आंखे तो ऐसी थी कि जिसे देखते ही कोई भी दीवाना हो जाय। भोर की तारे की तरह मोहिनी। भूरे रंग की पुतली को ढकती बार-बार बेहद ही खूबसूरत पलकें लेकिन इनमें मोहब्बत नहीं आक्रोश था। और ये निशब्द भाव में व्यक्त कर रहे थे कि मौत के समय तड़पते इंसानों की छवि इन्हे बेहद पसंद है। और वह नौजवान उसकी इन्हीं आंखों में अपने लिए मोहब्बत ढूंढ रहा था। सुराहीदार गर्दन के ऊपर उसके कानों से लटकते झुमके आशिकों के दिल के कांटे की तरह था और त्वचा का गेहूंआ रंग पत्थर को भी आशिक़ बनाने वाला। उसकी हंसी और ये कातिल हुस्न हजारों प्रेमियों के नींद और चैन का कातिल थे लेकिन अभी वह अपने प्रेमी का ही कत्ल करने जा रही थी। इसलिए नहीं कि उसका आशिक़ गुनेहगार था बल्कि इसलिए क्योंकि शायद यही उसका व्यापार था।