रांगेय राघव हिंदी के उन विशिष्ट और बहुमुखी प्रतिभावाले रचनाकारों में से हैं जो बहुत ही कम उम्र लेकर इस संसार में आए, लेकिन जिन्होंने अल्पायु में ही एक साथ उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार, आलोचक, नाटककार, कवि, इतिहासवेत्ता तथा रिपोर्ताज लेखक के रूप में स्वंय को प्रतिस्थापित कर दिया, साथ ही अपने रचनात्मक कौशल से हिंदी की महान सृजनशीलता के दर्शन करा दिए।आगरा में जन्मे रांगेय राघव ने हिंदीतर भाषी होते हुए भी हिंदी साहित्य के विभिन्न धरातलों पर युगीन सत्य से उपजा महत्त्वपूर्ण साहित्य उपलब्ध कराया। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर जीवनीपरक उपन्यासों का ढेर लगा दिया। कहानी के पारंपरिक ढाँचे में बदलाव लाते हुए नवीन कथा प्रयोगों द्वारा उसे मौलिक कलेवर में विस्तृत आयाम दिया। रिपोर्ताज लेखन, जीवनचरितात्मक उपन्यास और महायात्रा गाथा की परंपरा डाली। विशिष्ट कथाकार के रूप में उनकी सृजनात्मक संपन्नता प्रेमचंदोत्तर रचनाकारों के लिए बड़ी चुनौती बनी।
Rangeya Raghava, birth name Tirumalai Nambakam Vir Raghava Acharya, was born in Agra, a city of Uttar Pradesh state, India. A prominent Hindi writer of the 20th century, he completed his post-graduation studies from St. John's College, Agra, and later completed his Ph.D. on Guru Gorakhnath and his times. He started writing at the age of 13 years, and during his short life of 39 years, he was endowed with a number of prizes.
कुछ किताबें इतनी अच्छी होती है कि क्या लिखूं यह समझ में नहीं आता है। बुद्ध के बारे में कितना भी पढ़ लो, कितना भी जान लो पर हर बार जब आप इसे पढ़ना प्रारम्भ करते है तो आप एक अलग दुनिया में पहुंच जाते है। एक रहस्यमयी आकर्षण, एक भीनी भीनी सुगंध और एक जादुई प्रभाव बुद्ध आपके ऊपर डालते है।
किताब की भूमिका में रांगेय राघव लिखते है कि बुद्ध को मैंने चमत्कारों से अलग करके देखा है। चमत्कार व्यक्ति की महानता को गिराते है। बुद्ध का जीवन बहुत विशाल है। प्रस्तुत पुस्तक में बुद्ध का पूरा जीवन नहीं है, बुद्ध का सम्पूर्ण जीवन लिखने के लिए ऐसे पाँच छह ग्रंथ लिखने होंगे। अभी तक बुद्ध पर लिखने वालों का दृष्टिकोण साम्प्रदायिक रहा है। मैने अपना एतिहासिक दृष्टिकोण रखा है।
प्रस्तुत पुस्तक में बहुत कुछ ऐसा है जो कि इसे एक साथ पौराणिक और आधुनिक बनाता है। आधे उपन्यास में सिर्फ बुद्ध ही बुद्ध है किंतु अंतिम पलों में ऐसा स्त्री विमर्श है जो न सिर्फ आपको चौकाता है वरन गंभीरता से सोचने पर विवश कर देता है। भाषा बहुत ही उच्च कोटि की है, कहीं कहीं विशुद्ध हिंदी को समझने में कठिनाई होती है पर साथ ही साथ गर्व होता है कि हमारी अपनी भाषा इतनी अलंकृत भी हो सकती है। उपन्यास के अंत में प्रधान पात्र यशोधरा मुखर हो उठती है।
यशोधरा रोने लगी। सच ही तो वह नारी थी। पति के गौरव से प्रसन्न, फिर भी अपने आप से असन्तुष्ट। कैसा था यह विचित्र द्वंद !
पुरुष स्त्री से संभोग कर के सोचता है वह भोक्ता है। मूर्ख है वह । स्त्री भी समान भोक्ता है । वे एक दूसरे के पूरक है। जन्म तो दुख नहीं है । कारण नहीं जान सकने के कारण क्या सत्ता को ही दुख कह देने से दर्शन बन जाता है । क्षत्रिय का कैसा समाधान है। धरती पर बीज गिरता है। फूटता है। वृक्ष बनता है। विशाल बनता है। पत्ते निकलते है, फल आते है। लोग खाते हैं, छाया में बैठते है। और कोई कहे कि बीज धरती में गिरा यह दुख है। फूटा यह भी दुख है। वृक्ष बना यह भी दुख है। और फिर वृक्ष कहे कि मैं अपने एक एक पत्ते को सुखाकर गिरा दूँगा क्योंकि यह चंचल है, ममता का संघट है, इसी की छाया में संसार बैठता है, और वह पत्ते गिरा दे, वह फल नहीं दे, बीज नहीं दे, क्योंकि वह तो असंग रहना चाहता है......... तो यह क्या है ? धरती से विद्रोह कर के वृक्ष की सत्ता ही क्या है ? और धरती से विद्रोह करने की अपनी असामर्थ्य में वृक्ष कहता है कि न जन्मेगा, न मरेगा ? पुरुष !! वह स्त्री से घृणा करता है और इसलिए अब जन्म नहीं लेगा। पुराने श्रमण तो कामिनी को ही बुरा कहते थे, उसके स्वामी तो स्त्री के मातृत्व को भी बुरा कहते है। अन्यथा यह है क्या ?
अद्धभुत पुस्तक जिसे पढ़ने के बाद प्यास और बढ़ गयी। ऐसा लगा जैसे यह किताब कभी खत्म न हो। उत्कृष्ट रचना।
यशोधरा जीत गयी : सिद्धार्थ अपने पुत्र और अपनी स्त्री को रात्रि के अंधकार में सोता हुआ छोड़कर चला गया। सिद्धार्थ जो परिव्राजक होने चला था, वह रात्रि के अंधकार में कायरों की तरह निकल गया। यशोधरा की व्यथा और उसका संघर्ष पुस्तक का मूल है। यशोधरा के प्रश्नो के उत्तर न ज्ञान प्राप्त बुद्ध के पास हैं और न उनके पास जो बुद्ध की महान बतलाते हैं। स्त्री को घृणित समझने और पुत्र को दुख का कारण समझने बालों से क्या सृष्टि चल सकती है ? यदि सभी पुरुष यही विचार कर संन्यास गृहण कर लेंगे तो भीक्षा देना वाला घर किसका होगा ? यशोधरा स्वयं को घृणित समझने लगती है, उसे लगने लगता है कि वह घृणित है इसलिए सिद्धार्थ उसे त्यागकर चले गए। केवल वहीं नहीं वह सिद्धार्थ की मौसी से कहती भी है कि आर्य सभी स्त्रियों को घृणित ही समझते हैं इसी कारण वह स्त्री को परिव्राजक होने की अधिकारिणी नहीं समझते। यशोधरा अपने स्वाभिमान का बुद्ध के आगमन पर झुकने नहीं देती और पुत्र को भेजती है जा पिता से अपनी विरासत मांग ला, और बुद्ध उसे भी परिव्राजक बना लेते हैं। जो आठ वर्ष पूर्व पूत्र को दुख का कारण समझ परिव्राजक हुआ था, जिसने संसार का त्याग किया था। यशोधरा ने पुनः उसे पिता होने पर विवश कर दिया था। बुद्ध ने पिता बनकर अपने पुत्र को विरासत में संन्यास दिया था।
This entire review has been hidden because of spoilers.
कुछ किताबें इतनी अच्छी होती है कि क्या लिखूं यह समझ में नहीं आता है। बुद्ध के बारे में कितना भी पढ़ लो, कितना भी जान लो पर हर बार जब आप इसे पढ़ना प्रारम्भ करते है तो आप एक अलग दुनिया में पहुंच जाते है। एक रहस्यमयी आकर्षण, एक भीनी भीनी सुगंध और एक जादुई प्रभाव बुद्ध आपके ऊपर डालते है।
किताब की भूमिका में रांगेय राघव लिखते है कि बुद्ध को मैंने चमत्कारों से अलग करके देखा है। चमत्कार व्यक्ति की महानता को गिराते है। बुद्ध का जीवन बहुत विशाल है। प्रस्तुत पुस्तक में बुद्ध का पूरा जीवन नहीं है, बुद्ध का सम्पूर्ण जीवन लिखने के लिए ऐसे पाँच छह ग्रंथ लिखने होंगे। अभी तक बुद्ध पर लिखने वालों का दृष्टिकोण साम्प्रदायिक रहा है। मैने अपना एतिहासिक दृष्टिकोण रखा है।
प्रस्तुत पुस्तक में बहुत कुछ ऐसा है जो कि इसे एक साथ पौराणिक और आधुनिक बनाता है। आधे उपन्यास में सिर्फ बुद्ध ही बुद्ध है किंतु अंतिम पलों में ऐसा स्त्री विमर्श है जो न सिर्फ आपको चौकाता है वरन गंभीरता से सोचने पर विवश कर देता है। भाषा बहुत ही उच्च कोटि की है, कहीं कहीं विशुद्ध हिंदी को समझने में कठिनाई होती है पर साथ ही साथ गर्व होता है कि हमारी अपनी भाषा इतनी अलंकृत भी हो सकती है। उपन्यास के अंत में प्रधान पात्र यशोधरा मुखर हो उठती है।
यशोधरा रोने लगी। सच ही तो वह नारी थी। पति के गौरव से प्रसन्न, फिर भी अपने आप से असन्तुष्ट। कैसा था यह विचित्र द्वंद !
पुरुष स्त्री से संभोग कर के सोचता है वह भोक्ता है। मूर्ख है वह । स्त्री भी समान भोक्ता है । वे एक दूसरे के पूरक है। जन्म तो दुख नहीं है । कारण नहीं जान सकने के कारण क्या सत्ता को ही दुख कह देने से दर्शन बन जाता है । क्षत्रिय का कैसा समाधान है। धरती पर बीज गिरता है। फूटता है। वृक्ष बनता है। विशाल बनता है। पत्ते निकलते है, फल आते है। लोग खाते हैं, छाया में बैठते है। और कोई कहे कि बीज धरती में गिरा यह दुख है। फूटा यह भी दुख है। वृक्ष बना यह भी दुख है। और फिर वृक्ष कहे कि मैं अपने एक एक पत्ते को सुखाकर गिरा दूँगा क्योंकि यह चंचल है, ममता का संघट है, इसी की छाया में संसार बैठता है, और वह पत्ते गिरा दे, वह फल नहीं दे, बीज नहीं दे, क्योंकि वह तो असंग रहना चाहता है......... तो यह क्या है ? धरती से विद्रोह कर के वृक्ष की सत्ता ही क्या है ? और धरती से विद्रोह करने की अपनी असामर्थ्य में वृक्ष कहता है कि न जन्मेगा, न मरेगा ? पुरुष !! वह स्त्री से घृणा करता है और इसलिए अब जन्म नहीं लेगा। पुराने श्रमण तो कामिनी को ही बुरा कहते थे, उसके स्वामी तो स्त्री के मातृत्व को भी बुरा कहते है। अन्यथा यह है क्या ?
अद्धभुत पुस्तक जिसे पढ़ने के बाद प्यास और बढ़ गयी। ऐसा लगा जैसे यह किताब कभी खत्म न हो। उत्कृष्ट रचना।
An excellent, heart touching account of the evolution of Buddha. Sadness and turmoil of Yasodhara and her grit and patience forms the crowning moments of this story. A classic and a piece of literature.
Yashodhara character has always fascinated me. Raghav book introduces a new Yasodhara who is bold , knowledgeable, who take active interest in her husband's search for enlightment