ये कहानी है उस दौर के एक प्रेमी जोड़े की जब फ़ोन , इंटरनेट जैसी कोई सुविधा नहीं थी । ये वो दौर था जहाँ कागज़ ही अपने दिल का हाल बयान करने का एकमात्र साधन था । बेहरोज़ हॉस्टल से पढाई पूरी कर के अपने घर लौटता है । अचानक उसकी मुलाकात अपने ही इलाके की नाज़ से हो जाती है । पहली नज़र में ही नाज़ की आँखे बेहरोज़ को उस से मोहब्बत करने पर मजबूर कर देती है । मगर दोनों के लिए ये मोहब्बत निभाना इतना आसान नहीं होता क्योकि दोनों के आसपास का समाज अपनी सोच से इतना सिमित है की मोहब्बत जैसी चीज़ उन सबके समझ नहीं आती । कहानी में अलग-अलग रिश्ते अपना असली रंग वक़्त-वक़्त पर दिखाते है । आइये देखते है क्या बेहरोज़ और नाज़ हमेशा के लिए एक हो पाएंगे ? क्या वो समाज की झूठी ऊँच-नीच को दरकिनार करके अपनी मोहब्बत को कोई अंजाम दे सकेंगे ?