छोटे शहर का मध्यमवर्गीय समाज, थिएटर और फ़िल्म जगत की दुनिया : तीनों के अंदर के जीवन को सजीवता से चित्रित करते इस उपन्यास के मुख्य पात्र का नाम है .....
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"तुमने अपना नाम बदल लिया है ?"
"हाँ।"
"काहे?"
"मुझे अपना पसंद नाम नहीं था। अगर हाई स्कूल में नहीं बदलती, तो आगे चलकर बहुत मुश्किल होती। अख़बार में छपवाना पड़ता।"
"तुम्हारे नाम में क्या खराबी है ?" पिता ने कड़वे स्वर में पूछा।
"अब हर तीसरे-चौथे के नाम में शर्मा लगा होता है। मेरे क्लास में ही सात शर्मा है। ... और यशोदा ? घिसा-पिटा, दकियानूसी नाम। उन्होंने किया क्या था ? सिवा क्रिश्न को पालने के ?"
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हाँ, तो इस उपन्यास की मुख्य पात्र सिलबिल उर्फ़ यशोदा शर्मा ने अपना नाम वर्षा वशिष्ठ रखकर संस्कृत अध्यापक के परिवार में विद्रोह की पहली चिंगारी फूंकी थी और इस चिंगारी को आंधी से बचाए रखी - मिश्रीलाल डिग्री कॉलेज में आई टीचर, शहर की एकमात्र खुद से कार चलनेवाली महिला, दिव्या कत्याल।
जिस परिवार में लड़कियों के लिए सांस लेने के अलावा सब कुछ अकरणीय समझा जाता था उस परिवार की सिलबिल का सोच था
"ये मेरे रक्त-संबंधी हैं, इनका सुख-दुःख मेरा है, पर मेरा सुख-दुःख मेरा ही रहेगा। ये उसे बाँट नहीं सकेंगे। एक हद के बाद उसे समझ भी नहीं पायेंगे।"
और वर्षा वशिष्ट पिटाई कर बाथरूम में बन्द कर दिए जाने के बावजूद दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बैठ कर नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा पहुँच जाती है।
वहाँ सफलता की परचम लहराते हुए फ़िल्म नगरी मुम्बई पहुंचकर वहाँ भी कलात्मक और व्यावसायिक ��फलता के ऊँचे झंडे गाड़ देती है। लेकिन ... व्यक्तिगत ज़िन्दगी में भी उन्हीं ऊंचाइयों को छू पायेगी ?
निजी जीवन में खुद के लिए प्रेम और प्रेम ���ी परिभाषा को भी ढूंढती रहने वाली सिलबिल को उसकी मेंटर टीचर दिव्या कत्याल ने कहा था, "एक ही शहर में तुम्हारे दो प्रेमी होंगे, यह कोई आदर्श स्थिति नहीं है।"
व्यावसायिक और कलात्मक सफलता के शिखर पर बैठी वर्षा अपने निजी जीवन के सबसे अँधेरे क्षण में कहती है,
"मेरे वास्ते चन्द्रमा हमेशा के लिए बुझ गया है ..."
लेकिन विषाद चन्द्रमा को कब तक ढँक सकता है ! विषाद भी दम्भ की तरह टिकाऊ नहीं होता और सिलबिल प्रेम की अपनी परिभाषा अपने प्रिय व्यक्ति के प्रिय नाटक "कालिगुला" से ही पाती है :-
"किसी को प्रेम करने का अभिप्राय यह है कि उस व्यक्ति के बगल में तुम वृद्ध होने के लिए तैयार हो।"
और जैसा कि उड़ान भरने से पूर्व,अपने घर में, सिलबिल ने सोचा था, "ये मेरे रक्त-संबंधी हैं, इनका सुख-दुःख मेरा है, पर मेरा सुख-दुःख मेरा ही रहेगा। ये उसे बाँट नहीं सकेंगे। एक हद के बाद उसे समझ भी नहीं पायेंगे।"
सिलबिल ने रक्त सम्बन्धियों का सुख-दुःख बांटा लेकिन एक हद के बाद उसे कोई समझ भी नहीं पाए।
सिलबिल के अलावा कई और साथी कलाकारों के संघर्ष, टूटन और सफलता की भी कहानी चलती है। कई सारे नाटक और उनके पात्रों के माध्यम, खासकर चेख़व और कामू के नाटक, से भी कहानी के पात्रों का चरित्र निरूपण किया गया है।