तल्ख़ियां साहिर लुधियानवी की सबसे पहली किताब थी और इसमें 67 गीत और ग़ज़लें हैं। कॉलेज के दिनों से ही साहिर ने शायरी शुरू कर दी थी और लोग इसे पसन्द भी करने लगे थे, लेकिन उनकी अलग पहचान तल्ख़ियां के प्रकाशन से ही बनने लगी। उर्दू में लिखी यह किताब बहुत लोकप्रिय हुई और इसके कई संस्करण छपे। 1958 में इसका हिन्दी रूपान्तर राजपाल एण्ड सन्ज़ से प्रकाशित हुआ। साहिर के चाहने वाले पाठकों की माँग पर अब इसका नया संस्करण प्रस्तुत है। साहिर लुधियानवी को उनकी शायरी के लिए तो याद किया ही जाएगा लेकिन साथ ही उन्हें हिन्दी सिनेमा में गीतों को एक नई पहचान और मुकाम देने के लिए भी हमेशा याद रखा जायेगा। लुधियाना के एक मुस्लिम परिवार में जन्मे साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हयी था। कॉलेज की शिक्षा के बाद वे लुधियाना से लाहौर चले गए और उर्दू पत्रिकाओं में काम करने लगे। जब एक विवादग्रस्त बयान के कारण पाकिस्तान सरकार ने उनकी ग़िरफ़्तारी के वारन्ट निकाले तो 1949 में लाहौर छोड़ कर साहिर भारत आ गये और मुंबई में अपना ठिकाना बनाया। हिन्दी सिनेमा की दुनिया के वे बेहद लोकप्रिय गीतकार साबित हुए और दो बार उन्हें फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड से नवाज़ा गया। उनके फ़न की क़दर करते हुए भारत सरकार ने 1971 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। 1980 में 59 साल की उम्र में साहिर लुधियानवी की मृत्यु हो गई।
लोग कहते हैं कि पहले के गाने दार्शनिक अर्थ लिए होते थे- ये सच है। और ऐसा इसलिए था कि पहले के लिरिसिस्ट कवि और शायर होते थे। मुझे कोई ताज्जुब नही होगा अगर कोई मुझसे आकर कहे कि आजकल के गानों में दम नही या उनमे से कुछ फूहड़ और द्विअर्थी है- क्योंकि कुछ गीतकारों को छोड़ कर ( जैसे गुलजार, जावेद अख्तर, प्रसून जोशी, इरशाद कामिल, कौसर मुनीर आदि) बाकी दूसरे जो भी है वो कमतर है और रही-सही कसर रीमिक्स, आइटम सॉन्ग और रैप ने पूरी कर दी है। पर्सनली मुझे रीमिक्स से बहुत ज्यादा नफरत है- मेरे ख्याल से यह एक अच्छे-भले गाने का रेप करने के बराबर है। . खैर, किताब पर आते हैं। ऊपर का लेक्चर केवल इसलिए था क्योंकि साहिर लुधियानवी उर्दू अदब के महान कवि और शायर होने के साथ-साथ महान गीतकार भी थे। मेरा ऑल टाइम फेवरेट तो, 'चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाये हम दोनों' लेकिन इसके अलावा भी उन्होंने ने कई टाइमलेस गाने लिखे हैं। . तल्खियां जो कि साहिर लुधियानवी की पहली किताब है, ये ज्यादातर इंकलाबी कविताओं से भरी हुई है। कुछ में मोहब्ब्त की तड़प भी है। एक कविता "परछाइयाँ" चार-पाँच पेज लम्बी कविता है लेकिन है बहुत शानदार। एक और बात, साहिर लुधियानवी को पढ़ने और समझने के लिए अगर आपका पहले से उर्दू अदब में तजुरबा रहा हो तो काफी मददगार साबित होगा क्योंकि साहिर लुधियानवी की उर्दू आसान नही है। खैर, इस किताब की अच्छी बात ये है कि इसमें क्लिष्ट उर्दू शब्दों का हिन्दी तरजुमा दिया गया है। मुझे तो किताब बहुत पसंद आयी, साहिर की नज्में बहुत आला दर्ज़े की है।
तल्खियां साहिर की मशहूर किताब है जिसके बीस से भी ज्यादा संस्करण छप चुके हैं। पहला प्रकाशन 1959 में हुआ। इसमें लगभग 69 नज्मों का संग्रह है जिसमें साहिर के कुछ बेहद मशहूर नगमे शामिल हैं जैसे चकले, ताजमहल, फनकार, सुब्हे-नौरोज, कभी कभी, मेरे गीत तुम्हारे हैं, जागीर, नूरजहां के मजार पर, ये किसका लहू है, लहू नज़्र दे रही है हयात, अजनबी बन जाएं आदि।
साहिर की जिंदगी में तल्खियां बहुत ज्यादा रहीं। अपनी मां से बेहद मोहब्बत और बाप से ताउम्र बगावत, पाकिस्तान से तल्ख हालातों में भारत वापस आकर बंबई में बसना, फिल्मों के लिए बेहतरीन गाने लिखना, सुधा मल्होत्रा से उनका नाकाम प्रेम और लगभग 60 की उम्र में गुजर जाना। ऐसी ही जिंदगी से निकली है उनकी चोट करने वाली नज्में जो किसानों, औरतों, मजलूमों के हक के लिए चीखती हैं। चूंकि यह उनका पहला प्रकाशन था इसलिए इसमें कालेज की कुछ यादें (नज़्र-ऐ-कालेज) और जवान मोहब्बत (यकसूई) के अशआर भी हैं। कुल मिलाकर यह बेहतरीन संग्रह है जो साहिर की जिंदगी और उसकी इंकलाबी सोच को दर्शाती है।
मेरी सदा को दबाना तो खैर मुमकिन है मगर हयात की ललकार कौन रोकेगा फसीले-आतिशो-आहन बहुत बुलंद सही बदलते वक्त की रफ्तार कौन रोकेगा नए खयाल की परवाज रोकने वालों नए अवाम की तलवार कौन रोकेगा...
This poet is one that anyone who grew up in the era of listening to radio in India would be aware of, unless completely averse to light music - which streamed then from most homes, if not your own, and surrounded one like a fragrance would as one passes through a wholesale vegetable and fruit market. One was surrounded by music and poetry of mostly excellence, and this was one of the best poets one heard. When slightly grown, in early teens or before, cheap pocketbooks (paperbacks as they are termed in U.S. terminology) came, and one find was a book of poetry of his. What a find! One read through, and several were shortly memorised without making any effort - some that he had never sold for films, some very long and filmed without music, in pieces, never heard on radio. Later, one was recognised as it not only came in a film, but was almost paid a homage to, with major placement and title.
All this reverence was blown in a second when one read about his life and personal attitudes, decades later, although his poetry in memory retained the excellence. How does someone, who fled a country he chose, fearing persecution for his thought, and returning to the mother nation he found refuge, disdain the latter? How does someone professing a leftist commitment demand more money over someone of incomparable talent despite himself remaining single from choice, with no responsibilities as such, while the other person has supported a family of half a dozen since before teenage and lives a life of renunciation enforced?
Isn't leftism about division of assets as per needs? Was this demand of his, twisted, or worse, communal? Or misogyny? ............
A few years later, now, finding this book on internet, one is moved to get it to read, with a subconscious drive to salvage some of those early years of one's growing up - was one so wrong? No, just young, it turns out. And the fact is, he did write, or sell, excellent work in films.
Here, one sees his early work and growth, in all its raw form. There's poetry of pain of being separated from love, of being thrown overboard for values other than love, of being unable to reciprocate (was all thus about one love?), and then growth of awareness bursting through consciousness of world events into poetry, where one sees him write about Russian revolution, about Bengal famine and starvation of millions to death, of war, of Russian forces victory over Nazi Germany, and more. Some long familiar ones strewn amongst mostly unknown verses, too. Some loved ones suddenly found and some even split - it seems two of them were chopped to be strung pieces of in one song, long familiar.
Mostly he had to rewrite his poetry, from his worshipped language that looks elsewhere for reverence, into a much more Indian language when he wrote or rewrote for an Indian film. When published in in Hindi, his work is necessarily accompanied by a mini dictionary at end of each poem. ............
Few excerpts - ............
चन्द कलियाँ निशात की2 चुनकर मुद्दतों महवे – यास3 रहता हूँ तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही तुझ से मिलकर उदास रहता हूँ
1. प्रतिक्रिया 2. आनन्द की 3. ग़म में डूबा हुआ ............
One assumed he was at college in Lahore, as several others of Punjab did, since it was before partition, and Punjab university then was in Lahore. But this book notes it's about Government College, Ludhiana, that he writes about, this homage to his alma-mater.
नज़्रे-कालेज1
ऐ सरज़मीने-पाक के2 याराने-नेकनाम3! बा-सद-ख़ुलूस4 शायरे-आवारा का सलाम । ऐ वादि-ए-जमील5! मेरे दिल की धड़कनें, आदाब कह रही हैं तेरी बारगाह में6 ।
तू आज भी है मेरे लिए जन्नते-ख़याल7, हैं तुझ में दफ़्न मेरी जवानी के चार साल । कुम्हलाये हैं यहाँ पे मेरी ज़िन्दगी के फूल, इन रास्तों में दफ़्न हैं मेरी ख़ुशी के फूल ।
तेरी नवाज़िशों को भुलाया न जायेगा, माज़ी का नक़्श8 दिल से मिटाया न जायेगा । तेरी निशातख़ेज़9 फ़ज़ा-ए-जवां की10 ख़ैर, गुलहाए-रंगो-बू के11 हसीं कारवां की ख़ैर ।
दौरे-ख़िज़ां में12 भी तेरी कलियां खिली रहें, ताहश्र13 ये हसीन फ़ज़ायें बसी रहें । हम एक ख़ार14 थे जो चमन से निकल गये, नंगे-वतन15 थे हद्दे-वतन से निकल गये ।
गाये हैं इस फ़ज़ा में वफ़ाओं के राग भी, नग़्माते-आतशीं से बखेरी है आग भी । सरकश1 बने हैं, गीत बग़ावत के गाये हैं, बरसों नये निज़ाम के2 नक़्शे बनाये हैं ।
नग़्मा निशाते-रूह का3 गाया है बारहा4, गीतों में आँसुओं को छुपाया है बारहा । मासूमियों के जुर्म में बदनाम भी हुए, तेरे तुफ़ैल5 मूरिदे-इल्ज़ाम6 भी हुए ।
इस सरज़मीं पे आज हम इक बार7 ही सही, दुनिया हमारे नाम से बेज़ार ही सही । लेकिन हम इन फ़ज़ाओं के पाले हुए तो हैं, गर याँ8 नहीं तो याँ से निकाले हुए तो हैं ।
(गवर्नमैंट कालेज लुधियाना—1943)
ज़िन्दगी को बेनियाज़े-आरज़ू करना पड़ा आह किन आँखों से अंजामे-तमन्ना देखते
1. कालेज की भेंट 2. पवित्र भूमि के 3. यशस्वी मित्रो! 4. सैकड़ों (बड़ी) शुद्धहृदयता के साथ 5. सुन्दर घाटी 6. सभा-स्थल में 7. ख़यालों की जन्नत 8. चित्र 9. आनन्द-दायक 10. जवान वातावरण की 11. सुगन्धित फूलों के 12. पतझड़ की ऋतु में 13. प्रलय तक 14. काँटा 15. देश के लिए लज्जा की वस्तु 1. उद्दंड 2. व्यवस्था के 3. आन्तरिक आनन्द का गीत 4. बार-बार 5. कारण 6. दोष के भागी 7. बोझ 8. यहाँ ............
This one descends so so abruptly from borderline poetry to borderline street language, it brings a laughter of a shock.
यकसूई
मैं तसव्वुफ़ के7 मराहिल का8 नहीं हूँ क़ायल9, मेरी तसवीर पे तुम फूल चढ़ाती क्यों हो?
कौन कहता है कि आहें हैं मसाइब का10 इलाज, जान को अपनी अबस11 रोग लगाती क्यों हो?
एक सरकश से12 मोहब्बत की तमन्ना रखकर, ख़ुद को आईन के13 फंदे में फँसाती क्यों हो?
मैं समझता हूँ तक़द्दुस14 को तमद्दुन15 का फ़रेब, तुम रसूमात को16 ईमान बनाती क्यों हो?
जब तुम्हें मुझ से ज़ियादा है ज़माने का ख़याल, फिर मेरी याद में यूँ अश्क17 बहाती क्यों हो?
तुम में हिम्मत है तो दुनिया से बग़ावत कर दो । वर्ना माँ-बाप जहाँ कहते हैं शादी कर लो । ............
This was first used by Gurudutt in Pyaasa as it is, before it was extended into a full song in Phir Subah Hogi, the Indian film based on Dostoyevsky's Crime and Punishment. Here it's given as it was written before the latter.
फिर न कीजे मेरी गुस्ताख़-निहागों का गिला देखिये आपने फिर प्यार से देखा मुझको ............
The first couplet is familiar due to being quoted by a famous fan, latter part due to its being incorporated and transformed into a film song.
मुझे सोचने दे
मेरी नाकाम मोहब्बत की कहानी मत छेड़, अपनी मायूस उमंगों का फ़साना न सुना ।
ज़िन्दगी तल्ख़ सही, ज़हर सही, सम1 ही सही, दर्दो-आज़ार2 सही, जब्र सही, ग़म ही सही ।
लेकिन इस दर्दो-ग़मो-जब्र3 की वुसअत4 को तो देख, ज़ुल्म की छाओं में दम तोड़ती ख़लक़त को तो देख । ............
One of the memorable scenes of Pyaasa was where this was a song filmed, almost as it's written. Mostly he had to rewrite his poetry, from his worshipped language that looks elsewhere for reverence, into a much more Indian language when he wrote or rewrote for an Indian film.
चकले ............
This one was transformed into a song used in a key scene in Ghazal, where the disdainful heroine with friends is shocked into regard for his talent, the earlier disdain justified by his theft of her poetry. Beautiful film, incorporating romance, tragedy, and in two key scenes, horror turned to comic solution of a tough problem. This one-two repetition was used (without the comic twist) very effectively in Dirty Harry series, incidentally.
ताजमहल ............
About millions starving to death in Bengal when harvest was simply taken by British government - and Churchill refused to allow ships filled with grain, sent by FDR to aid of India, beyond Australia, commenting that India starving to death was of no importance whatsoever.
बंगाल
जहाने-कुहना के1 मफ़लूज2 फ़ल्सफ़ादानो3! निज़ामे-नौ के4 तक़ाज़े सवाल करते हैं—
ये शाहराहें5 इसी वास्ते बनी थीं क्या कि इन पे देस की जनता सिसक-सिसक के मरे? ज़मीं ने क्या इसी कारण अनाज उगला था कि नस्ले-आदमो-हव्वा6 बिलक-बिलक के मरे?
मिलें इसीलिए रेशम के ढेर बुनती हैं कि दुख़्तराने-वतन7 तार तार को तरसें? चमन को इसलिए माली ने ख़ूं से सींचा था कि उसकी अपनी निगाहें बहार को तरसें?
ज़मीं की क़ुव्वते-तख़्लीक़ के8 ख़ुदावन्दो9! मिलों के मुन्तज़िमो10 सल्लनत के फ़र्ज़न्दो11! पचास लाख फ़सुर्दा12 गले-सड़े ढांचे निज़ामे-ज़र के13 ख़िलाफ़ एहतजाज14 करते हैं ख़मोश होंटों से, दम तोड़ती निगाहों से बशर15, बशर के ख़िलाफ़ एहतजाज करते हैं
(बंगाल के अकाल के समय)
1. पुरानी दुनिया के 2. पंगु 3. दार्शनिकों 4. नव-व्यवस्था के 5. राजपथ 6. मानव-जाति 7. देश की बेटियाँ 8. उपज-शक्ति 9. मालिको 10. प्रबन्धको 11. बेटी 12. निर्जीव 13. पूँजीवाद के 14. विरोध प्रकाशन 15. मनुष्य
Subsequently, when USSR tanks rolled into Berlin, he - Churchill - finalised partition causing deaths of more millions, because he wanted military bases, camouflaged as a new country, for west for use against USSR. This has turned into a terrorist factory, not recognised as such and instead labelled partner in war against terror, in lies not even veiled - while U.S. paid hundreds of billions in aid, in return there was not only cheating instead of accounting, but theft of trucks of arms and ammunition that were supplied to terrorists instead, resulting directly in attacks against, and deaths of, U.S. forces personnel. ............
कभी-कभी
Ah, the poem one read long before the film with that title appeared on screen, with a very romantic song woven for the romantic interlude that begins the film with a poet singing of his own mortality being of no consequence in fact of Time, .... And one forever wondered at the bitterness personified that the poet turned into, having decided to sacrifice his love, not for humanity but on alter of tradition for sake of her parents. Now, one realises the bitterness personified was the poet, not on screen, but one who'd written the verses, in his own life - and the writer and director had cleverly worked that persona into the film without showing his own story. Or did they?
The original poem was included as a recitation in a key scene.
कभी-कभी
कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है!
कि ज़िन्दगी तेरी जुल्फ़ों की नर्म छाओं में, गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी । ये तीरगी1 जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर2 है, तेरी नज़र की शुआओं में3 खो भी सकती थी ।
अजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम4 रहकर, तेरे जमाल की5 रअनाइयों में6 खो रहता । तेरा गुदाज़ बदन7, तेरी नीम-बाज़8 आँखें, इन्हीं हसीन फ़सानों में महव9 हो रहता ।
पुकारतीं मुझे जब तल्खियां10 ज़माने की, तेरे लबों से11 हलावत के12 घूँट पी लेता । हयात13 चीख़ती फिरती बरहना-सर14 और मैं, घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुपके जी लेता ।
मगर ये हो न सका और अब ये आलम15 है, कि तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं । गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे, इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं ।
ज़माने भर के दुःखों को लगा चुका हूँ गले, गुज़र रहा हूं कुछ अनजानी रहगज़ारों से । मुहीब1 साए मेरी सिम्त बढ़ते आते हैं, हयातो-मौत2 के पुरहौल ख़ारज़ारों से3 ।
न कोई जादह4 न मंज़िल न रौशनी का सुराग़, भटक रही है ख़लाओं में5 ज़िन्दगी मेरी, इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊंगा कभी खो कर, मैं जानता हूँ मेरी हम-नफ़स6, मगर यूंही,
कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है!
अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं तुमने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी
1. अंधेरा 2. जीवन का भाग्य 3. रश्मियों में 4. दुःखों से अपरिचित 5. सौन्दर्य की 6. लावण्यताओं में 7. मृदुल, मांसल 8. अधखुली 9. निमग्न 10. कटुताएँ 11. होंठों से 12. माधुर्य के, रस के 13. जीवन 14. नंगे सिर 15. स्थिति 1. भयानक 2. जीवन तथा मृत्यु 3. भयावह कँटीले जंगलों से 4. मार्ग 5. शून्य में 6. सहचर ............
Strange reading this - there are several such verses of uncertainty, rejection and more, but here, suddenly one does a double take at the final couplet, which is very familar. Later, one finds another poem that, together with thus final couplet, was turned into a song for a film that starred a superb performer known to photographers for her faultless beauty, although she wore her beauty with such lightness and ease, viewers were usually only conscious of her expression.
हिरास1
मैं सुलगते हुए राज़ों को10 अयां11 तो कर दूँ, लेकिन इन राज़ों की तशहीर से12 जी डरता है । रात के ख़्वाब उजाले में बयां तो कर दूँ, इन हसीं ख़्वाबों की ताअबीर से13 जी डरता है ।
तेरे सांसों की थकन तेरी निगाहों का सुकूत14, दर-हक़ीक़त15 कोई रंगीन शरारत ही न हो । मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँ, वो तबस्सुम16 वो तकल्लुम17 तेरी आदत ही न हो ।
सोचता हूँ कि तुझे मिलके मैं जिस सोच में हूँ, पहले उस सोच का मक़सूम1 समझ लूँ तो कहूं । मैं तेरे शहर में अनजान हूँ परदेसी हूँ, तेरे अल्ताफ़2 का मफ़हूम3 समझ लूँ तो कहूं ।
कहीं ऐसा न हो पाँओं मेरे थर्रा जायें, और तेरी मरमरीं4 बाँहों का सहारा न मिले । अश्क बहते रहें ख़ामोश सियह5 रातों में, और तेरे रेशमी आंचल का किनारा न मिले ।
1. भय 2. मुस्कुराहट 3. कल्पना में 4. कपोलों का 5. अंधेरे में 6. रंगीन लिबास की 7. उन्माद-पूर्ण 8. मस्तिष्क में 9. श्वास 10. भेदों को 11. प्रकट 12. विज्ञापन से 13. स्वप्न-फल से 14. चुप्पी 15. वास्तव में 16. मुस्कराहट 17. बातचीत (का ढंग) 1. भाग्य (परिणाम) 2. कृपाओं का 3. तात्पर्य 4. संगमरमर की बनी (धवल, गोरी) 5. सियाह (काली) ............
Why does this have a familiar air? Definitely not read before, and can't recall any song it's been turned into!
इसी दोराहे पर!
अब न इन ऊँचे मकानों में क़दम रक्खूँगा, मैंने इक बार ये पहले भी क़सम खाई थी । अपनी नादार मोहब्बत की शिकस्तों के तुफ़ैल, ज़िन्दगी पहले भी शर्माई थी झुंझलाई थी ।
और ये अहद1 किया था कि ब-ईं-हाले-तबाह2, अब कभी प्यार भरे गीत नहीं गाऊँगा । किसी चिलमन ने पुकारा भी तो बढ़ जाऊँगा, कोई दरवाज़ा खुला भी तो पलट आऊँगा ।
फिर तेरे काँपते होंटों की फ़ुसूँकार3 हँसी, जाल बुनने लगी, बुनती रही, बुनती ही रही । मैं खिंचा तुझसे, मगर तू मेरी राहों के लिए । फूल चुनती रही, चुनती रही, चुनती ही रही ।
बर्फ़ बरसाई मेरे ज़हनो-तसव्वुर ने4 मगर, दिल में इक शोला-ए-बेनाम-सा5 लहरा ही गया तेरी चुपचाप निगाहों को सुलगते पाकर, मेरी बेज़ार तबीयत को भी प्यार आ ही गया ।
अपनी बदली हुई नज़रों के तक़ाज़े न छुपा, मैं इस अंदाज का मफ़हूम1 समझ सकता हूँ । तेरे ज़रकार2 दरीचों की बुलंदी की क़सम, अपने अक़दाम का मक़सूम3 समझ सकता हूँ ।
‘अब न इन ऊँचे मकानों में क़दम रक्खूँगा’, मैंने इक बार ये पहले भी क़सम खाई थी । इसी सर्माया-ओ-इफ़्लास के दोराहे पर, ज़िन्दगी पहले भी शर्माई थी झुंझलाई थी ।
1. प्रतिज्ञा 2. यों तबाह-हाल होने पर 3. जादू भरी 4. मस्तिष्क तथा कल्पना ने 5. बेनाम-सा शोला 1. अर्थ 2. स्वर्णिम 3. उठे हुए क़दमों का परिणाम ............
Written when Russian forces crossed into Germany.
एहसासे-कामराँ1
उफ़क़े-रूस से2 फूटी है नई सुबह की ज़ौ3, ज़ुलमते-शब का4 जिगर चाक हुआ जाता है । तीरगी5 जितना संभलने के लिए रुकती है, सुर्ख़ सैल6 और भी बेबाक7 हुआ जाता है ।
बरतर अक़वाम के1 मग़रूर ख़ुदाओं से कहो, आख़री बार ज़रा अपना तराना दोहराएं । और फिर अपनी सियासत पे पशेमां होकर, अपने नाकाम इरादों का कफ़न ले आयें ।
सुर्ख़ तूफ़ान की मौजों को जकड़ने के लिए, कोई ज़ंजीरे-गिराँ2 काम नहीं आ सकती । रक़्स3 करती हुई किरनों के तलातुम की4 क़सम, अर्सा-ए-दहर पे5 अब शाम नहीं छा सकती ।
(रूसी सेनाओं के जर्मन सीमा पार करने पर लिखी गई) ............
One would only comprehend this if one had an inkling about life of Empress Noorjahaan, and it's remarkable how the last couplet hits one about the ease and freedom enjoyed by ordinary people now in contrast.
नूरजहाँ के मज़ार पर
पहलुए-शाह में1 दुख़्तरे-जमहूर की2 क़ब्र, कितने गुमगश्ता फ़सानों का3 पता देती है । कितने ख़ूंरेज़ हक़ायक़ से4 उठाती है नक़ाब, कितनी कुचली हुई जानों का पता देती है ।।
कैसे मग़रूर शहनशाहों की तसकीं के लिए, सालहा-साल हसीनाओं के बाज़ार लगे । कैसी बहकी हुई नज़रों के तअय्युश5 के लिए, सुर्ख़ महलों में जवां जिस्मों के अंबार लगे ।।
कैसे हर शाख़ से मुँह-बंद महकती कलियां, नोच ली जाती थीं तज़ईने-हरम6 की ख़ातिर । और मुर्झा के भी आज़ाद न हो सकती थीं, ज़िल्ले-सुबहान की7 उल्फ़त के भरम की ख़ातिर ।।
कैसे इक फ़र्द के8 होंटों की ज़रा सी जुंबिश, सर्द कर सकती थी बेलौस9 वफ़ाओं के चिराग़ । लूट सकती थी दमकते हुए माथों का सुहाग, तोड़ सकती थी मये-इश्क़ से10 लबरेज़ अयाग़11 ।।
सहमी-सहमी सी फ़ज़ाओं में ये वीरां मरक़द1, इतना ख़ामोश है, फ़रियाद-कुनां2 हो जैसे । सर्द शाख़ों में हवा चीख़ रही है ऐसे, रूहे-तक़दीसो-वफ़ा3 मर्सियाख़्वाँ4 हो जैसे ।।
तू मेरी जान! मुझे हैरतो-हसरत5 से न देख, हम में कोई भी जहांनूरो-जहांगीर नहीं । तू मुझे छोड़ के ठुकरा के भी जा सकती है, तेरे हाथों में मेरे हाथ हैं, ज़ंजीर नहीं ।।
1. बादशाह की बग़ल में 2. जनता की बेटी की 3. भूली-बिसरी कहानियों का 4. रक्तिम घटनाओं से 5. विलास 6. हरम की शोभा 7. बादशाह 8. व्यक्ति के 9. निष्काम 10. प्रेम-रूपी मदिरा से 11. भरे हुए प्याले 1. क़ब्र 2. न्याय की दुहाई दे रहा हो 3. प्रेम तथा पवित्रता की आत्मा 4. विलाप कर रही हो 5. आश्चर्य और उत्कंठा ............
मादाम
This, read long ago, was impressive, and remained second only to Parachhaaiyaan amongst his poems. But there was a slight thorn somewhere, realised much later - he speaks of incompatibility of poverty with various values, and there he's a stranger to India and her culture, accepting all that's brought by invading colonial cultures. ............
This was turned into a film song, sombre, but that's all one can recall, precise names are elusive in memory. It's only the refrain one can recall, and as was often, he must have written fresh verses for the film. He wrote this about Naval Dock Strikes, February 1946. The film uses it perhaps in context of partition. Funny, he couldn't then have been aware, when he wrote this, of implications of the event - an effect of Bose, who had managed to bring his army into borders of India - which was in reality what made British leave in a hurry - as Attlee informed when subsequently asked on his visit to India. Gandhi they could have handled, Attlee said.
ये किसका लहू है
(जहाज़ियों की बग़ावत—फरवरी 1946)
ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम1 ज़रा आँखें तो उठा, नज़रें तो मिला कुछ हम भी सुनें, हम को भी बता! ये किसका लहू है, कौन मरा?
धरती की सुलगती छाती के बेचैन शरारे पूछते हैं तुम लोग जिन्हें अपना न सके, वो ख़ून के धारे पूछते हैं सड़कों की ज़बां चिल्लाती है, सागर के किनारे पूछते हैं ये किसका लहू है, कौन मरा?
ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम बता! ये किसका लहू है, कौन मरा?
वो कौन-सा जज़्बा था जिससे फ़र्सूदा2 निज़ामे-ज़ीस्त3 हिला झुलसे हुए वीरां गुलशन में इक आस-उमीद का फूल खिला जनता का लहू फ़ौजों से मिला, फ़ौजों का लहू जनता से मिला
ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम बता ये किसका लहू है, कौन मरा?
ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम बता क्या क़ौमो-वतन की जय गाकर मरते हुए राही ग़ुडे थे? जो देश का परचम4 ले के उठे, वो शोख़ सिपाही ग़ुडे थे? जो बारे-ग़ुलामी5 सह न सके, वो मुजरिमे-शाही6 ग़ुंडे थे? ये किसका लहू है, कौन मरा?
ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम बता ये किसका लहू है, कौन मरा?
ऐ अज़्मे-फ़ना1 देने वालो, पैग़ामे-बक़ा2 देने वालो! अब आग से कतराते क्यों हो, शोलों को हवा देने वालो! तूफ़ान से अब क्यों डरते हो, मौजों को3 सदा4 देने वालो! क्या भूल गये अपना नारा?
ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम बता ये किसका लहू है, कौन मरा?
समझौते की उम्मीद सही, सरकार के वायदे ठीक सही हाँ मश्क़े-सितम5 अफ़साना सही, हाँ प्यार के वायदे ठीक सही अपनों के कलेजे मत छेदो, अग़ियार के6 वायदे ठीक सही जमहूर से7 यूँ दामन न छुड़ा
ऐ रहबरे मुल्को-क़ौम बता ये किसका लहू है, कौन मरा?
हम ठान चुके हैं अब जी में हर ज़ालिम से टकरायेंगे तुम समझौते की आस रखो, हम आगे बढ़ते जायेंगे हर मंज़िले-आज़ादी की क़सम, हर मंज़िल पे दोहरायें
ये किसका लहू है, कौन मरा? ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम बता ये किसका लहू है, कौन मरा?
1. देश और जाति के नेता 2. दुःखी 3. जीवन-व्यवस्था 4. झंडा 5. गुलामी का बोझ 6. शाही अपराधी 1. मृत्यु का संकल्प 2. जीवन-संदेश 3. लहरों को 4. आवाज़ 5. अत्याचार का अभ्यास 6. ग़ैरों के 7. जनता से
This poet is one that anyone who grew up in the era of listening to radio in India would be aware of, unless completely averse to light music - which streamed then from most homes, if not your own, and surrounded one like a fragrance would as one passes through a wholesale vegetable and fruit market. One was surrounded by music and poetry of mostly excellence, and this was one of the best poets one heard. When slightly grown, in early teens or before, cheap pocketbooks (paperbacks as they are termed in U.S. terminology) came, and one find was a book of poetry of his. What a find! One read through, and several were shortly memorised without making any effort - some that he had never sold for films, some very long and filmed without music, in pieces, never heard on radio. Later, one was recognised as it not only came in a film, but was almost paid a homage to, with major placement and title.
All this reverence was blown in a second when one read about his life and personal attitudes, decades later, although his poetry in memory retained the excellence. How does someone, who fled a country he chose, fearing persecution for his thought, and returning to the mother nation he found refuge, disdain the latter? How does someone professing a leftist commitment demand more money over someone of incomparable talent despite himself remaining single from choice, with no responsibilities as such, while the other person has supported a family of half a dozen since before teenage and lives a life of renunciation enforced?
Isn't leftism about division of assets as per needs? Was this demand of his, twisted, or worse, communal? Or misogyny? ............
A few years later, now, finding this book on internet, one is moved to get it to read, with a subconscious drive to salvage some of those early years of one's growing up - was one so wrong? No, just young, it turns out. And the fact is, he did write, or sell, excellent work in films.
Here, one sees his early work and growth, in all its raw form. There's poetry of pain of being separated from love, of being thrown overboard for values other than love, of being unable to reciprocate (was all thus about one love?), and then growth of awareness bursting through consciousness of world events into poetry, where one sees him write about Russian revolution, about Bengal famine and starvation of millions to death, of war, of Russian forces victory over Nazi Germany, and more. Some long familiar ones strewn amongst mostly unknown verses, too. Some loved ones suddenly found and some even split - it seems two of them were chopped to be strung pieces of in one song, long familiar.
Mostly he had to rewrite his poetry, from his worshipped language that looks elsewhere for reverence, into a much more Indian language when he wrote or rewrote for an Indian film. When published in in Hindi, his work is necessarily accompanied by a mini dictionary at end of each poem. ............
Few excerpts - ............
चन्द कलियाँ निशात की2 चुनकर मुद्दतों महवे – यास3 रहता हूँ तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही तुझ से मिलकर उदास रहता हूँ
1. प्रतिक्रिया 2. आनन्द की 3. ग़म में डूबा हुआ ............
One assumed he was at college in Lahore, as several others of Punjab did, since it was before partition, and Punjab university then was in Lahore. But this book notes it's about Government College, Ludhiana, that he writes about, this homage to his alma-mater.
नज़्रे-कालेज1
ऐ सरज़मीने-पाक के2 याराने-नेकनाम3! बा-सद-ख़ुलूस4 शायरे-आवारा का सलाम । ऐ वादि-ए-जमील5! मेरे दिल की धड़कनें, आदाब कह रही हैं तेरी बारगाह में6 ।
तू आज भी है मेरे लिए जन्नते-ख़याल7, हैं तुझ में दफ़्न मेरी जवानी के चार साल । कुम्हलाये हैं यहाँ पे मेरी ज़िन्दगी के फूल, इन रास्तों में दफ़्न हैं मेरी ख़ुशी के फूल ।
तेरी नवाज़िशों को भुलाया न जायेगा, माज़ी का नक़्श8 दिल से मिटाया न जायेगा । तेरी निशातख़ेज़9 फ़ज़ा-ए-जवां की10 ख़ैर, गुलहाए-रंगो-बू के11 हसीं कारवां की ख़ैर ।
दौरे-ख़िज़ां में12 भी तेरी कलियां खिली रहें, ताहश्र13 ये हसीन फ़ज़ायें बसी रहें । हम एक ख़ार14 थे जो चमन से निकल गये, नंगे-वतन15 थे हद्दे-वतन से निकल गये ।
गाये हैं इस फ़ज़ा में वफ़ाओं के राग भी, नग़्माते-आतशीं से बखेरी है आग भी । सरकश1 बने हैं, गीत बग़ावत के गाये हैं, बरसों नये निज़ाम के2 नक़्शे बनाये हैं ।
नग़्मा निशाते-रूह का3 गाया है बारहा4, गीतों में आँसुओं को छुपाया है बारहा । मासूमियों के जुर्म में बदनाम भी हुए, तेरे तुफ़ैल5 मूरिदे-इल्ज़ाम6 भी हुए ।
इस सरज़मीं पे आज हम इक बार7 ही सही, दुनिया हमारे नाम से बेज़ार ही सही । लेकिन हम इन फ़ज़ाओं के पाले हुए तो हैं, गर याँ8 नहीं तो याँ से निकाले हुए तो हैं ।
(गवर्नमैंट कालेज लुधियाना—1943)
ज़िन्दगी को बेनियाज़े-आरज़ू करना पड़ा आह किन आँखों से अंजामे-तमन्ना देखते
1. कालेज की भेंट 2. पवित्र भूमि के 3. यशस्वी मित्रो! 4. सैकड़ों (बड़ी) शुद्धहृदयता के साथ 5. सुन्दर घाटी 6. सभा-स्थल में 7. ख़यालों की जन्नत 8. चित्र 9. आनन्द-दायक 10. जवान वातावरण की 11. सुगन्धित फूलों के 12. पतझड़ की ऋतु में 13. प्रलय तक 14. काँटा 15. देश के लिए लज्जा की वस्तु 1. उद्दंड 2. व्यवस्था के 3. आन्तरिक आनन्द का गीत 4. बार-बार 5. कारण 6. दोष के भागी 7. बोझ 8. यहाँ ............
This one descends so so abruptly from borderline poetry to borderline street language, it brings a laughter of a shock.
यकसूई
मैं तसव्वुफ़ के7 मराहिल का8 नहीं हूँ क़ायल9, मेरी तसवीर पे तुम फूल चढ़ाती क्यों हो?
कौन कहता है कि आहें हैं मसाइब का10 इलाज, जान को अपनी अबस11 रोग लगाती क्यों हो?
एक सरकश से12 मोहब्बत की तमन्ना रखकर, ख़ुद को आईन के13 फंदे में फँसाती क्यों हो?
मैं समझता हूँ तक़द्दुस14 को तमद्दुन15 का फ़रेब, तुम रसूमात को16 ईमान बनाती क्यों हो?
जब तुम्हें मुझ से ज़ियादा है ज़माने का ख़याल, फिर मेरी याद में यूँ अश्क17 बहाती क्यों हो?
तुम में हिम्मत है तो दुनिया से बग़ावत कर दो । वर्ना माँ-बाप जहाँ कहते हैं शादी कर लो । ............
This was first used by Gurudutt in Pyaasa as it is, before it was extended into a full song in Phir Subah Hogi, the Indian film based on Dostoyevsky's Crime and Punishment. Here it's given as it was written before the latter.
फिर न कीजे मेरी गुस्ताख़-निहागों का गिला देखिये आपने फिर प्यार से देखा मुझको ............
The first couplet is familiar due to being quoted by a famous fan, latter part due to its being incorporated and transformed into a film song.
मुझे सोचने दे
मेरी नाकाम मोहब्बत की कहानी मत छेड़, अपनी मायूस उमंगों का फ़साना न सुना ।
ज़िन्दगी तल्ख़ सही, ज़हर सही, सम1 ही सही, दर्दो-आज़ार2 सही, जब्र सही, ग़म ही सही ।
लेकिन इस दर्दो-ग़मो-जब्र3 की वुसअत4 को तो देख, ज़ुल्म की छाओं में दम तोड़ती ख़लक़त को तो देख । ............
One of the memorable scenes of Pyaasa was where this was a song filmed, almost as it's written. Mostly he had to rewrite his poetry, from his worshipped language that looks elsewhere for reverence, into a much more Indian language when he wrote or rewrote for an Indian film.
चकले ............
This one was transformed into a song used in a key scene in Ghazal, where the disdainful heroine with friends is shocked into regard for his talent, the earlier disdain justified by his theft of her poetry. Beautiful film, incorporating romance, tragedy, and in two key scenes, horror turned to comic solution of a tough problem. This one-two repetition was used (without the comic twist) very effectively in Dirty Harry series, incidentally.
ताजमहल ............
About millions starving to death in Bengal when harvest was simply taken by British government - and Churchill refused to allow ships filled with grain, sent by FDR to aid of India, beyond Australia, commenting that India starving to death was of no importance whatsoever.
बंगाल
जहाने-कुहना के1 मफ़लूज2 फ़ल्सफ़ादानो3! निज़ामे-नौ के4 तक़ाज़े सवाल करते हैं—
ये शाहराहें5 इसी वास्ते बनी थीं क्या कि इन पे देस की जनता सिसक-सिसक के मरे? ज़मीं ने क्या इसी कारण अनाज उगला था कि नस्ले-आदमो-हव्वा6 बिलक-बिलक के मरे?
मिलें इसीलिए रेशम के ढेर बुनती हैं कि दुख़्तराने-वतन7 तार तार को तरसें? चमन को इसलिए माली ने ख़ूं से सींचा था कि उसकी अपनी निगाहें बहार को तरसें?
ज़मीं की क़ुव्वते-तख़्लीक़ के8 ख़ुदावन्दो9! मिलों के मुन्तज़िमो10 सल्लनत के फ़र्ज़न्दो11! पचास लाख फ़सुर्दा12 गले-सड़े ढांचे निज़ामे-ज़र के13 ख़िलाफ़ एहतजाज14 करते हैं ख़मोश होंटों से, दम तोड़ती निगाहों से बशर15, बशर के ख़िलाफ़ एहतजाज करते हैं
(बंगाल के अकाल के समय)
1. पुरानी दुनिया के 2. पंगु 3. दार्शनिकों 4. नव-व्यवस्था के 5. राजपथ 6. मानव-जाति 7. देश की बेटियाँ 8. उपज-शक्ति 9. मालिको 10. प्रबन्धको 11. बेटी 12. निर्जीव 13. पूँजीवाद के 14. विरोध प्रकाशन 15. मनुष्य
Subsequently, when USSR tanks rolled into Berlin, he - Churchill - finalised partition causing deaths of more millions, because he wanted military bases, camouflaged as a new country, for west for use against USSR. This has turned into a terrorist factory, not recognised as such and instead labelled partner in war against terror, in lies not even veiled - while U.S. paid hundreds of billions in aid, in return there was not only cheating instead of accounting, but theft of trucks of arms and ammunition that were supplied to terrorists instead, resulting directly in attacks against, and deaths of, U.S. forces personnel. ............
कभी-कभी
Ah, the poem one read long before the film with that title appeared on screen, with a very romantic song woven for the romantic interlude that begins the film with a poet singing of his own mortality being of no consequence in fact of Time, .... And one forever wondered at the bitterness personified that the poet turned into, having decided to sacrifice his love, not for humanity but on alter of tradition for sake of her parents. Now, one realises the bitterness personified was the poet, not on screen, but one who'd written the verses, in his own life - and the writer and director had cleverly worked that persona into the film without showing his own story. Or did they?
The original poem was included as a recitation in a key scene.
कभी-कभी
कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है!
कि ज़िन्दगी तेरी जुल्फ़ों की नर्म छाओं में, गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी । ये तीरगी1 जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर2 है, तेरी नज़र की शुआओं में3 खो भी सकती थी ।
अजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम4 रहकर, तेरे जमाल की5 रअनाइयों में6 खो रहता । तेरा गुदाज़ बदन7, तेरी नीम-बाज़8 आँखें, इन्हीं हसीन फ़सानों में महव9 हो रहता ।
पुकारतीं मुझे जब तल्खियां10 ज़माने की, तेरे लबों से11 हलावत के12 घूँट पी लेता । हयात13 चीख़ती फिरती बरहना-सर14 और मैं, घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुपके जी लेता ।
मगर ये हो न सका और अब ये आलम15 है, कि तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं । गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िन्दगी जैसे, इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं ।
ज़माने भर के दुःखों को लगा चुका हूँ गले, गुज़र रहा हूं कुछ अनजानी रहगज़ारों से । मुहीब1 साए मेरी सिम्त बढ़ते आते हैं, हयातो-मौत2 के पुरहौल ख़ारज़ारों से3 ।
न कोई जादह4 न मंज़िल न रौशनी का सुराग़, भटक रही है ख़लाओं में5 ज़िन्दगी मेरी, इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊंगा कभी खो कर, मैं जानता हूँ मेरी हम-नफ़स6, मगर यूंही,
कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है!
अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं तुमने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी
1. अंधेरा 2. जीवन का भाग्य 3. रश्मियों में 4. दुःखों से अपरिचित 5. सौन्दर्य की 6. लावण्यताओं में 7. मृदुल, मांसल 8. अधखुली 9. निमग्न 10. कटुताएँ 11. होंठों से 12. माधुर्य के, रस के 13. जीवन 14. नंगे सिर 15. स्थिति 1. भयानक 2. जीवन तथा मृत्यु 3. भयावह कँटीले जंग��ों से 4. मार्ग 5. शून्य में 6. सहचर ............
Strange reading this - there are several such verses of uncertainty, rejection and more, but here, suddenly one does a double take at the final couplet, which is very familar. Later, one finds another poem that, together with thus final couplet, was turned into a song for a film that starred a superb performer known to photographers for her faultless beauty, although she wore her beauty with such lightness and ease, viewers were usually only conscious of her expression.
हिरास1
मैं सुलगते हुए राज़ों को10 अयां11 तो कर दूँ, लेकिन इन राज़ों की तशहीर से12 जी डरता है । रात के ख़्वाब उजाले में बयां तो कर दूँ, इन हसीं ख़्वाबों की ताअबीर से13 जी डरता है ।
तेरे सांसों की थकन तेरी निगाहों का सुकूत14, दर-हक़ीक़त15 कोई रंगीन शरारत ही न हो । मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँ, वो तबस्सुम16 वो तकल्लुम17 तेरी आदत ही न हो ।
सोचता हूँ कि तुझे मिलके मैं जिस सोच में हूँ, पहले उस सोच का मक़सूम1 समझ लूँ तो कहूं । मैं तेरे शहर में अनजान हूँ परदेसी हूँ, तेरे अल्ताफ़2 का मफ़हूम3 समझ लूँ तो कहूं ।
कहीं ऐसा न हो पाँओं मेरे थर्रा जायें, और तेरी मरमरीं4 बाँहों का सहारा न मिले । अश्क बहते रहें ख़ामोश सियह5 रातों में, और तेरे रेशमी आंचल का किनारा न मिले ।
1. भय 2. मुस्कुराहट 3. कल्पना में 4. कपोलों का 5. अंधेरे में 6. रंगीन लिबास की 7. उन्माद-पूर्ण 8. मस्तिष्क में 9. श्वास 10. भेदों को 11. प्रकट 12. विज्ञापन से 13. स्वप्न-फल से 14. चुप्पी 15. वास्तव में 16. मुस्कराहट 17. बातचीत (का ढंग) 1. भाग्य (परिणाम) 2. कृपाओं का 3. तात्पर्य 4. संगमरमर की बनी (धवल, गोरी) 5. सियाह (काली) ............
Why does this have a familiar air? Definitely not read before, and can't recall any song it's been turned into!
इसी दोराहे पर!
अब न इन ऊँचे मकानों में क़दम रक्खूँगा, मैंने इ��� बार ये पहले भी क़सम खाई थी । अपनी नादार मोहब्बत की शिकस्तों के तुफ़ैल, ज़िन्दगी पहले भी शर्माई थी झुंझलाई थी ।
और ये अहद1 किया था कि ब-ईं-हाले-तबाह2, अब कभी प्यार भरे गीत नहीं गाऊँगा । किसी चिलमन ने पुकारा भी तो बढ़ जाऊँगा, कोई दरवाज़ा खुला भी तो पलट आऊँगा ।
फिर तेरे काँपते होंटों की फ़ुसूँकार3 हँसी, जाल बुनने लगी, बुनती रही, बुनती ही रही । मैं खिंचा तुझसे, मगर तू मेरी राहों के लिए । फूल चुनती रही, चुनती रही, चुनती ही रही ।
बर्फ़ बरसाई मेरे ज़हनो-तसव्वुर ने4 मगर, दिल में इक शोला-ए-बेनाम-सा5 लहरा ही गया तेरी चुपचाप निगाहों को सुलगते पाकर, मेरी बेज़ार तबीयत को भी प्यार आ ही गया ।
अपनी बदली हुई नज़रों के तक़ाज़े न छुपा, मैं इस अंदाज का मफ़हूम1 समझ सकता हूँ । तेरे ज़रकार2 दरीचों की बुलंदी की क़सम, अपने अक़दाम का मक़सूम3 समझ सकता हूँ ।
‘अब न इन ऊँचे मकानों में क़दम रक्खूँगा’, मैंने इक बार ये पहले भी क़सम खाई थी । इसी सर्माया-ओ-इफ़्लास के दोराहे पर, ज़िन्दगी पहले भी शर्माई थी झुंझलाई थी ।
1. प्रतिज्ञा 2. यों तबाह-हाल होने पर 3. जादू भरी 4. मस्तिष्क तथा कल्पना ने 5. बेनाम-सा शोला 1. अर्थ 2. स्वर्णिम 3. उठे हुए क़दमों का परिणाम ............
Written when Russian forces crossed into Germany.
एहसासे-कामराँ1
उफ़क़े-रूस से2 फूटी है नई सुबह की ज़ौ3, ज़ुलमते-शब का4 जिगर चाक हुआ जाता है । तीरगी5 जितना संभलने के लिए रुकती है, सुर्ख़ सैल6 और भी बेबाक7 हुआ जाता है ।
बरतर अक़वाम के1 मग़रूर ख़ुदाओं से कहो, आख़री बार ज़रा अपना तराना दोहराएं । और फिर अपनी सियासत पे पशेमां होकर, अपने नाकाम इरादों का कफ़न ले आयें ।
सुर्ख़ तूफ़ान की मौजों को जकड़ने के लिए, कोई ज़ंजीरे-गिराँ2 काम नहीं आ सकती । रक़्स3 करती हुई किरनों के तलातुम की4 क़सम, अर्सा-ए-दहर पे5 अब शाम नहीं छा सकती ।
(रूसी सेनाओं के जर्मन सीमा पार करने पर लिखी गई) ............
One would only comprehend this if one had an inkling about life of Empress Noorjahaan, and it's remarkable how the last couplet hits one about the ease and freedom enjoyed by ordinary people now in contrast.
नूरजहाँ के मज़ार पर
पहलुए-शाह में1 दुख़्तरे-जमहूर की2 क़ब्र, कितने गुमगश्ता फ़सानों का3 पता देती है । कितने ख़ूंरेज़ हक़ायक़ से4 उठाती है नक़ाब, कितनी कुचली हुई जानों का पता देती है ।।
कैसे मग़रूर शहनशाहों की तसकीं के लिए, सालहा-साल हसीनाओं के बाज़ार लगे । कैसी बहकी हुई नज़रों के तअय्युश5 के लिए, सुर्ख़ महलों में जवां जिस्मों के अंबार लगे ।।
कैसे हर शाख़ से मुँह-बंद महकती कलियां, नोच ली जाती थीं तज़ईने-हरम6 की ख़ातिर । और मुर्झा के भी आज़ाद न हो सकती थीं, ज़िल्ले-सुबहान की7 उल्फ़त के भरम की ख़ातिर ।।
कैसे इक फ़र्द के8 होंटों की ज़रा सी जुंबिश, सर्द कर सकती थी बेलौस9 वफ़ाओं के चिराग़ । लूट सकती थी दमकते हुए माथों का सुहाग, तोड़ सकती थी मये-इश्क़ से10 लबरेज़ अयाग़11 ।।
सहमी-सहमी सी फ़ज़ाओं में ये वीरां मरक़द1, इतना ख़ामोश है, फ़रियाद-कुनां2 हो जैसे । सर्द शाख़ों में हवा चीख़ रही है ऐसे, रूहे-तक़दीसो-वफ़ा3 मर्सियाख़्वाँ4 हो जैसे ।।
तू मेरी जान! मुझे हैरतो-हसरत5 से न देख, हम में कोई भी जहांनूरो-जहांगीर नहीं । तू मुझे छोड़ के ठुकरा के भी जा सकती है, तेरे हाथों में मेरे हाथ हैं, ज़ंजीर नहीं ।।
1. बादशाह की बग़ल में 2. जनता की बेटी की 3. भूली-बिसरी कहानियों का 4. रक्तिम घटनाओं से 5. विलास 6. हरम की शोभा 7. बादशाह 8. व्यक्ति के 9. निष्काम 10. प्रेम-रूपी मदिरा से 11. भरे हुए प्याले 1. क़ब्र 2. न्याय की दुहाई दे रहा हो 3. प्रेम तथा पवित्रता की आत्मा 4. विलाप कर रही हो 5. आश्चर्य और उत्कंठा ............
मादाम
This, read long ago, was impressive, and remained second only to Parachhaaiyaan amongst his poems. But there was a slight thorn somewhere, realised much later - he speaks of incompatibility of poverty with various values, and there he's a stranger to India and her culture, accepting all that's brought by invading colonial cultures. ............
This was turned into a film song, sombre, but that's all one can recall, precise names are elusive in memory. It's only the refrain one can recall, and as was often, he must have written fresh verses for the film. He wrote this about Naval Dock Strikes, February 1946. The film uses it perhaps in context of partition. Funny, he couldn't then have been aware, when he wrote this, of implications of the event - an effect of Bose, who had managed to bring his army into borders of India - which was in reality what made British leave in a hurry - as Attlee informed when subsequently asked on his visit to India. Gandhi they could have handled, Attlee said.
ये किसका लहू है
(जहाज़ियों की बग़ावत—फरवरी 1946)
ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम1 ज़रा आँखें तो उठा, नज़रें तो मिला कुछ हम भी सुनें, हम को भी बता! ये किसका लहू है, कौन मरा?
धरती की सुलगती छाती के बेचैन शरारे पूछते हैं तुम लोग जिन्हें अपना न सके, वो ख़ून के धारे पूछते हैं सड़कों की ज़बां चिल्लाती है, सागर के किनारे पूछते हैं ये किसका लहू है, कौन मरा?
ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम बता! ये किसका लहू है, कौन मरा?
वो कौन-सा जज़्बा था जिससे फ़र्सूदा2 निज़ामे-ज़ीस्त3 हिला झुलसे हुए वीरां गुलशन में इक आस-उमीद का फूल खिला जनता का लहू फ़ौजों से मिला, फ़ौजों का लहू जनता से मिला
ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम बता ये किसका लहू है, कौन मरा?
ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम बता क्या क़ौमो-वतन की जय गाकर मरते हुए राही ग़ुडे थे? जो देश का परचम4 ले के उठे, वो शोख़ सिपाही ग़ुडे थे? जो बारे-ग़ुलामी5 सह न सके, वो मुजरिमे-शाही6 ग़ुंडे थे? ये किसका लहू है, कौन मरा?
ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम बता ये किसका लहू है, कौन मरा?
ऐ अज़्मे-फ़ना1 देने वालो, पैग़ामे-बक़ा2 देने वालो! अब आग से कतराते क्यों हो, शोलों को हवा देने वालो! तूफ़ान से अब क्यों डरते हो, मौजों को3 सदा4 देने वालो! क्या भूल गये अपना नारा?
ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम बता ये किसका लहू है, कौन मरा?
समझौते की उम्मीद सही, सरकार के वायदे ठीक सही हाँ मश्क़े-सितम5 अफ़साना सही, हाँ प्यार के वायदे ठीक सही अपनों के कलेजे मत छेदो, अग़ियार के6 वायदे ठीक सही जमहूर से7 यूँ दामन न छुड़ा
ऐ रहबरे मुल्को-क़ौम बता ये किसका लहू है, कौन मरा?
हम ठान चुके हैं अब जी में हर ज़ालिम से टकरायेंगे तुम समझौते की आस रखो, हम आगे बढ़ते जायेंगे हर मंज़िले-आज़ादी की क़सम, हर मंज़िल पे दोहरायें
ये किसका लहू है, कौन मरा? ऐ रहबरे-मुल्को-क़ौम बता ये किसका लहू है, कौन मरा?
1. देश और जाति के नेता 2. दुःखी 3. जीवन-व्यवस्था 4. झंडा 5. गुलामी का बोझ 6. शाही अपराधी 1. मृत्यु का संकल्प 2. जीवन-संदेश 3. लहरों को 4. आवाज़ 5. अत्याचार का अभ्यास 6. ग़ैरों के 7. जनता से
भाषाको ज्ञानको अभावले गर्दा फैज जस्तै लुधियानवी पठनमा पनि केहि गाह्रो भयो । एक किसिमले तुलनात्मक अध्ययन पनि रह्यो । लुधियानवीको लेखनमा बढि हिन्दि भएर होला, कतिपय अवस्थामा उनका कविताले छोए । अर्को उनी अमृता प्रितमका प्रिय व्यक्ति भएर पनि होला, उनी प्रति अर्कै लगाव रह्यो । अर्को भनेको "कभि कभि" गितको प्रसंग हो । यो गितसंग धेरैको सम्झना जोडिएको छ । मेरो मुखबाट पनि बिना कुनै कारण बेला बेला निस्किन्छ । यो समावेश चलचित्र हेर्ने रहर पनि निके समय सम्म गरियो । अनलाईन पनि खुब खोजियो । पछि गएर प्राइममा भेटिएको थियो । गित बाहेक चलचित्र उ���्तो खोज्दाको जस्तो राम्रो त हैन । र पनि हेरियो । लगत्तै यो किताब पनि हात लाग्यो ।
हिन्दी साहित्यका किताब भारतीय अमेजन बाट इकिताबका रुपमा पहिलो पनि किनिएको हो । यसपाली काव्य रचनामा पलाएको तिर्खा मेट्न फैज र साहिर पनि किनियो । किताबको ढांचा उस्तो गतिलो लागेन । अंग्रेकी इकिताब पढ्दाको सहजता यसमा थिएन । भाषाको समस्याले पटकपटक खुट्टेटिपोट पल्टाउनु पर्थ्यो । त्यसले काव्यको रस केहि कम बनाइ दिन्थ्यो । उहि अंग्रेजी नजान्दा द ओल्ड म्यान एण्ड द सि पढे जस्तै । त्यो बेला पनि किताब भन्दा शब्दकोषका पाना बढि पढिएका थिए । यस पटक पनि त्यस्तै भयो । त्यसैले पातला किताब पनि हप्तौं लाग्यो ।
उर्दु र हिन्दीमा रुचि भएकाहरुको लागि राम्रै किताब हो । त्यहि हो पठन असहज हुन सक्छ ।
तल्खियां साहिर लुधियानवी जी की सबसे पहली किताब थी और इस किताब में 67 गीत व गज़ले है। साहिर लुधियानवी जी अपने गीतों और बेहतरीन शायरी के लिए जाने जाते है। इस किताब में लिखी गयी सभी कविताए, उर्दू में है जो की हिंदी में रूपांतरित की गयी है । इस किताब की सबसे अच्छी बात है की इसे वो व्यक्ति भी काफी आसानी से पढ़ और समझ सकता है जिसे उर्दू के शब्दो का बिल्कुल ज्ञान नही है। हर रचना में उर्दू शब्दो के अर्थ दिए हुए है । , साहिर जी ने अपनी इस किताब में हर तरह के मुद्दे पर कुछ ना कुछ कहा है । वो चाहे ज़िन्दगी , मोहब्बत , दोस्ती , माँ की ममता जैसे एहसास हो या गरीबी, राजनीति , निरंकुश सरकार , स्वन्त्रता आंदोलन जैसे गहमगेहेम मुद्दे । इनसभी चीज़ों को बड़े ही कलात्मक ढंग से पेश किआ गया है । इसे ज़रूर पढ़िए और अपने आपको ज़िन्दगी के और नज़दीक पाइये।
I loved reading this poetry book. It was my first read by Sahir Ludhianavi and what an amazing writer he was. He had written poems on almost every topic starting from love, betrayal, and one-sided affection to war, marriage, and society. I knew 'Kabhi Kabhi' was a poem and later on it was introduced in the movie, but I didn't have any clue about the 'Ajnabee ban jaaye hum dono' poem.
I would be recommending this book to all those who love to get sedated by Hindi poetry.
Its very hard urdu . So i could not cipher all the meanings . Whatever I understood was brilliant and author has written on range of topics like world war, Bengal famine, Pakistan, love, speeration etc . Khudkushi se pehle was my favourite one.
Sahir's words are beyond description. There's always a gem in such collection of works that one feel connected to. For Sahir most of the work feels connected and hits hard. loved this one as well.
ساحر نے معاشرے کے بے آواز طبقے کے مسائل کو زبان دی ہے .ساحر لدھیانوی کی تمام تر شاعری کی ایک اہم خصوصیت یہ ہے کہ ان کی شاعری کو جتنی بار بھی پڑھیں، سنُیں، گنگنائیں، اتنی ہی مرتبہ مزید پڑھنے، سننے اور گنگنانے کو دل کرتا ہے۔ یہ خصوصیت ساحر کو باقی شعرا سے ممتاز کرتی ہے قحط بنگال سے متاثر ہو کر لکھی گئی نظم میں لکھتے ہیں یہ شاہراہیں اسی واسطے بنی تھیں کیا؟ کہ ان پہ دیس کی جنتا سسک سسک کے مرے
انسانی زندگی کو رواں دوں رکھنے میں دو وقت کی روٹی کی اہمیت اور اس کی غیر موجودگی میں ہر قسم کے فلسفے ہیچ نظر آنے کے پیش نظر فرماتے ہیں "مفلسی حسِ لطافت کو مٹا دیتی ہے بھوک آداب کے سانچوں میں نہیںڈھل سکتی" ان کی مزید نظمیں جیسے کے تاج محل ، شاہکار ،میرے گیت ،چکلے،فنکار خودکشی سے پہلے ،نورجہاں کے مزار پر ،یہ کس کا لہو ہے؟ اور سب سے بڑھ کر پرچھائیاں صحیح لفظوں میں شاہکار کہلانے کے لائق ہے