारे पात्र हैं। कहानी के पात्र समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। कहानी में जहाँ निरंजांदास जैसे ढोंगी साधु हैं जो धर्म और शुद्धता की आड में अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं, साधु होकर भी जिनका स्वयं की इन्द्रियों पर कोई वश नहीं, वहीं कृष्णशरण जैसे धर्मात्मा योगी भी हैं जो मानते हैं कि मानव सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं। श्रीचन्द्र, किशोरी जैसे अमीर युगल जोड़े भी हैं जो धन रहते हुए भी सुखी नहीं, अपने पथ से भ्रष्ट हो जाते हैं और तनिक भी मलाल नहीं करते। तारा जैसी अबला लडकी है जिसने सिवाय दुख के जीवन भर कुछ नहीं देखा। सब त्याग कर भी उसे सुख की प्राप्ति नहीं होती , वहीं घंटी जैसी अबला लड़की को अपनी खोयी हुई माँ और जीवन जीने का एक दूसरा मौका भी मिलता है। मंगलदेव जैसा पात्र है जिसे अपनी गलतियों को सुधारने का अवसर भी मिलता है और एक नई ज़िंदगी शुरु करने का भी। वहीं, विजय जैसे पात्र को बिना कोई बड़ी भूल किये अत्यन्त कठोर जीवन गुजारने का अभिशाप मिलता है । इसी तरह बाथम का पात्र भी है जो धर्म से ईसाई है और किसी भी हद तक जाकर अपने धर्म का प्रचार और भोले भाले लोगों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित करता है। इसी तरह लतिका, सुशीला, गाला आदि स्त्री पात्र हैं जो पुरुषों के ऊपर आश्रित हैं और अपने अस्तित्व को ढूँढते रहते हैं। कहानी उत्तर भारत के महत्वूर्ण धार्मिक स्थल जैसे काशी, मथुरा, हरिद्वार, वृंदावन आदि में संपन्न होती है।
कथानक पर चर्चा :- कहानी हरिद्वार के पवित्र घाट से शुरु होती है जब युगल जोड़ी श्रीचन्द्र और किशोरी संतान प्राप्ति का वर मांगने एक पहुँचे हुए साधु मुनि के पास आते हैं। गुरु निरंजनदास अपनी बालसखा किशोरी को पहचान लेते हैं। गुरु की तपस्या भंग हो जाती है और अनैतिक संबंध स्थापित करके किशोरी के पुत्र विजय का जन्म होता है। धर्म और कर्मकांड के नामपर उस वक्त किस तरह का ढोंग फैला हुआ था, ये हमारे सामने प्रकट होता है। अंधविश्वास और पुत्र मोह की आड़ में कितने ही अनैतिक धंधे चल रहे थे l
दूसरी ओर तारा की कहानी है जो तीर्थ स्थलों पर रहने वाले गिरोह के हत्थे चढ़ जाती है, माता पिता का साथ छूट जाता है और वैश्यावृति के धंधे में धकेल दी जाती है। मंगल जो एक स्वयंसेवक है उसे इस नर्क से बचा लेता है लेकिन समाज के डर से तारा के पिता उसे वापस से स्वीकार नहीं करते हैं। मंगल आर्य समाजी बन जाता है और तारा के कल्याण को अपना लक्ष्य बना लेता है। दोनों में प्रेम पनपता है और शादी की तैयारियां भी की जाती हैं। नियति को यद्यपि कुछ और मंजूर होता है, मंगल के हाथ पैर फूल जाते हैं और वो सब कुछ छोड़कर भाग जाता है। इधर तारा अनेक कष्ट सहकर एक पुत्र को जन्म देती है, उसे त्याग कर वो ख़ुदकुशी करने का विफल प्रयास भी करती है और अन्ततः भीख मांगते हुए काशी नगरी में किशोरी के द्वार पर आ खड़ी होती है। किशोरी का पुत्र विजय मन ही मन घर के काम करने वाली यमुना (तारा का बदला हुआ नाम) से प्रेम करने लग जाता है। इधर विधि का विधान भी मंगल को काशी के उसी स्कूल में दाखिला दिला देता है जिसमें विजय पढ़ता है। दोनों गाढ़े दोस्त बन जाते हैं और एक समय मंगल अपना ठिकाना विजय का घर ही बना लेता है। मंगल और यमुना का आमना सामना भी होता है परंतु दोनों एक दूसरे के भेद प्रकट नहीं करते हैं। इधर, विजय बाबू का प्रणय निवेदन यमुना अस्वीकार कर देती है जिससे वो आहत होते हैं।
कुछ ही समय बाद विजय बाबू को वृंदावन जाकर एक बाल विधवा "घंटी" मिल जाती है जिसके साथ उनका प्रेम प्रसंग चालू हो जाता है। बाल विधवाओं की दुर्दशा का विषय भी बख़ूबी उकेरा है लेखक ने। काशी, मथुरा, वृंदावन आदि में ये बाल विधवाएँ घर वालों द्वारा त्याग दी जाती थीं और यहाँ का कुलीन समाज इनका खूब शोषण करता था। विधवा पुनर्विवाह की स्वीकृति ना होने के कारण कितनी ही अबला औरतें अत्यधिक कष्टप्रद जीवन जीने को विवश थीं। विजय का अपनी माता किशोरी और निरंजन दास से धर्म के विभिन्न विषयों पर गहरा मतभेद रहता है। विजय युवा है और मानता है कि समयानुसार हिन्दू धर्म के अंदर बहुत सी कुरीतियों ने अपना घर बना लिया है। इसका कारण हमारी सदियों पुरानी जाति प्रथा और मनुष्य का मनुष्य से बेहतर होने की आकांक्षा ही है। मंगल ने भी मथुरा में एक आश्रम खोलकर निर्धन बच्चों को पढ़ाने का कार्यक्रम चालू कर दिया है और भिक्षा लेने किशोरी के द्वार आ पहुंचता है। किशोरी से मतभेद के कारण विजय और घंटी घर छोड़कर निकल जाते हैं और संयोगवश एक इसाई व्यापारी बाथम के यहां शरण पाते हैं। बाथम की संगिनी लतिका मूल रूप से हिन्दू होती है पर उसे ये कहकर ईसाइयत कबूल करवायी जाती है कि इसाई धर्म में औरतें ज्यादा स्वंतत्र हैं और उनके अधिकार भी सुरक्षित हैं। कहानी में बाथम के किरदार के माध्यम से लेखक ने बताया है कि किस प्रकार लालची लोग भोले मनुष्यों को बहला फुसलाकर उनका धर्मांतरण करने में लगे थे। बाथम और गिरिजाघर का पादरी लोगों से कहते हैं कि इसाई बन जाओगे तो मसीह तुम्हारे सारे गुनाह माफ करेगा। इसपर एक बार एक गाँव वाला उठकर बोल पड़ा कि हमारे हिन्दू धर्म में तो ऐसे लफड़े हैं ही नहीं, यहां तो जो जैसा करता है, वो वैसा भरता है। सो, यहां अच्छे कर्म की ही प्रधानता है। निरुत्तर होकर बाथम और पादरी दूसरी तरफ चल पड़ते हैं। यह सब इसलिए संभव हुआ था क्योंकि हिन्दू धर्म में उस काल में इतनी सड़ांध फ़ैल गई थी जिससे निजात पाना अत्यंत आवश्यकत था। समाज में फेले हुए अंधविश्वास और विद्रूपताओं पर भी लेखक ने तीखा व्यंग्य किया है। उस समय के समाज में स्त्रियों की दुर्दशा पर भी लेखक ने बहुत कुछ लिखा है l फ़िर चाहे वो स्त्री पात्रों के बीच के संवाद हों या फ़िर स्त्री पात्रों के अन्य पात्रों से वार्तालाप, शिकायत आदि। इधर अबला यमुना(तारा) को कृष्णशरण महाराज के आश्रम में आश्रय मिल जाता है। मंगलदेव अब गूजर बालकों को शिक्षित कर रहा है और उसे गाला नामक एक यवनी गूजर बालिका का सहयोग भी मिलता है। धर्म में फैली विसंगतियों का निवारण करने और दबे कुचलों की सहायता हेतु मंगल भारत संघ की भी स्थापना करता है। इस संघ के माध्यम से हिन्दू धर्म के प्राचीन सिद्धांतों का प्रचार प्रसार भी किया जाता है। अन्य सभी पात्रों का जीवन किस दिशा में अग्रसर होता है, ये रहस्य आप उपन्यास पढ़कर खत्म कर सकते हैं।
लेखक की भाषा में तत्सम शब्दों की भरमार है। कहानी की भाषा अत्यंत प्रावाहमयी है । इतने सारे पात्रों और जगहों में घटने वाले घटनाक्रम के बावजूद पाठक ऊबता या कंफ्यूज नहीं होता है। मुझे कहानी में पैदा हुए इत्तेफाक कई बार ज़रा काल्पनिक से लगे, जैसे पात्रों का एक दूसरे से एक ही जगह पर मिलना , एक दूसरे के साथ उनके परस्पर संबंध इत्यादि। कुछेक घटनाएं ऐसी थी जिन की वास्तविकता पर यकीन करना भी ज़रा मुश्किल लगा। उपन्यास का शीर्षक "कंकाल" रखने का कारण मुझे अंत तक कचोटता रहा और मेरी समझ के मुताबिक हमारे समाज की ओर इशारा है जो पुराने रीति रिवाजों की बेड़ियों में फंसकर ढ़ांचा (कंकाल) मात्र ही रह गया है। यह उपन्यास धर्म, समाज, स्त्री विमर्श आदि विषयों में रुचि रखने वाले मित्रों के लिए जरूर पढ़ी जाने लायक किताब है।
- अरुण मिश्रा