मुझे हमेशा से लगता रहा था कि जीवन में व्यस्त रहना सबसे मूर्खता का काम है। इस जीवन को मैं जितनी चालाकी से जी सकता था, जी रहा था। कम-से-कम काम करके ज़्यादा-से-ज़्यादा वक़्त ख़ाली रहना मेरे जीने का उद्देश्य था। मैं कुछ न करते वक़्त सबसे ज़्यादा सम पर रहता था। सुरक्षित जीवन की कल्पना में काम करते-करते एक दिन मैं मर नहीं जाना चाहता था। मैं किसी भी तरह की मक्कारी पर उतर सकता था अगर मुझे पता चले कि मेरे दिन बस काम की व्यस्तता में बीतते चले जा रहे हैं। ~इसी किताब से
कश्मीर के बारामूला में पैदा हुए मानव कौल, होशंगाबाद (म.प्र.) में परवरिश के रास्ते पिछले 20 सालों से मुंबई में फ़िल्मी दुनिया, अभिनय, नाट्य-निर्देशन और लेखन का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं। अपने हर नए नाटक से हिंदी रंगमंच की दुनिया को चौंकाने वाले मानव ने अपने ख़ास गद्य के लिए साहित्य-पाठकों के बीच भी उतनी ही विशेष जगह बनाई है। इनकी पिछली दोनों किताबें ‘ठीक तुम्हारे पीछे’ और ‘प्रेम कबूतर’ दैनिक जागरण नीलसन बेस्टसेलर में शामिल हो चुकी हैं।
कौल के पात्रों का आपस में गुँथा हुआ एक छोटा सा सँसार जिसकी जड़ें आपस में हम सब के भीतरी, निजी कमरों में बहुत दूर तक फैली हुई हैं... हम अपने अपने कमरे की खिड़की से कौन सा सँसार और कौन सा आसमान देखते हैं? और उसमें उनका क्या जो एक दिन सच में उसी आसमान में उड़कर गायब हो जाते हैं। और कुछ जो नहीं उड़ पाते।
इस सब में एक दिन बहुत सहजता से एक दूसरे का नाम ले लेने का सुख बहुत सुंदर है।
"जब कहानी के किरदारों का छुआ आप महसूस करने लगें, जब उनकी सिहरन आपके रोंगटों में दिखने लगे तब समझ लेना आपने कुछ अद्वितीय पढ़ लिया है।"
मानव कॉल को पढ़ना एक बेहद जोख़िम का काम है। एक बेतरतीब जंगल में भटक जाने जैसा। ऐसा भटकना जिसका इंतज़ार, हम अपने आप से छुपकर बारहा करते रहते हैं। और "टूटी हुई बिखरी हुई" है एक दर्पण। आप नग्न होकर जिसके सामने खड़े हैं। पहले तो नग्नता असहज करती है, फिर खुद अपना अक्स! क्या त्रासदी है! हम खुद को ही देखते हुए असहज हुऐ फिरते हैं। और फूहड़ता तो यह कि हम कभी पेट अंदर खींचकर, तो कभी बाल सही जमाकर खुद को देखते हैं। हम एकांत में भी वो रहना चाहते हैं जो हम भीड़ में हैं। यह क़िताब हम सबकी ज़रूरत है। मेरा मतलब सिर्फ इतना नहीं कि इससे Sappho और LGBTQ पर हमारी समझ विकसित होती है अपितु खुद को समझने की सहजता भी विकसित होती है। "टूटी हुई बिखरी हुई" सिर्फ़ एक कहानी नहीं है यह एक नक्शा भी है हम सबके लिए। हमें और जानने -समझने कहाँ जाना है, इसके दिशानिर्देश कहानी की बनावट में ही निहित हैं। कहानी हमें बताती चलती है "Well of Loneliness", "Orlando", "After Sappho", "लिहाफ़" के बारे में। यह बहुत ज़रूरी था। शुक्रिया मानव! मानव को पढ़ने में एक ख़तरा ये भी कि जितना आप उन्हें पढ़ते हैं उतना ही उनके नज़दीक होते जाते हैं। यह ख़तरा इसलिए है कि जितने आप मानव के पास होंगे, उतना ही खुद के भी। इस निकटता की हमें आदत नहीं होती। शब्दों से मन के कैनवास पर रंगसाज़ी करने की जो शक्ति मानव के पास है, वह बिरलों को ही प्राप्त है। एक अजीब आकर्षण है ऐसे लेखन का, जो समझ से परे है। ना तो बड़े-बड़े शब्दों की लयात्मकता-संगीतात्मकता की डोरी ही है, ना कहानी कहने का सदियों से चला आता, सिद्ध ढांचा! पर कुछ खास है। कोई जादुई शक्ति जिसे मन में उतारने का रास्ता पता है। वह इंतजार नहीं करती दरवाजे खुलने का। ना मन की दीवारों को टटोलती है, जैसे अंधेरे में कोई दरवाज़े तक पहुंचाने की जद्दोजेहद कर रहा हो। उसे पता है कोई दिव्य चोर रास्ता, वह नहीं करती प्रतीक्षा, बस घुस जाती है, बेधड़क! एक पुरुष का इस विषय पर लिखना शायद बहुतों को नांगवारा लगे। "आप कैसे समझेंगे" या "सांत्वना का साहित्य" जैसी बातें भी हो सकता है लोग बनाएं किंतु असलियत तो यह है कि एक पुरुष का इस विषय पर लिखना पूर्णत: नैसर्गिक है और ज़रूरी भी। मानव अपने लिखे में ऐसे ही पूर्वाग्रहों और चश्मों की तो बात करते हैं जो हमने धीरे-धीरे अपनी आंखों पर चढ़ा लिए हैं।
⭐⭐⭐⭐ (4/5) This was a tough read. I was looking forward to an ending which would have been more satisfying. But instead, this ending was actually closer to reality. It felt as if this story is more like a never ending journey. It's going to continue on and on and on - hopefully not. Quite a sensitive story handled such delicately by Manav Kaul. Always in awe of his words and understanding of reality.
टूटी हुई बिखरी हुई – मानव कॉल प्रकाशन- 2023 पृष्ठ- 252 प्रकाशक- हिन्द युग्म @hind.yugm श्रेणी- उपन्यास चरित्र- यश, रेणु, राजुला, रागनी, जीवन, धुन, शिखा, धीरू, जाह्नवी मैडम, धीरज, धीरज की माँ, स्वांत सुखाय (टेडी बियर) इस उपन्यास के 147वे पन्ने पर रागिनी यश से कहती है “तुम्हारी माँ की कहानी में भी नायक तुम ही हो जबकि लड़ाई उनकी है” और ये पढ़ते ही इस बात पर रुकना होता है कि यश और रेणु की कहानी में जब कहानी रेणु और राजुला की है तो मुख्य किरदार कौन है। जिसकी कहानी है अगर वो इस कहानी का मुख्य किरदार है तो ये कहानी है यश की माँ की, धुन की, रेणु की, राजुला की और उन सभी की जो रेणु है।
इस उपन्यास को पढ़ते हुए मुझे मेरे एक दोस्त की याद आई जिसने मुझे Call Me by Your Name और Blue is the warmest color की याद आई। इस किताब में “The Well Of Loneliness, Orlando और After Sappho” का ज़िक्र काफी strong पिलर की तरह है। मैं ये तीनों किताबें पढने के बाद इस किताब के हर पन्ने को शायद फिर से पढूं। तब इस किताब की गहराई को और अछे से समझ पाऊं। लेकिन तबतक इस किताब की ये बातें जीवन में गहरे रहेंगी।
“जब दो लोगों के बीच बहुत गहरा संबंध होता है तो वो कुछ वक़्त बाद एक-दुसरे के जैसे दिखने लगते हैं” “अधिकतर लोग करते हैं, वे एक कहानी बनाते हैं जिसमें वे कह सकें कि वे भी जानते हैं हमारे संघर्ष को”। “झूठ को चिल्लाना पड़ता है जबकि सच को कोमलता से कहा जा सकता है।“
Manav Kaul is an all-time favourite of mine and there is no doubt about it. I have bought all of his books but truthfully speaking I only read his books in parts. It gives me a sense of satisfaction.
I know it's a Hindi book and the review should be in Hindi but I can better analyze it in English. A stunner in this book is what I should say. And I started this book in 2024 and what a beginning it has provided to my year.
An extremely good read. The characters are so vibrant yet simple. Renu, rajula, Yash, dhun, Ragini, Jiban....everyone has shades in their characteristics. Frankly speaking I have read the book slowly just to enjoy the lines, the emotions and everything else. Somehow eccentric it might seem while reading because the relationship between Rajula and renu might make you question or love them. It's different for everyone. But I thoroughly enjoyed this book
इसे पढ़ते वक़्त मन में खजुराहो में ली हुई कुछ तस्वीरें साजा हुईं। मुझे याद है बहुत गर्व महसूस हुआ था उन मंदिरों को देखते हुए। निश्चित रूप से हमारा समाज उस दौर में यौन शिक्षा का प्रतिनिधि रहा होगा। योग और संभोग दोनो के बारे में खुलकर बात कर रहा होगा। आज इस किताब को पढ़ कर तुरंत गूगल पर erotica शब्द के हिन्दी मानी खोजे…सबसे नज़दीकी शब्द मिलतें हैं “प्रेमकाव्य” और “अश्लील साहित्य”। अब जब शब्दों कि कमी है तब साहित्य तो लिखा जाने से रहा।@manavkaul19 ने समलैंगिकता और अकेलेपन को काव्यात्मक रूप से गढ़ा है। पढ़ते हुए लगता है जैसे लेखक कोई कोहरे से गुज़र रहा है। एक पुरुष लेखक के लिए क़तई आसान नहीं है महिला केंद्रित साहित्य लिखना और वह भी lesbianism जैसे कोमल विषय पर। जरा सी चूक उसको भद्दा बना सकती थी पर लगता है मानव की अपनी संवेदनशीलता ने इस किताब को एक तरफ़ा होने से बचाया ही नहीं पूरा न्याय दिया है। यह किताब हिंदी साहित्य की टैक्सी ड्राइवर (Martin Scorsese’s movie) है ।
Manav Kaul is waqt ke un chuninda lekhakoñ meiñ se ek haiñ jinheiñ padhna apne aap meiñ saubhagya ki baat hai. Jis tarah se ye kahani striyoñ ki samajik swatantra ko chhookar jaati hai us tarah se ise likh pana behad hi mushkil hai. Aur sabse mahtavpurna kirdaar Yash jo ek nayak na hote hue bhi is kahani ke sabhi kirdaaroñ ke kendra meiñ joojhta hua ant meiñ ek naya jeevan chunta hai! Ye upanyas sabhi ko padhna chahiye!
I have very mixed feelings after reading this book. It isn't easy for me to understand the perspective when a male lens presents such a complex female perspective. My mind always doubts the authenticity of the perspective. वैसे तो मुझे मानव कॉल का लिखा बहुत पसंद आता है और ये लिखा भी पसंद तो आया है पर फिर भी खुछ ऐसा था जो मुझे पसंद नहीं आया क्योंकि सायद वो लिखा मुझे समझ ही नहीं आया