पल्लव में पंत जी की सन 1919 से 1925 तक की, प्रत्येक वर्ष की दो-दो, तीन-तीन कृतियां हैं। इनमें से अधिकांश 'सरस्वती' तथा 'श्री शारदा' में समय समय पर प्रकाशित हुई थी।
कविता का हिंदी क्लिष्ट है। प्रकृति एवं सौंदर्य विषयों पर ही अधिकतर काव्य आधारित है।पुस्तक के आरंभ में एक भूमिका भी है जिसमें काव्य-कला के रूप पर कवि द्वारा दृष्टिपात किया गया है।
'जीर्ण जग के पतझड़ में प्रात सजाती जो मधुऋतु की डाल उसी का स्नेह स्पर्श अज्ञात खिलाए मेरे पल्लव बाल!'