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Himanshu Joshi

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Displaying 1 - 11 of 11 reviews
Profile Image for Ravi Prakash.
Author 58 books78 followers
September 16, 2018
क्या लिखूं इसके बारे में। कई दिनों से इसी उधेड़बुन में लगा हूं। कथानक का तदात्मिकरण मैं स्वयम के अनुभवों से करता हूँ। लेकिन जिन अनुभवों को मैंने कभी गम्भीरता से नही लिया, लेखक ने तो उसके वर्णन में कलेजा निकाल कर रख दिया है। शायद यही कारण है कि मैं इस उपन्यास को पूरे 5 स्टार्स नही दे रहा हूँ। शब्द-चयन, वाक्य-संयोजन, पात्र-चरित्रचित्रण, देशकाल वर्णन एवम संवाद के दृष्टिकोण से यह अतिउत्तम रचना है। लेकिन वैचारिक दृष्टिकोण से मैं इससे सहमत नहीं हो सका।
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क्यों? इसका कारण भी बताना चाहूंगा। विराग शर्मा, जो कि मुख्य पात्र है, एक गरीब पुरोहित का पुत्र है। नैनीताल में वह अपनी पढ़ाई कर रहा होता है। ग्रेजुएशन के दौरान अर्थाभाव के कारण खर्चो को पूरा करने के लिए वह एक ट्यूशन पढ़ाना शुरू करता है।उसकी विद्यार्थी, अनुमेहा जिसका नाम है, वही नायिका है इस कथानक की। इस अधिगम-अध्यापन की प्रक्रिया के दौरान दोनों के बीच एक प्रकार की आसक्ति, सम्मोहन या मुग्धता कह लीजिए, पैदा होती है। अंग्रेजी के एक शब्द 'इंफैचुएशन' (Infatuation) से इसका सही-सही शाब्दिक अर्थ लगाया जा सकता है। इस इंफैचुएशन की शुरुवात के लिए किसी एक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। लेकिन, जो मेरा मानना है, जब यह इंफैचुएशन बढ़कर किसी परिणाम (चाहे गलत या सही) पर पहुँचता, तो उत्तरदायित्व स्वरूप पूरी जिम्मेदारी विराग शर्मा पर ही आती। ज़्यादातर इस तरह के केसेज़ में जो देखा गया है-कोई सार्थक परिणाम निकल कर नही आता, यहाँ पर भी कुछ ऐसा ही है।
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जिन परिस्थितियों का जिक्र किया गया है उपन्यास में, स्वाभाविक है उनमें इंफैचुएशन का उत्पन्न हो जाना। इसमे ज्यादा कशमकश उसके लिए होती है, जो पढ़ाता है। बिल्कुल हैमलेट के राजकुमार की "टू बी ऑर नॉट टू बी" जैसी स्थिति होती है। क्योंकि कहीं न कहीं उसे इस बात का अहसास होता है कि जब आप शिक्षक की कुर्सी पर बैठ जाते है, तो समाज आपसे बहुत ज्यादा नैतिक अपेक्षाएं रखने लगता है। फिर उनको निभाना और दिल को समझाना कोई आसान काम नहीं है। कथानक में यह उलझन और भी बारीकी से दिखाई गई है, क्योंकि विराग को तत्वज्ञान, वेद-वेदांग, शास्त्र और पुराणों का पढ़ने का बेहद शौक है, जो उसे विरासत में मिला है। नीति-अनीति, नैतिकता-अनैतिकता के मानसिक भँवर में डूबता-उतराता रहता है। वह अनुमेहा से अपने लगाव को कभी मुखर रूप स्वीकार नहीं करता लेकिन मन ही मन उसे बहुत चाहता है।
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एक और पात्र भी है-सुहास। सुहास की तुलना आप शरतचंद्र कृत "देवदास" के 'चुन्नी बाबू' से कर सकते हैं। जिंदगी में हर तरह का नशा किया है सुहास ने।सुहास विराग का रूममेट भी है, मित्र भी है, शुभचिंतक भी है, और शिष्य के जैसा भी। वह विराग को 'गुरु' कहकर बुलाता है। विराग को ट्यूशन सुहास ने ही दिलाया था। वह अनुमेहा और उसके परिवार से पूर्व परिचित था। एक अन्य महत्वपूर्ण पात्र हैं, मिसेज दत्ता। अनुमेहा उनकी भतीजी है। अनुमेहा, मिस्टर दत्ता और मिसेज दत्ता साथ मे ही रहते हैं। पूर्व पत्नी के मरने के बाद मिस्टर दत्ता ने दूसरी शादी की थी। मिसेज दत्ता आज़ाद ख्याल महिला है, उनके शौक अजीब और परस्पर विरोधाभासी है। ऐसा उसी के साथ होता है जिसका अन्तर्मन शांत नहीं होता है।
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एक बार एक हफ्ते के लिए मिस्टर दत्ता और अनुमेहा बाहर जाते है, तो मिसेज दत्ता घर मे अकेली रहती है। विराग को बुलवाती है। चाय की चुस्कियों के साथ-साथ धर्म-आध्यात्म आदि और तमाम दुन्यावी बातों की चर्चाएं होती। उसे सिगरेट भी ऑफर करती है और बाहर घूमने चलने को भी कहती हैं। और इधर विराग को इस बात का डर खाये जा रहा था कि मिसेज दत्ता ने कही उसकी और अनुमेहा की बाते तो नही सुन ली, या वह उस पर शक तो नही कर रही। असल बात तो यह थी कि मिसेज दत्ता अपने आनंद, शांति और सुख के लिए ज्यादा व्यग्र थी। विराग को वह एक साधन के रूप में देख-परख रही थी। घूमकर लौटते समय, मिसेज दत्ता सहसा विराग की ओर मुखातिब होकर पूछती है,

"मेरे बारे में आपकीं क्या धारणा है विराग? मैं कैसी लगती हूँ?"

यह पहली बार था जब मिसेज दत्ता ने विराग को 'मास्टरजी' न कहकर केवल 'विराग' से संबोधित किया था। विराग पहले से ही झुंझलाया था। उसने पूछा

"आप सुन सकेंगी?"

"कहिये भी..."

"आपके बारे में कोई धारणा नही बनाई जा सकती। आप एकदम, एकदम...",

कहते-कहते रुक जाता है, फिर कहता है,

" आप एकदम दुश्चरित्र है। नीच है। आध्यात्म, मंदिर सब ढोंग है आपके लिए। आप नरक के कीड़ों से भी बदतर है। मैं थूकता हूँ। थू...।"

विराग की धिक्कार से मिसेज दत्ता का जीवन ही बैरागी हो जाता है।
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इधर जब सुहास को इस बात का पता चलता है तो वह विराग को सलाह देता है कि उसे तो दोनों के साथ (मिसेज दत्ता और अनुमेहा) एन्जॉय करना चाहिए। विराग को इस पर बहुत गुस्सा आता है। उसके संस्कार तो उसे ऐसा सोचने भी नही दे सकते है।
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एक दिन यूँ होता है कि सुहास और अनुमेहा साथ-साथ टहलते हुए दिखाई देते हैं। हँसते-बोलते, हाथों में हाथ डाले हुए। ये दृश्य देखकर विराग की कुंठा जागृत हो जाती है। देवत्व रूप लिए हुए विराग अब कुंठित 'देवदास' बन जाते। सारे संस्कार शराब और गांजे के नशे में उड़ने लगते हैं। जब बात इतनी ही ज्यादा गंभीर हो गयी थी, तो विराग को अनुमेहा से बात करनी चाहिए थी। लेकिन नही, विराग एक उलझा हुआ चरित्र है। कुछ दिनों के बाद तो ऐसा होता है कि सुहास विराग बन जाता है और विराग सुहास।
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कहा जाता है कि हम अपने प्रिय की अपेक्षा दिल में बसी प्रिय की मूरत से ज्यादा प्यार करते है। जब प्रत्यक्ष व्यक्तित्व में कोई दुर्गुण आ जाता है, तो जल्दी उसे स्वीकार नही कर पाते बल्कि जो इमेज उसकी हमारे दिल मे है, बस उसी को सब कुछ मानते है। इस मामले में मेरा मानना है कि कभी किसी के बारे सब कुछ जानने का प्रयास नही करना चाहिए, खासकर जिससे कोई लगाव हो, क्योंकि सोच बदल जाती है, द्वंद शुरू हो जाता है दिमाग में। या फिर आपका ऐसा संतुलित व्यक्तित्व हो कि उसके दुर्गुणों को स्वीकार कर के लगाव बनाये रख सकें। उस घटना के बाद जब फिर मिसेज दत्ता और विराग की मुलाकातें होती है तो मिसेज दत्ता कहती है,

"आपसे प्रेरित होकर ही मैंने ये मार्ग चुना है।"

विराग कहता है-

"मेरा अब इनसे विश्वास उठ गया है।मैंने सारी पुस्तके फेंक दी है। आपका यह सारा धर्म मुझे अधर्म सा लगने लगा है। वैसे अधर्म में भी क्या धर्म नही है?"

मिसेज दत्ता बोल पड़ती है-

"नही, नही। ऐसा न कहिये। यह विरक्ति कहीं आपको पागल बना देगी।"

इस पर विराग पागलों की तरह हँसता है।

'मैंने तो यही कहा न जीवन जीने के लिए होता है। मै तो आपकीं ही बातें दुहरा रहा हूँ।....मैं ठीक कह रहा हूँ मिसेज दत्ता। नैतिकता-वैतिकता क्या होती है?"

विराग की ये बातें अनुमेहा भी सुन लेती है। उसके मन मे विराग के प्रति वितृष्णा उत्पन्न हो जाती है। एक दिन विराग को इस बात के लिए उलाहना भी देती है।

अब सुहास सुधर रहा था और विराग बिगड़ रहा था। सुहास अब किताबों में रमा रहता तो विराग किताबें बेचकर नशा करता था। दोनों के पीछे कारण एक ही था-अनुमेहा। ट्यूशन खत्म हो जाता है। अनुमेहा नैनीताल से लखनऊ चली आती है। सुहास पास हो जाता है, फिर कंप्टिसन की तैयारी करता है और गवर्नमेंट जॉब पा जाता है। विराग महाशय अपने गांव आ जाते हैं। माँ पहले ही मर चुकी होती है। पिताजी जीवित रहते हैं, वो भी काफी वृद्ध। एक छोटा भाई भी होता है। विराग मेहनत-मजदूरी करके घर को संभालता है। फिर एक स्कूल में मास्टरी शुरू कर देता है।यहाँ पर उपन्यास ���ो वास्तविक ठोस धरातल प्राप्त होता है। जिंदगी का यथार्थ विराग के सामने प्रकट होता है। अनुमेहा लखनऊ में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही होती है। विराग के पुरोहित पिताजी इस स्थिति में बहुत त्याग का फैसला लेते है- वह विराग की शहर जाकर कमाने को कहते हैं। क्योंकि गांव में उसकी तरक्की नही हो सकती। विराग दिल्ली चला जाता है। कुछ सालों तक क्लर्क का काम करता है। फिर वो जॉब छोड़कर रेडियो में काम करने लगत��� है। सात-आठ साल बाद किसी काम के सिलसिले में जब वह एक बार लखनऊ आता है तो अनुमेहा से मुलाकात होती है। यह मुलाकात मन मे एक उम्मीद जगाती है कि हो सकता है अनुमेहा और विराग एक दूसरे से अपना प्रेम प्रकट कर दें। अनुमेहा विराग को शाम को घर पर आमंत्रित करती है, पर वह रात दस बजे पहुँचता। इन दोनों के बीच को जो संवाद है, वह बिल्कुल बांधे रखता है।

"यों घूर कर क्या देख रहे है?"

"तुम्हारी आँखों मे इस समय वही मेहा झांक रही है, जो शीशे की कटोरी में उंस दिन दही लिए खड़ी थी। ओह्ह, आज कितने बरस बीत गए- पूरा एक युग?"

"वह तो कब की मर गयी...।"

"हाँ, तभी तो इतना याद आती है। काश वह सचमुच मर गयी होती।"

"क्या लेंगें- ठंडा,गरम?"
.......
"ठंडा , गरम तो रोज पीते। आज कुछ और पीने की इच्छा है। पिला सकोगी?
"कहिये भी..."
"पहले हाँ कहो..."
"हाँ बाबा हाँ"
"तुम्हारे हाथों से जहर पीने की इच्छा है। पिला सकोगी मेहा?"
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धर्मवीर भारती जी ने "नदी प्यासी थी" नामक नाटक में लिखा है कि हिंदी के लेखक न्यूरोटिक होते है। 'तुम्हारे लिए' में उपरोक्त सम्वाद पढ़ते हुए मुझे भारती जी की ये लाइन याद आ ही गयी। मैं हंस पड़ा।
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खाने पीने के बाद विराग महाशय अनुमेहा से पूछते है-

"इतने बड़े घर मे अकेली रहती हो। शादी क्यों नही कर लेती। इस कोरी भावुकता में क्या रखा है?"

"कहीं भी मन टिकता नही अब।"

"क्यों, क्यों।?"

"जो मुझसे शादी करना चाहता था, उससे मैं कर न पाई। जिससे मैं शादी करना चाहती थी, वह...."

"मान लो जिससे तुम शादी करना थी, वह भी तुमसे शादी करना चाहे...."

"नहीं, नहीं। मैं स्वयं अब उससे शादी नही कर सकती। मैं उसके योग्य नही रही..."
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यहाँ पर भी कोई परिणाम सामने नही आता है। मुझे अपने पूर्वाभास पर खुशी ही होती है। विराग चलते-चलते पलट कर पूछता है-

"अब कब आऊँ?"

"नही-नही, अब मत आना। (रोते हुए) कभी नही-कभी भी नही। नही तो मेरे लिए जीना और भी अधिक दूभर हो जाएगा। समझ लेना अनुमेहा अब मर गयी।"
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बाद इसके कई साल बीत जाते है। अनुमेहा कई दुर्गम इलाकों में काम करती है-आदिवासियों, जनजातियों के बीच। विराग पत्रकारिता में आ जाता है। आखिरी बार जब दोनों की मुलाकात दिल्ली में होती है तो अनुमेहा खुद ही फोन कर के अपने मास्टरजी को बुलाती है। वह बताती है कि सुहास काफी पहले मर गया और अपनी सारी संपत्ति दान कर गया है। विराग पर तो जैसे वज्रपात हो गया हो, पर अनुमेहा वैसी ही तटस्थ, वीतरागी बनी बैठी रही। वह बताती है कि कल सुबह वह देश छोड़कर हमेशा के लिए कांगो (अफ्रीका) जा रही-वॉलंटियर डॉक्टर के रूप में। चलते-चलते भीगे कंठ से कहती है-

"सुनो, दुखी न होना। पता नही हमारा किस जन्म का बैर था, जो जो..."

फिर कह नही पाती है। फुट-फुट कर रो पड़ती है। काफी देर बाद आँसू पोछ कर कहती है-

"कल सुबह आओगे न। प्रतीक्षा करूंगी।"
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अगली सुबह विराग महाशय जाते तो है, पर उनके पहुँचने के कुछ देर पहले ही प्लेन टेक-ऑफ कर चुका होता है। वास्तव में उपन्यास इसी जगह से शुरू होता है, फिर पूरी कहानी फ्लैशबैक में चलती है। यह एक खास बात है इस उपन्यास की।
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निष्कर्ष के रूप में मैं उपन्यास का ही एक संवाद लिखना चाहूंगा जिसके द्वारा सुहास अपने गुरु विराग को ज्ञान देता है, जब काफी अर्से के बाद सुहास और विराग मिलते है

"मुझे लगता है जीवन मे न तो अतिसंयम आवश्यक है न अतिअसंयम। बुद्ध का संतुलित सम्यक सिद्धांत ही मुझे हर समस्या का एकमात्र समाधान नजर आता है- न विरक्ति, न आसक्ति। यानि..."

यानि के अब आप खुद ही पढ़िए और समझिये। इतनी लंबी समीक्षा पढ़ने के लिए धन्यवाद।
1 review1 follower
March 23, 2017
I don't know what was in this book that i was almost mesmerized with this book... when i first finished reading this book I could not sleep... I guess I was 16 or 17 then. Read this books several times during my growing years and when I thought of this book after several decades, it brought same kind of feeling. Something very mysterious something enchanting in this book... I am not rating this book as a critic and I am not one but just rating this for the reason that reading this book itself was one of the sweetest memories I have of my growing up year. As if I could feel Anumeha and see those roads in Nainital. Amazing...
1 review
January 18, 2021
The best novel I have heard in my life.

I just finished this book
I felt exactly the same way. I first heard it on audio book when I was in my early 20s I am reading it now after many years and the tears still rolled down my eyes. So much pain in my heart and soul. I can’t read hindhi. So I heard it on audio again. I do not understand hindhi fully as I speak Urdu. But I understood most of it to appreciate the story fully. Can someone please kindly recommend another book like this please.
Profile Image for Ravi Shukla.
34 reviews6 followers
May 21, 2020
अद्धभुत था ये उपन्यास। अपने अतीत में ले जाकर ढकेल दिया इस सम्बंध ने। प्रेम सच में अध्यात्म का चरम है।
गुनाहों का देवता, कनुप्रिया और तुम्हारे लिए। ये तीनों मुझे एक ही भावना और जीवन को कहने के, भिन्न भिन्न साधन मात्र लगते हैं। सबमें प्रेम की परिभाषा एक ही है, शब्द और किरदार जरूर अलग हैं।
Profile Image for Sudeep Kumar Mishra.
19 reviews5 followers
July 2, 2021
This is not a review, Its an appreciation post. This is not just any book. It is a 152 pages long poem, written so beautifully, you can almost see it. A Milestone in Romantic novel category. An absolute pleasure to read.
P.S. : Make sure to get some tissues before yu start reading it. You're gonna need them.
Profile Image for Nitin Dhiman.
5 reviews
October 13, 2022
Its for those who say feelings can not be explained in words.
This book can explain the feelings of most of the readers. Every boy will feel him in Viraj and every girl will experience a bit of her in Anumeha.

Profile Image for Azitabh Ajit.
4 reviews
February 14, 2026
simply amazing.. it's mesmerizing.. it's poetry in prose.. hard to get off once you start
Profile Image for Manish Kumar.
53 reviews31 followers
June 12, 2022
मुझे लगता है कि जब भी कोई लेखक अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों से किसी कथा का ताना बाना बुनता है उसके कथन की ईमानदारी आपके हृदय को झकझोरने में समर्थ रहती है भले ही उसके गढ़े हुए चरित्रों का सामांजस्य आप आज के इस बदले हुए युग से ना बिठा सकें। आज जबकि ये उपन्यास अपने चौदहवें संस्करण को पार कर चुका है, लेखक हिमांशु जोशी से पाठक सबसे अधिक यही प्रश्न करते हैं कि क्या विराग का चरित्र उन्होंने अपने पर ही लिखा है? हिमांशु जी इस प्रश्न का सीधे सीध जवाब ना देकर अपनी पुरानी यादों में खो जाते हैं..

पुस्तक पर विस्तृत टिप्पणी ब्लॉग पर
https://www.ek-shaam-mere-naam.in/201...

Rating 2.5
6 reviews1 follower
January 2, 2018
This book is reffered to me by satya vyas sir.... nd i m gald that he refffer it to me... lovely story....
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