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Paperback
First published January 1, 1966
मौसी ऐसी ही बोलती है। बोर्डिंग को बोटिन, विराटनगर को विलासनगर, रामनगर को लामनगर !The period described in the novella is before Independence and the patriotic fervour perfusing the youngsters of that time.
नया कोट-जूता पहनकर बाहर जरा निकलो -'जंटूलमन-इश्टूडन्ट' बनकर।
मोहरील मां के घर में मच्छरों और खटमलों के अलावा छछून्दरों और चमगादड़ों का भी बड़ा भारी अड्डा था। ... रात में रह-रहकर ट्रेजरी-कचहरी की ओर से एक खौफनाक आवाज आती। .. शहर के चौकीदारों की करकर्ष और डरावनी बोली, की छटपटाहट, की कचर-कचर और हजारों- हजार मच्छरों के सूइयां गड़ानेवाले गीत ! सामने वाले घर में बँधा हुआ बीमार घोड़ा नाक झाड़ता - फड़ररर !
कभी 'झोंक' में आकर तुम भी पड़ना-लिखना मत छोड़ बैठना। अभी सीधे बढ़े चलो। राह में छाँव में कहीं बैठना नहीं। कितने चौराहे आएँगे। न दाएँ मुड़ना, न बाएँ, सीधे चलते जाना।