भारतीय लेखकों में नरेन्द्र कोहली कालजयी कथाकार व व्यंग्यकार के रूप में जाने जाते हैं जिन्होंने मिथकीय पात्रों को एक नवीन ध्वनि व चिन्तन प्रदान किया है। उनका लेखकीय जीवन अथक परिश्रम से परिपूर्ण और शाश्वत मानवीय संवेदना से सम्पन्न है। अभ्युदय, अगस्त्य कथा, महासमर, हिडिम्बा, कुन्ती, शिखण्डी आदि कालजयी रचनाओं के माध्यम से वे हिन्दी भाषा के सरल, बौद्धिक व जनप्रिय लेखकों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। हिन्दी साहित्य में नरेन्द्र कोहली आधुनिक तुलसीदास व व्यास परम्परा की श्रेणी में अग्रणी माने जाते हैं। इसी क्रम में सुभद्रा उनका नवीनतम उपन्यास है। सुभद्रा महाभारतकालीन एक ऐसा पात्र है जो जितना मिथकीय है उतना ही समकालीन भी। स्वावलम्बी, प्रखर, तेजमयी और स्वतन्त्र विचारों की धनी सुभद्रा की गाथा उसके निरन्तर आत्मिक विकास की शुभेच्छाओं को कई चरणों में व्यक्त करती है। रथ का सारथ्य करती कोमल तरुणी सुभद्रा का परिचय इतिहास में अपने सुकोमल पुत्र अभिमन्यु को रणभूमि में जाने की आज्ञा देने वाली वीर क्षत्राणी के रूप में दिया जाता है। पाण्डुपुत्र अर्जुन द्वारा किये गये अपने हरण को वह बिना किसी असावधानी के स्वीकार करते हुए समय की अनेक अनिश्चित धाराओं में बहती जाती है। सुभद्रा एक अक्षुण्ण स्त्री की ऐसी कथा है जो मानवीय भावनाओं और मान्यताओं को स्वीकार करने के लिए कृष्ण की सहायता से चैतन्य भाव में स्वयं के भीतर की यात्रा करती है और असत्य व आभासी सत्यों की उन चेष्टाओं को समझने का प्रयास करती है जो न कभी विलुप्त होती हैं न पूर्णतः सापेक्ष।
Padmashree Narendra Kohli is one of the most eminent and well-known Hindi writers of our times. His novel based on the Ram-Katha, Abhyuday, shifted the course of Hindi novel-writing. Another of his novels, Mahasamar, based on the Pandava-katha went on to become just as popular. His novel-series, Todo Kara Todo is considered the greatest and foremost novel in any language on the life of Swami Vivekananda. Abhigyan, Vasudev, Sharnam, Aatmaswikriti, Varunaputri, Sagar-Manthan, Ahalya etc. are his other well-known works. Apart from the Padmashree, he has also been awarded the Hindi Akademi award; Delhi Salaka Samman; Uttar Pradesh Hindi Sansthaan award; Pandit Deen Dayal Upadhyay Samman, Lucknow; K.K. Birla Foundation award; Vyasa Samman, New Delhi; Madhya Pradesh government and Bhopal’s Maithili Sharan Gupt Rashtriya Samman, among numerous other honours.
डॉ॰ नरेन्द्र कोहली (जन्म ६ जनवरी १९४०, निधन १७ अप्रैल २०२१, चैत्र शुक्ल पंचमी, नवरात्रि) प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार हैं। उन्होंने साहित्य के सभी प्रमुख विधाओं (यथा उपन्यास, व्यंग्य, नाटक, कहानी) एवं गौण विधाओं (यथा संस्मरण, निबंध, पत्र आदि) और आलोचनात्मक साहित्य में अपनी लेखनी चलाई है। उन्होंने शताधिक श्रेष्ठ ग्रंथों का सृजन किया है। हिन्दी साहित्य में 'महाकाव्यात्मक उपन्यास' की विधा को प्रारंभ करने का श्रेय नरेंद्र कोहली को ही जाता है। पौराणिक एवं ऐतिहासिक चरित्रों की गुत्थियों को सुलझाते हुए उनके माध्यम से आधुनिक सामाज की समस्याओं एवं उनके समाधान को समाज के समक्ष प्रस्तुत करना कोहली की अन्यतम विशेषता है। कोहलीजी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय जीवन-शैली एवं दर्शन का सम्यक् परिचय करवाया है। जनवरी, २०१७ में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
साल 2021 हिंदी साहित्य पर वैसा उतरा जैसे किसी घर के आँगन से वह पुराना पीपल अचानक गायब हो जाए जिसकी छाँह में बैठकर कई पीढ़ियाँ अपनी थकान उतारती रही हों। हवा चलती है तो लगता है वह वहीं है, पर आँखें ढूँढती रहती हैं नज़र नहीं आता। इसी सन्नाटे वाले साल में डॉ. नरेंद्र कोहली चले गए। और लगता है जैसे साहित्य की दुनिया से एक गहरा सहारा उठ गया हो। मगर जाते-जाते उन्होंने अपने पाठकों की हथेली पर एक शांत-सा दीपक छोड़ दिया ‘सुभद्रा’। यह उपन्यास पढ़ते समय बार-बार ऐसा लगता है जैसे लेखक फुसफुसाकर कह रहे हों “मैं दूर जा रहा हूँ, पर मेरी दृष्टि तुम्हारे पास रह जाएगी।”
‘सुभद्रा’ महाभारत के उस छोटे-से प्रसंग से उठती है जिसे हम बरसों से प्रेम और रोमांच से भरी कहानी की तरह सुनते आए हैं , सुभद्रा का हरण और अर्जुन से विवाह। लेकिन कोहली इसे किसी किस्सागो की तरह नहीं सुनाते; वे इसे समय, समाज और मन की गहराइयों में रखकर देखते हैं। उनके लिए यह घटना दो लोगों का प्रेम मात्र नहीं, बल्कि मनुष्य की उस यात्रा का आरंभ है जिसमें वह बाहरी परिस्थितियों के बीच अपने भीतर उतरना सीखता है।
इस उपन्यास को पढ़ते हुए पाठक एक बात तुरंत महसूस करता है उपन्यास का नाम भले ‘सुभद्रा’ है, पर सुभद्रा कई पृष्ठों पर दिखाई नहीं देतीं। कई बार लगता है वह सामने से ज़्यादा पृष्ठभूमि में है जैसे कोई शांत उपस्थिति, जिसका प्रभाव तो हर जगह है, पर आवाज़ कम है। कुछ पाठकों को यह कमी की तरह भी लग सकता है। और यह बात सच भी है कि कभी-कभी उपन्यास की नायिका जितनी दृश्य में होनी चाहिए, उतनी नहीं है। पर कोहली शायद उसे चरित्र से ज़्यादा एक “चेतना” की तरह देखते हैं इसलिए वह कम दिखती है, पर कहानी की हर परत में महसूस होती है।
उपन्यास की शुरुआत में सुभद्रा बहुत कोमल, सहज और भावुक लड़की लगती है ठीक वैसे जैसे घरों की छोटी बहनें होती हैं। पर जीवन की लहरें अर्जुन की दूरियाँ, अकेलेपन की टीस और युद्ध की धुँधली छाया धीरे-धीरे उसकी भीतर की मिट्टी को पकाती हैं। वह टूटी हुई नहीं, तपकर बनी हुई स्त्री बनती है। वह समझती है, स्वीकार करती है, और स्वीकार में ही एक अनोखी शक्ति ढूँढ लेती है। उसका यह रूपांतरण अचानक नहीं होता बल्कि धीरे-धीरे, बहुत सहज, बहुत मानवीय ढंग से होता है।
नरेंद्र कोहली की स्त्रियाँ हमेशा ऐसी ही रही हैं। वे किसी दया की प्रतीक्षा में खड़ी आकृतियाँ नहीं होतीं। वे प्रश्न करती हैं, समझती हैं, धैर्य रखती हैं, और ज़रूरत पड़े तो प्रतिरोध भी। वे भावुक हैं लेकिन कमजोर नहीं। कोमल हैं लेकिन विवेक से भरी। सुभद्रा भी उसी परंपरा की स्त्री है वह चुप रहती है, लेकिन वह चुप्पी जागी हुई चुप्पी है। वह परिस्थितियों से भागती नहीं; उन्हें समझकर अपना रास्ता बनाती है।
उपन्यास में कृष्ण एक पात्र की तरह नहीं आते; वे हवा की तरह आते हैं। दिखते नहीं, पर महसूस होते हैं। वे चमत्कार नहीं करते, बल्कि सोचने की दिशा बदल देते हैं। सुभद्रा के मन के हर उतार-चढ़ाव के किनारे उनकी शांत चेतना मौजूद है। वे बताते हैं कि भावनाएँ जीवन की जड़ें हैं, लेकिन उसके तने को खड़ा करने के लिए सत्य, धर्म और विवेक ज़रूरी है। उनके और सुभद्रा के संवाद उपन्यास के सबसे गहरे हिस्सों में से हैं। कई जगह कहानी रुक जाती है और विचार आगे निकल आते हैं।
इसी कारण यह भी स्वाभाविक है कि कुछ पाठकों को यह उपन्यास धीमा लगे। जो तेज़ घटनाएँ चाहते हैं, उन्हें यह भारी भी लग सकता है। जो चाहते हैं कि नायिका हर दृश्य में मौजूद रहे, उन्हें उसकी अनुपस्थिति खल भी सकती है। और जो पारंपरिक कथा-रचना से उपन्यास को परखते हैं, उन्हें इसमें दार्शनिकता ज़्यादा और घटनाएँ कम मिलेंगी। पर जो पाठक अर्थ की तलाश में पढ़ते हैं, जो शब्दों की चुप्पी भी सुन लेते हैं, उनके लिए यह उपन्यास एक धीमी नदी की तरह है बहुत शांत, बहुत भीतर उतरने वाला।
यह स्वीकार करना भी मेरे लिए आवश्यक है कि हो सकता है मैं इस समीक्षा को लिखते समय पूर्वग्रह से प्रभावित रहा होऊँ। नरेंद्र कोहली मेरे प्रिय लेखकों में रहे हैं। उनका लेखन, उनकी दृष्टि, उनके पात्र सब मेरे भीतर कहीं गहरे बसे हैं। इसलिए यह संभव है कि मैंने इस उपन्यास की कुछ कमियों को भी सहजता से माफ कर दिया हो। मेरा यह झुकाव इस समीक्षा में शामिल है और पाठक को इसे समझकर ही आगे बढ़ना चाहिए।
किताब बंद करते समय मन में एक शांत-सी बात ठहर जाती है कि जीवन कितना भी उलझा क्यों न हो, विवेक का हाथ नहीं छोड़ना चाहिए। आभासी चमक चाहे जितनी आकर्षक हो, सच्चाई हमेशा मौन में ही छिपी मिलती है। ‘सुभद्रा’ हमें उसी मौन की ओर ले जाती है। यह उपन्यास विदाई नहीं, एक दिशा है; एक शांत दीपक, जो लेखक के चले जाने के बाद भी धीमी लौ में जलता रहता है।