नरक-यात्रा ज्ञान चतुर्वेदी का यह उपन्यास नरक-यात्रा महान रूसी उपन्यासों की परंपरा में है, जो कहानी और इसके चरित्रों के हर संभव पक्ष तथा तनावों को अपने में समेटकर बढ़ा है। यह उपन्यास भारत के किसी भी बड़े सरकारी अस्पताल के किसी एक दिन मात्र की कथा कहता है, अस्पताल, जो नरक से कम नहीं, विशेषतौर पर गरीब आम आदमी के लिए। लेखक हमें अस्पताल के इसी नरक की सतत यात्रा पर ले जाता है, जो अस्पताल के हर कोने में तो व्याप्त है ही, साथ ही इसमें कार्यरत लोगों की आत्मा से भी फैल गया है।
ऑपरेशन थिएटर से अस्पताल के रसोईघर तक, वार्ड बॉय से सर्जन तक - हर चरित्र और स्थिति के कर्म-कुकर्म को लेखक ने निर्ममता से उजागर किया है। उसकी मीठी छुरी-सी पैनी जुबान और उछालकर मजा लेने की प्रवृत्ति इस निर्मम लेखन कर्म को और भी महत्त्वपूर्ण बनाती है। किसी सुधारक अथवा क्रांतिकारी लेखक का लबादा ओढ़े बगैर ज्ञान चतुर्वेदी ने निर्मम, गलीज यथार्थ पर सर्जनात्मक टिप्पणी की है और खूब की है।
यह उपन्यास अद्भुत जीवन तथा उतने ही अद्भुत जीवन-चरित्रों की कथा को ऐसी भाषा में बयान करता है जो आम आदमी के मुहावरों और बोली से संपन्न है, जिसमें मज़े लेकर बोली जानेवाली अदा और बाँध लेने की शक्ति है।
किसी भी रचना खासतौर पर व्यंग्य का एक सटीक मापदंड यह हो सकता है कि आप उसे दुबारा पढ़ना चाहेंगे या नहीं? यदि हाँ, तो कब! ये ऐसा उपन्यास है जो तुरंत ही पुनः प्रारंभ कर सकते हैं.. (हालांकि लेखक की अगली 3 किताबें कतार में हैं तो ऐसा होगा नहीं)...
अस्पताल ज़िंदगियाँ देते हैं या नहीं? डॉक्टर ईश्वर का अवतार न सही देवदूत माना जा सकता है या नहीं? हमारे विचार निश्चित तौर पर इस बात पर निर्भर करेंगे कि हमने किन अस्पतालों को देखा है... लेखक स्वयं जीवनपर्यंत डॉक्टरी पेशे से ही जुड़ा रहा (भेल, भोपाल) लेकिन फिर भी वो निर्भीक ईमानदारी दिखा सका है जिसमें इसी क्षेत्र के हर (कलुषित) पहलू को निर्ममता से अनावृत किया है...उपन्यास के केंद्र में एक सरकारी अस्पताल है और उसके भी मात्र एक दिन का ही वर्णन है, लेकिन मानों उतने में ही सालों की कुव्यवस्था, भ्रष्टाचार, राजनीति, सड़ांध, स्वार्थपरता और परिणामस्वरूप जनता की लाचारी दिख जाती है... हम जानते हैं कि तमाम बातें अतिरेक लिए हुए हैं... लेकिन, भले ही सब बातें एक साथ एक जगह पर सच न होती हों परंतु लगभग हर बात अलग-अलग जगहों पर कभी न कभी दिखती ही रही है... और, व्यंग्य की खासियत ही यही है कि जो तमाम खामियां सपाटबयानी में भाषणबाजी और नैतिकता से बोझिल करने लगती हैैं, यहाँ गहरी चोट करती प्रतीत होती हैं... ब्लैक ह्यूमर अपने बेहतरीन रुप में है.. गालियां भी हैं, लेकिन आम जनजीवन में भी तो वो हैं ही.. व्यक्ति सोच में पड़ जाता है कि ज्यादा लाचार कौन है- गरीब बीमार, तटस्थ बुद्धिजीवी या फिर वो कुत्ता जो पूरी रचना में शुरु से आखिर तक गवाह बना हुआ है सारे घटनाक्रम का!
जैसा कि लेखक स्वयं कई बार कहते सुने गए हैं कि तुलना न हो पहले के कथाकारों से... 'राग दरबारी' का ध्यान बिल्कुल न करें (हालांकि ये मुश्किल है)... जोरदार रचना है!!
A biting satire, which revolves around a government hospital. Although, it is the villainy of the doctors of this government hospital that paints the canvas of this novel, there're matching contributions from other sections such as nurses, wardboys, policemen, drivers etc. too. This book resembles Raag Darbari, the classic satire by Srilal Shukla, in language and tone. Its dry humour and wit makes this book unputdownable. I was really surpised to see such few ratings and no review on goodreads. I'd recommend to every lover of Hindi literature to read this fabulous piece of writing.
यह मेडिकल व्यवसाय पर एक व्यंग्य है। चूकि श्री ज्ञान चतुर्वेदी स्वयं एक डॉक्टर है , उन्हें मेडिकल की समझ होना स्वाभाविक है।
परन्तु पूरे उपन्यास में कोई भी स्वास्थ्य मानसिकता का डॉक्टर नहीं है सिवाय एक के। वो भी काफी दब्बू है। सब डॉक्टर एक नंबर के लुच्चे , लफंगे, तिगड़मबाज़ तथा भ्रष्ट है।
पूरा उपन्यास बहुत डिप्रेसिंग है। पूरे उपन्यास में कोई भी सुखद घटना या सकारात्मक पात्र नहीं है।
I don't like these kind of dark and depressing novels no matter how critically acclaimed these are. I think this novel and Sh Gyan Chaturvedi is overrated.
Hence two stars.
Here are some excerpts from the novel:-
यह दो सफल डाक्टरों की बातचीत थी। यह दो भारतीय ढंग से जागरूक चिकित्सकों की बातचीत थी। यह नीम-हकीमों, ऐलोपैथिक दवाइयों के बल पर आयुवैदिक प्रेक्टिस करते वैद्यों, घरेलू उपचारों के बल पर चिकित्सा क्षेत्र में झंडा गाड़नेवालों, मीठी गोलियों को ही होमियोपैथी समझनेवाले होमियोपैथों, बिना चीरफाड़ के मस्सों तथा भगंदर को शर्तिया सुखा देनेवाले चाँदसी-दवाखानों, हिमालय की कंदराओं में वर्षों भटकने के बाद भी जवान बने रहनेवाले तथा यहाँ-वहाँ की हड्डियाँ तथा खालें बटोरकर और डंठल-फूल-पत्तियाँ बटोरकर उनका मजमा लगाकर नामर्दों–पुराने बीमारों–बाँझों आदि को बेचनेवालों, डाक से इलाज करनेवालों, पोलियो, दमा-मिर्गी तथा मधुमेह आदि का शर्तिया इलाज करने के बड़े-बड़े विज्ञापन अखबारों में निकालने के बाद भी चिकित्सा के क्षेत्र में नोबल-प्राइज न पानेवाले हतभाग्यवीरों तथा मर्दाना कमजोरी, गुप्त रोगों आदि के मायाजाल फैलाए माया-मछंदरों के रेगिस्तान में नखलिस्तान की गलतफहमी पाले हुए ‘भारतीय एलोपैथिक’ चिकित्सा के टापू पर खड़े दो भटके हुए यात्रियों की बातचीत थी। मैंने ‘भारतीय एलोपैथिक पद्धति’ की बात इसीलिए की क्योंकि हमारी एलोपैथिक चिकित्सा का ढंग विदेशी एलोपैथिक चिकित्सा से एकदम निराला है। हमने एलोपैथी का ऐसा राष्ट्रीयकरण तथा भारतीयकरण किया है, कि लोग असली माल पहचानना भूल गए। हमारे यहाँ एलोपैथिक चिकित्सा का तात्पर्य है– लाल-पीली कुछ भी गोलियाँ मरीज को खिलाना, स्टैथोस्कोप या आला या टूँटी को यहाँ-वहाँ दस सेकंड में बीस जगह छुआकर, मरीज को यह खुशफहमी देना कि डाक्टर इस आले के जरिए न जाने क्या सुनकर, न जाने कौन-सा रामबाण मारने जा रहा है (जबकि वास्तव में उनका आला वर्षों पुराना है, जंगशुदा हो चुका है तथा मात्र आभूषण-जैसी वस्तु है)। नकली-सस्ती दवाइयाँ बनानेवाली स्थानीय कंपनियों की दवाइयाँ लिखना, दवाई कंपनी के एजेंटों से दवाइयों के बारे में पढ़ना, सैम्पल की दवाइयाँ बेचना, लंबे-लंबे नुस्खों में एक-दूसरे को काटनेवाली दवाइयाँ तथा तीन-चार तरह के टॉनिक लिखना, जो भी नई दवाई दवा-कंपनीवालों ने निकाल दी उसे आँख मूँदकर लिखना, झूठे शोधपत्रों के जरिए देश-विदेश की यात्रा करना, बिना बैक्टीरिया या जीवाणु की चिंता किए कोई भी एंटीबायटिक किसी भी (दिल को पसंद आनेवाले) डोज़ में खिलाना, चार मशीनें खरीदकर पैथालोजिस्ट या रेडियोलोजिस्ट या कोई और लोजिस्ट बन जाना, आपस में मरीजों को एक-दूसरे को ऐसे रिफर करना जैसे सब तरफ से नोंचने को गिद्ध टूट पड़े हों, फाइवस्टार होटलों की ठसक के तथा महँगें नर्सिंग होम चलाना आदि। यह नहीं था कि इनके बीच अच्छे तथा सच्चे एलोपैथिक चिकित्सक नहीं थे। वे थे, पर नहीं-जैसे थे। वे थे पर उनकी प्राय: कोई पूछ नहीं थी। वे थे, और दिनोदिन वे और अधिक ‘थे’ होते जा रहे थे। वे भूतकाल की चीज हो रहे थे। चिकित्सा-क्षेत्र का वर्तमान तिकड़मों, साजिशों, दो नंबरियों तथा जोड़-तोड़वाले तथाकथित डाक्टरों का हो गया था। जनता भी ऐसे ही डाक्टरों को पसंद करती थी। उसे देश में अन्य क्षेत्रों में धोखा दिए जाने तथा जूते खाने आदि की ऐसी कुटेव लग गई थी, कि वह चिकित्सकों से भी यही चाहती थी। वह जो चाहती थी, वह भरपूर मात्रा में पा भी रही थी। जब तक डा. पांडे तथा डा. शर्मा-जैसे चिकित्सक एलोपैथी में मौजूद थे, आम जन को बेवकूफ बनने के लिए कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं थी। वे उन्हें उनके पसंद की चीज भरपूर, लगातार देते रहने की स्थिति में थे।
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डाक्टरों के हॉस्टल की छत पर अलसाए-से दो गिद्ध बैठे थे। दोनों खाए-पिए गिद्ध लग रहे थे। देश की स्थिति ऐसी हो गई थी कि सभी गिद्धों के खाने-पीने का भरपूर इन्तजाम हो गया था। बल्कि सही कहा जाय तो गिद्धों के दिन आ गए थे। देश गिद्धों से भर गया था। दसों दिशाएँ गिद्धमय थीं। हर कोने, कुर्सी, कार, जुलूस, स्कूल, अस्पताल तथा सड़क पर गिद्ध छा गए थे। देश पर गिद्ध मँडराते थे। आदमी के सिर पर गिद्ध छा गए थे। आदमी पर छाने का सबसे अचूक तरीका ही यह हो गया था कि गिद्ध बन जाओ। ऐसे गिद्धशुदा वातावरण में बैठे दो गिद्ध। चर्चारत ये गिद्ध पैदा होने के बाद ही अस्पताल के क्षेत्र में आ गए थे और इन्होंने पाया था कि यूँ तो सारा देश ही गिद्धों के लिए मुफीद है, परंतु अस्पताल का तो कहना ही क्या। वे यह मानने लगे थे कि आदमियों ने अस्पत��ल बनाया ही इसलिए था कि गिद्ध पनपें। यह इन दो गिद्धों का मत था। शायद यह सच भी था। हम यहाँ इन्हें गिद्ध-एक तथा गिद्ध-दो के नाम से संबोधित करेंगे। गिद्ध-एक ने हॉस्टल की छत से दिखते चीरघर को ताकते हुए कहा, “शर्माजी नहीं आए।” “शर्माजी कब आते हैं समय पर?” “लाश सड़ाकर मानेंगे।” “हमेशा ही सड़ा देते हैं।” “क्यों सड़ाते हैं?” “शायद, लाश का स्वाद नहीं है, इसीलिए।” “कौन कहता है कि शर्माजी को लाश का स्वाद नहीं है? इन लोगों को जिंदा आदमी का स्वाद मुँह को लग गया है, मुर्दे की तो बात ही क्या,” गिद्ध-दो ने कहा। दोनों गिद्ध इस मजाक पर हँसने लगे। वैसे यह मजाक नहीं था, यह वे गिद्ध नहीं जानते थे।
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जानकी बाबू ने कोई जवाब नहीं दिया। वे बाहर निकले। निकलकर उन्होंने एक अँगड़ाई ली, उँगलियाँ चटकाईं और एक नजर बूढ़े रिश्तेदार तथा उसके पीछे खटिया पर मृतप्राय पड़े कनछेदी को लादे हुए, घबराए पिल्लों से परेशान गाँववालों को देखा। ये गरीब भी साले एक ही हैं। बिना पैसा लिए अस्पताल में आ जाते हैं और फिर बौराए घूमते हैं। पैसे बिना सरकारी अस्पताल में घुसने की इनकी हिम्मत कैसे होती है? सबको पागल समझ रखा है क्या, कि कोई बिना पैसा लिए काम करेगा? किसके पास फुर्सत है? कौन बताएगा इनको कि मेल मेडिकल वार्ड किधर है? सभी तो पैसा बनाने में व्यस्त हैं। क्या फीस मिलती है मेल मेडिकल वार्ड का पता बताने में? फिर कोई क्यों बताए? क्या फीस मिलती है मरीज से सांत्वनापूर्ण मीठे बोल बोलने की? फिर कोई क्यों मीठे बोल बोले मरीजों से? क्या फीस मिलती है गरीब मरीजों से हमदर्दी की? फिर कोई क्यों हमदर्दी दिखाए इन हरामियों से? यहाँ, इस अस्पताल में हर चीज की फीस तय है। डाक्टर फीस लेकर मरीज देखता है। नर्स के पैसे अलग हैं। ड्रेसर पट्टी बाँधने के पैसे माँगता है और भंगी टट्टी का बर्तन देने के पैसे ले रहा है। वे स्वयं भी एम्बुलैंस लेकर जाते हैं, तो फीस के सहारे के बिना उनका गियर नहीं बदल पाता। अस्पताल में हर काम की फीस तय है। जिनकी नहीं है, उनकी भी हो जानी चाहिए। जैसे, मेल मेडिकल वार्ड का पता बताने की फीस। इसकी फीस क्यों नहीं होनी चाहिए? अवश्य होनी चाहिए। कोई पूछे कि मेल मेडिकल वार्ड कहाँ है, या फलाँ डाक्टर साहब कहाँ मिलेंगे, या आज तारीख क्या है श्रीमान–तो तुरंत अस्पताल के कर्मचारी को चाहिए कि वह पूछनेवाले से पाँच रुपए माँग ले। “क्या बात है?” जानकी बाबू ने हिकारत से पूछा। “मेल मेडिकल वार्ड किधर है, सरकार?” “अस्पताल के अंदर है,” जानकी बाबू ने कहा। “मरीज मर रहा है सरकार, तनिक समझा देते।” “मर रहा है तो अंदर ले जाओ।” “किधर सरकार?” “मेल मेडिकल वार्ड में यार।” “पर मेल मेडिकल वार्ड किधर है सरकार?” यकायक जानकी बाबू को अपना चिंतन याद आया। क्यों न आज से इन प्रश्नों के उत्तरों की फीस लागू कर दी जाए? “बता दें?” जानकी बाबू ने पूछा। “बता दें सरकार,” कनछेदी का रिश्तेदार अभी भी घिघिया रहा था। “बता देंगे, पर पाँच रुपए लगेंगे,” जानकी बाबू ने इत्मीनान से कहा और एम्बुलैंस का सहारा लेकर खड़े हो गए।
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ट्रॉली पर पड़ी लाश के चारों ओर भारी भीड़ है। युवा नेताओं तथा उनके भी युवा, किशोर तथा बच्चा-साथियों ने लाश पर कब्जा कर लिया। सभी नारे लगा रहे हैं। सभी गालियाँ दे रहे हैं। आसपास अभी भी फुर्सतिए मरीजों तथा तमाशबीनों की भीड़ लगी है। भीड़ बढ़ती ही जा रही है, जिसके कारण युवा नेताओं का उत्साह बरामदे में नहीं समा रहा। वे लाश को झुनझुने की तरह पकड़े हैं। डा. अग्रवाल के अलावा वे सारे डाक्टरों को भी गरिया रहे हैं, ताकि लड़ाई तथा हंगामा होने में कोई कसर न रह जाए। अस्पताल नहीं, बूचड़खाना है; समाज को बदल डालो; डा. अग्रवाल मुर्दाबाद; खून का बदला खून; इन्कलाब जिंदाबाद; हाय, हाय, हाय, हाय; डा. अग्रवाल की माँ की˙˙˙, दुनिया ने तेरे जुल्मों को देख लिया; डा. अग्रवाल को बंद करो; डाक्टर नहीं हत्यारा है; साथियो, संघर्ष करो, आदि चिरपरिचित नारों का कचरा बरामदे में तथा लाश पर बिखर गया था। एक युवा नेता ने कुर्ता फाड़कर छाती पीटना शुरू कर दिया, जिसे देखकर, नेतागिरी में साथी से पीछे न रह जाने की कसम खाए दूसरे युवा नेता ने अपना पाजामा ही उतार दिया था। चारों तरफ नंगा नाच होने लगा था। देश की बड़ी-बड़ी समस्याएँ नंगा नाच कर हल करने की यह युवा-पद्धति धीरे-धीरे बूढ़े नेताओं को भी पसंद आने लगी थी और वे भी विभिन्न मंचों पर धोतियाँ खोलकर या लँगोट उतारकर देश के सामने नंगा होने में कोई संकोच नहीं करते थे। भारतीय राजनीति का यह नंगा युग चल रहा था। इसी का नजारा इस समय सर्जिकल वार्ड के बरामदे में छोटे-मोटे स्तर पर चल रहा था। लाश के चारों तरफ राजनीति के गिद्ध-बच्चे उतर आए थे। ऐसे माहौल में एक बूढ़ा व्यक्ति भीड़ में धक्के खाता लाश की तरफ बढ़ने की कोशिश कर रहा था। वह दो-चार कदम ही बढ़ पाता था कि युवा शक्ति का रेला उसे पुन: दूर धकेल देता था। पर वह बूढ़ा भी एक ही ढीठ था। वह धक्के खाता हुआ भी लाश की ओर बढ़ता ही जा रहा था। लाश अभी भी उससे काफी दूर थी। पर वह बढ़ता गया। वह काफी आगे आ गया। जूनियर डाक्टरों तथा अस्पताली कर्मचारियों का एक झुंड, जिसका प्रतिनिधित्व डा. पांडे कर रहे थे, युवा नेताओं से बहस में लगे थे। बहस का अंत वहीं हुआ, जहाँ होना था। बात गाली-गलौज से होती हुई गुत्थमगुत्था तक पहुँच गई। इसी गुत्थमगुत्था के साथ नई नारेबाजी का एक सैलाब उठा, जो पुराने नारों के कचरे को बहाता हुआ पूरे बरामदे में फैल गया। धक्कामुक्की, मारा-मारी, जूतमपैजार, लातमलात, दे दनादन, हूलगदागद, लगे, लगे, लगे, मार दिया रे, अरे दद्दा रे, अबे तेरी तो˙˙˙ आदि की लहरें जनसमुद्र में उठने लगीं; लगा दो झापड़, अरे, अरे, मर गया रे, फेंक दो स्साले को नीचे, राजीव गांधी की जय, लगा पौद पै दो लात, महात्मा गाधी की जय, पटक दे साले को नीचे, बोल सियावर रामचंद्र की, भारत माता की जय आदि का फेन इन लहरों के साथ बहता हुआ किनारों पर खड़ी तमाशबीन जनता के बीच फैल गया। बूढ़ा आदमी, जो लाश के पास तक लगभग पहुँच ही गया था, इन लहरों की चपेट में आकर भीड़ में गोता खाता हुआ बरामदे के एक कोने में जा गिरा और रोने लगा। उसे रोते देख तट पर खड़ी दर्शक भीड़, जो कहीं भी झगड़ा होते देख खड़ी हो जाती थी, उसके इर्द-गिर्द खड़ी हो गई।
The acquisition of this book was prompted by its title, "Narak Yatra." 📚🤔😊 The narrative unfolds within the context of the Congress era, where the cost of essential services, including those related to life and death, is a central theme. 📜💰🧐 The primary setting is a government hospital, metaphorically depicted as a place of suffering. 🏥😔😥 The patients are portrayed as those enduring this environment. 🧑⚕️🤕😩 The story delves into the intricate political dynamics within the hospital, focusing on the power struggle between a retiring authority figure and a contender for the position. 🏛️🤝🧐 Both figures command their respective factions, comprising supporters, opponents, and a clash of ideologies. 👥⚔️🤯 The hospital transforms into a battleground, with the central conflict revolving around the pursuit of power and control. 🏥💥👑 The hospital is seen to be mini India - where people are always crushed down in the hands of those who are in power and control. 🇮🇳😔😠 Everyone is selfish and thuggish, not caring for the patients but wanting them to follow rules. 😠😡🤬 Corruption, lack of accountability, misbehavior, and taking pride as doctors, where what they say is the final word. 💰👎🗣️ The sycophantic nature of junior doctors toward their seniors. 👨⚕️👩⚕️🙇♂️ Clashes between the king's promoters on the lower level made the hospital a pothole for patients - they don't have the choice but to jump. 👑🏥🕳️
At last the story & character buildup is very smooth & fun to read, but in the middle portion of the story it gets torturing because the story revolves around the same cycle, same talks of patients and doctors, and the same scenario repeating itself. 📖🤔😫 The story portrays the simple framework of the political arena of hospitals & characters those who have to gain the throne & the characters that are supporting the two parties that one should win so they may get profit. 🏥👑💰 The characters fighting for the throne possess opposite and contrasting traits. ⚔️🎭🧐 One is cunning and sly, with connections to outside power. 😈🤝🤫 On the other hand, the second one is very confused, always seeking help, and does not think for themselves; a faulty surgeon, not good at playing politics. 😕🤕🤔 Rivalry between Dr. Chaubey - Character 1 and Dr. Aagrwaal - Character 2, respectively. 🧑⚕️🧑⚕️😠 The climax is based on a realistic scenario - playing on patients' emotions, deceiving Character 2. 😭🎭💔 In the end, character one won at the cost of patient’s life, wrong diagnosis, and grandiose behavior. 🏆⚰️🤕 A decent novel set on the structure of Indian society, having a sarcastic & humorous perspective to be presented to readers. 🇮🇳😂🧐