कच्चे और ख़ुदरे शब्दों का एक अजब जादू है केदारनाथ सिंह जी की कविताओं में।
उस आदमी को देखो, ईश्वर और प्याज़, तुम आईं, सुई और तागे के बीच में, शब्द, पिता के जाने पर, अड़ियल साँस, पर्वस्नान, 'नया गाँव' की बत्ती, एक पारिवारिक प्रश्न, प्रिय पाठक, मोड़ पर विदाई और अंत मे बाघ (केवल 9 खंड) मुझे छू गयी। बाघ के 9 खंडो में ही बिम्बो का जो विशिष्ट रूप मिलता है वो पूरी रचना को पढ़ने को उतेजित करता है।