शिवानी का शब्द-भण्डार और यथोचित शब्दों से गद्य को सुसज्जित करने का कौशल अद्वितीय है| इस पुस्तक में शिवानी के अनेक संस्मरण, चिन्तन-मनन व एक कहानी संकलित की गयी है| साधारण होते हुए भी कुछ वृत्त-चित्र रोचक व भावपूर्ण ढंग से लिखे होने के कारण सुपाठ्य हैं| परन्तु शिवानी की कहानी और उनकी विचारधारा मुझे यह प्रश्न करने पर विवश कर देती है कि क्या शिवानी ने अपने समय की आधीनता को स्वीकार लिया? न सिर्फ उनकी कहानियों में पुनरावृत्ति झलकती है परन्तु कुछ सड़ी-गली परम्पराओं की प्रतिछाया भी उनके शब्दों में प्रतिबिंबित होती है| शायद इसीलिये, मेरे विचार से, इस पुस्तक को मुख्यतः संस्मरणों के लिए पढ़ा जा सकता है परन्तु किसी भी प्रकार की अपेक्षा करना व्यर्थ है|