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भोजपुरी लोक संस्कृति
लोक, समूह की अवधारणा पर आधारित है। यहां समूह के साथ केवल जन समूह ही नहीं है अपतिु जन, जीव-तन्तु, पशु-पक्षी, बनस्पतियां, मौसम, पेड़-पौधे सुबह-शाम सब कुछ शामिल रहे है। समूह की अवधारणा पर आधारित लोकगीत, जनता की रुचि, कल्पना और संघर्ष की अभिव्यक्ति के सबसे पुराने माध्यम रहे हैं। लोकगीत श्रम करने वाले गरीबों के ज्यादा करीब रहे हैं। ये जमीन और श्रम से जुड़े रहे हैं। श्रम से जुड़े होने के कारण लोकगीतों का दायरा बरसात की फुहार से लेकर बंसत की मधुरता और चैत की निश्चिंतता से जुड़ती है। ये सुबह और शाम से भी जुड़ते हैं और भोर के उल्लास और रात की आराम तलबी से भी। लोक की संवेदना हर्ष, वियोग और श्रृंगार से अभिव्यक्ति पाती रही है। यहां मांसलता का कोई स्थान नहीं रहा है। चंचलता, चुहलता, और थीरकन का संबंध श्रम, दुख, भूख
115 pages, Kindle Edition
Published October 24, 2020
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