यह किताब एक सावरकर से दूसरे सावरकर की तलाश की एक शोध-सिद्ध कोशिश है। सावरकर की प्रचलित छवियों के बरक्स यह किताब उनके क्रांतिकारी से राजनेता और फिर हिन्दुत्व की राजनीति के वैचारिक प्रतिनिधि तथा पुरोधा बनने तक के वास्तविक विकास क्रम को समझने का प्रयास करती है।
इसके लिए लेखक ने सावरकर के अपने विपुल लेखन के अलावा उनके सम्बन्ध में मिलने वाली तमाम पुस्तकों, तत्कालीन ऐतिहासिक स्रोतों, समकालीनों द्वारा ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ों आदि का गहरा अध्ययन किया है।
यह सावरकर की जीवनी नहीं है, बल्कि उनके ऐतिहासिक व्यक्तित्व को केन्द्र में रखकर स्वतंत्रता आन्दोलन के एक बड़े फ़लक को समझने-पढ़ने का ईमानदार प्रयास है। कहने की ज़रूरत नहीं कि राष्ट्र की अवधारणा की आड़ लेक
Ashok is a well known hindi poet and writer. With "Kashmirnama : Itihas aur Samkal" and "Kashmir aur Kashmiri Pandits" he has emerged as an expert of Kashmir's history and present.
Excellent read. The author has made some bold inferences with have been subatantiated with ample facts. In the current environment of pseudo-nationalism where the history is twisted for political gains this book is a very good mirror for these people. Sawarkar have remained a very controversial figure in Indian freedom struggle and for people of the far right group with the lack of any genuine Freedom struggle heroes there has been a deliberate attempt to either hijack those of the INC or to create some like Sawarkar. Unfortunately they have succeeded and people like Sawarkar have found a place in the National parliament just opposite to Gandhiji. In order to pay respect to Sawarkar you have to turn your back towards Gandhiji which is the current irony. Where the Western world is finding more relevance in Gandhian and Lutherian ideals India is regressing back to a silo. And Indians are a party to all this by not only allowing but overtly supporting the factionalism and promotion of communalism. A good read for those who like me still believe in secularism and who feel proud of the diversity of India.
सावरकरांच्या रहस्यमयी आणि अतर्क्य आयुष्याच्या तीन भागांचा (१९१० चे अगोदर, १९१० ते १९२४ आणि १९२४ चे नंतर) तार्किक शोध घेण्याचं प्रचंड धाडस हे पुस्तक करतं. सावरकरांची प्रसिद्ध चरित्रे (कीर, संपत) वाचल्यानंतर य दि फडके यांचं ' शोध सावरकरांचा ' हे पुस्तक आणि अशोक पाण्डेय यांचं सावरकर हे पुस्तक प्रत्येक इतिहास प्रेमी व्यक्तीने वाचलेच पाहिजे ..
Writing in Hindi, the author narrates a vivid account of how Savarkar used lies and his own insecurities to create the Communal Hindu vision of India. The book also provides a deep analysis of the literature that majority of authors, who portray him as a hero, have failed to analyse.
The book is a must read for anyone wanting to know Savarkar and understand the ideology that is Hindutva.
इस पुस्तक के नाम से स्पष्ट है कि सावरकर के जीवन के जिस खंड की चर्चा हुई है पुस्तक में वह इन्हें और इनके अंधसमर्थकों को असहज करती है। सिर्फ़ भावनाओं में बहकर यदि पुस्तक लिखी जाय तो वो यह तो नहीं हो सकती, क्यूँकि भावनायें कहती हैं - सावरकर के स्वातन्त्र्य संग्राम में किये योगदान को भूला नहीं जा सकता! तथ्य क्या कहते हैं? तथ्य कहते हैं - सावरकर का जीवन एक सीधी लकीर नहीं है, थे वो कभी देशभक्तों और क्रांतिकारियों के नायक किंतु उन्होंने किसी भय और प्रलोभन में अपना नैतिक पतन खुद ही कर लिया। किसी भी व्यक्ति के जीवन का मूल्यांकन समग्र में करना ही उचित है किंतु यह तो देखिये कि उसका sum - total क्या है!? अगर यह ऋणात्मक है तो कोई कैसे उसे योगदान कहे? यह तो फिर स्वाधीनता संग्राम की ट्रेन को आगे से धक्का देने वाला कृत्य है!
‘सावरकर’ आज इतिहास का नहीं बल्कि वर्तमान का प्रश्न है। जिस तरह सावरकर को नए सिरे से इतिहास की काल कोठरी से निकाल कर ऐतिहासिक नायकों के साथ बिठाने की मुहिम चल रही है वह कितनी षड्यंत्रकारी है, यह किताब आपको समझाती है। कहावत है - “हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या”, दस्तावेज़ों और ख़ुद सावरकर के लिखे पत्रों, लेखों और पुस्तकों के संदर्भ में ही सावरकर को समझना मुफ़ीद है। यह किताब उसका ही प्रयास करती है।
आरम्भ में थोड़ी परेशानी हुई पढ़ते हुए (क्यूँकि पुस्तक के आरम्भ से ही यह दीखने लगता है कि लेखक क्या स्थापित करना चाहते हैं!) लेकिन ज्यों ज्यों आप इसके साथ बढ़ते जाते हैं, एक स्पष्ट तस्वीर बनती जाती है और यह समझ बनती है कि लेखक के विचारों का पर्याप्त आधार है। अंत तक आते आते मैं तो अशोक कुमार पांडेय जी की साफ़गोई का प्रशंसक बन गया। सारे तर्कों के साथ जब पांडेय जी यह लिखते हैं, “आज सावरकर, उनके दौर और उनके विचारों को पढ़ना, समझना और उसकी एक तार्किक समझ बनाना केवल बौद्धिक नहीं बल्कि एक नैतिक और राजनैतिक कार्यवाही भी है।”
आपके पास सहमत होने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता।