मैंने जिस उत्सुकता से इसे पढ़ना शुरू किया था, उसके विपरित निकली ये। 9 कहानियों का संग्रह है, और सभी कहानियां, बिना सिर पैर की, ऊलजलूल। लेखक ने बहुत ही भद्दे शब्दों का चयन किया है। जाहिर से बात है, जब कहानी मे दम ही नहीं रहेगा तो भद्दापन का ही सहारा लिया जाएगा। सर भारी हो गया है इसको पढ़ के, बस किसी तरह जल्दी से खत्म करना था क्यूंकि शुरू कर दिया था। पता नहीं बाकी लोगों को इसमे क्या पसंद आया, मुझे तो रत्ती भर भी ये पसंद नहीं आई, और अब से इन लेखक का मैं कोई और रचना पढ़ने से रही। इस किताब को पढ़ कर मुझे बहुत पछतावा हो रहा है।