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कर्मभूमि: Karmabhoomi (Hindi Classics Book 4)

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प्रेमचन्द का कर्मभूमि उपन्यास एक राजनीतिक उपन्यास है जिसमें विभिन्न राजनीतिक समस्याओं को कुछ परिवारों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। ये परिवार यद्यपि अपनी पारिवारिक समस्याओं से जूझ रहे हैं तथापि तत्कालीन राजनीतिक आन्दोलन में भाग ले रहे हैं। उपन्यास का कथानक काशी और उसके आस-पास के गाँवों से संबंधित है। आन्दोलन दोनों ही जगह होता है और दोनों का उद्देश्य क्रान्ति है। किन्तु यह क्रान्ति गाँधी जी के सत्याग्रह से प्रभावित है। गाँधीजी का कहना था कि जेलों को इतना भर देना चाहिए कि उनमें जगह न रहे और इस प्रकार शक्ति और अहिंसा से अंग्रेज सरकार पराजित हो जाए। इस उपन्यास की मूल समस्या यही है। उपन्यास के सभी पात्र जेलों में ठूस दिए जाते हैं। इस तरह प्रेमचन्द क्रान्ति के व्यापक पक&#

435 pages, Kindle Edition

Published September 26, 2018

14 people want to read

About the author

मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव वाले प्रेमचंद को नवाब राय और मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाना जाता है। उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया था। प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। आगामी एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नींव रखी। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी के विकास का अध्ययन अधूरा होगा। वे एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता तथा सुधी (विद्वान) संपादक थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में, जब हिन्दी में तकनीकी सुविधाओं का अभाव था, उनका योगदान अतुलनीय है। प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्‍य को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्‍यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया, उनमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं।

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Profile Image for Shashwat Ratna Mishra.
82 reviews2 followers
August 10, 2025
कर्मभूमि मुंशी प्रेमचंद का एक और शानदार उपन्यास है जो अपने समय से बहुत आगे की सोच लेकर चलता है। इसकी कहानी न सिर्फ़ दिलचस्प है, बल्कि हर किरदार अपनी सोच, व्यवहार और संघर्ष में एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है, फिर भी सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जैसा कि प्रेमचंद जी की लेखन शैली होती है, इस किताब की लगभग हर पंक्ति कुछ न कुछ सिखा जाती है। चाहे वह समाज की सच्चाई हो, धर्म का सवाल, जाति की समस्या या फिर इंसान की ज़िम्मेदारी, हर चीज़ को इतनी सहजता और गहराई से लिखा गया है कि पाठक खुद को कहानी का हिस्सा महसूस करने लगता है।

सबसे हैरानी की बात ये है कि उस समय जब न टेक्नोलॉजी थी, न रिसर्च टूल्स, न कोई बड़ी सुविधाएँ - उस दौर में प्रेमचंद जी ने इतनी गहरी सोच और इतनी सटीक सामाजिक समझ के साथ ऐसा लेखन किया, जो आज भी पूरी तरह प्रासंगिक लगता है।
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