Jump to ratings and reviews
Rate this book

Sunil #60

काली हवेली

Rate this book
ठाकुर जोरावर सिंह कला के पारखी थे और उनकी चार सौ साल पुरानी हवेली में स्थापित उनका कलाकृतियों का संग्रह काफी विस्तृत और मशहूर था । संग्रह को देखने आया हवेली का एक मेहमान जब अचानक बड़े ही रहस्यपूर्ण हालात में गायब हो गया तो सबका मानना था कि वो हवेली के भुतहा माहौल और प्रेतलीला से डरकर भाग गया था । लेकिन ब्लास्ट का स्पेशल कोरस्पोंडेंट सुनील कुमार चक्रवर्ती सबसे सहमत नहीं था ।

170 pages, Kindle Edition

First published May 1, 1976

22 people are currently reading
140 people want to read

About the author

Surender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.

Ratings & Reviews

What do you think?
Rate this book

Friends & Following

Create a free account to discover what your friends think of this book!

Community Reviews

5 stars
30 (48%)
4 stars
14 (22%)
3 stars
10 (16%)
2 stars
4 (6%)
1 star
4 (6%)
Displaying 1 - 3 of 3 reviews
Profile Image for Rajeev Roshan.
71 reviews14 followers
March 21, 2013

"काली हवेली"

काली हवेली पाठक साहब का द्वारा लिखित सुनील सीरीज के उत्कृष्ट उपन्यासों में से एक है। अमूमन तो पाठक साहब द्वारा लिखित सुनील सीरीज के सभी उपन्यास अतिउत्तम है। पाठक साहब ने इस उपन्यास में एक ऐसे अन्धविश्वास की घटना का सृजन किया है जो मुख्यतः हम सभी में कभी न कभी होता ही है। "भूत", अगर आप इस अन्धविश्वास को अभी उतना महत्व नहीं देते तो इसका मतलब यह मत समझिएगा की आपने इससे पहले कभी दिया नहीं होगा। जरूर दिया होगा। बचपन में सबके माता-पिता इस हथियार का इस्तेमाल डराने के लिए करते हैं। मैं भी भूत को नहीं मानता लेकिन इस उपन्यास को जब पढ़ा तो बीच में ऐसा लगा की कहीं सच में पाठक साहब ने कुछ अलौकिक सृजन तो नहीं कर दिया। उपन्यास का प्रारंभ तो इतना शानदार है की क्या कहूँ। मुसलाधार बारिश और सुनील बीच रास्ते में फंसा हुआ हो। ऐसा बहुत कम होता है। जैपाल द्वारा सुनील को डराना और फिर रात को लंगूर का आतंक और छत से पत्थर का गिरना। ये कथन ऐसे थे की आपकी साँसे रुक सी जाए।

उपन्यास का प्लाट बहुत ही सीमित है, तो वही अंत जानदार-शानदार और अविश्वसनीय है। जैपाल और भूपत का किरदार शशक्त है। इस उपन्यास में सुनील को पूर्ण रूप से रमाकांत पर निर्भर रहना पड़ा। पाठक साहब ने सुनील को आरम्भ में दिखा कर बीच में गायब कर दिया और आगे कर दिया दिनकर और जौहरी को। इस उपन्यास में इन दो किरदारों का बहुत ही अधिक महत्व है। इन दो किरदारों का सही इस्तेमाल किया है पाठक साहब ने। पूरी कहानी एक ऐसे व्यक्ति को खोजने में दिखा दी जाती है, जिसके लिए यह संशय होता है की वह खुद गायब हो गया है या किसी ने गायब कर दिया है। बिना किसी तथ्य के सहारे सुनील सिर्फ अपनी दिल की मान कर इस दिशा में कार्य शुरू करता है। वैसे तो सुनील के लिए यह फेमस है की वह "तुक्केबाजी" से आगे की केस की तहकीकात करता है। यहाँ तक की जौहरी और दिनकर से भी उसे कोई कारामद जानकारी प्राप्त नहीं होती। प्लाट छोटा होने के कारण सुनील की कमी महसूस भी नहीं होती ।

लेकिन वो पाठक जिन्होंने इस उपन्यास को नहीं पढ़ा है उनके लिए कुछ ऐसे बिंदु है जिनके जिक्र से उनके अन्दर बैठा पढ़ाकू इंसान इसे जरूर पढना चाहेगा....

१) विक्रम सिंह अचानक कहाँ गायब हो गया था?
२) सुनील को समुद्र में से किसने बचाया था?
३) सुनील को इतना बड़ा लंगूर कैसे दिखाई दिया था हवेली में, क्या वह बन्दर सच था या भूत?
४) सुनील के ऊपर जानलेवा हमला क्यूँकर हुआ और कैसे?
५) रात में मीनार में जो चीज चमचमाती है वह सच्चाई है या अलौकिक चीज?
६) क्या जौहरी और दिनकर की सहायता से सुनील विक्रम सिंह को खोज पायेगा?
७) क्या सुनील भूत के रहस्य का खुलाशा कर पायेगा।

पाठक साहब ने "भूत" जैसे अन्धविश्वास का प्रयोग करके इस शानदार नोवेल को लिखा है और हम पाठकों पर कृपादृष्टि दिखाई है। समाज में इस अंधविश्वास को तोड़ने के लिए कार्य होते रहने चाहिए। पाठक साहब समाज के कुछ रुढ़िवादी नीतियों और अंधविश्वासों को तोड़ने में सजग रहते हैं। उन्होंने अपने उपन्यासों में समाज के नैतिक और अनैतिक पहलुओं को कई बार दिखाया है।

हम आशा करते हैं की पाठक साहब ऐसे ही लिखते रहें और हम उन्हें पढ़ते रहें......


विनीत
राजीव रोशन

Note: - पूरा रिव्यु देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक का प्रयोग करें
http://smpnovlesreview.blogspot.in/20...
Profile Image for Rajan.
637 reviews43 followers
March 27, 2021
5/5

It is a horror cum thriller murder mystery. Is there a dead body or not? Does Sunil believe in ghosts?

Sunil goes to an old haveli in the middle of sea to find out about disappearance of Vikram singh a painter. Nothing goes right from beginning.

It is an engrossing read and different from usual Sunilian novels.



“और आपने उस रोशनी को प्रेत- लीला समझा ?” “पहली बार नहीं । पहली बार मैं यही समझा कि ऊपर गुम्बद में कोई है । मैं डरपोक आदमी नहीं हूं, मिस्टर सुनील लेकिन सुपरह्यूमन मामलों में मेरा भी हौंसला जवाब देने लगता है पहले मैं गुम्बद की रोशनी का कारण कोई इन्सान ही समझा था इसलिए मैं बिना डरे चैक करने के लिए सीधा छत पर पहुंच गया था । मैं मीनार के द्वार के पास पहुंचा । द्वार बन्द था और उस पर मन भर का मोर्चा लगा हुआ ताला झूल रहा था । मैंने ताले को खूब ठोक- बजाकर देखा । ताला बन्द था । ऊपर गुम्बद में रोशनी रह- रहकर अब भी जल उठती थी । मैं वापिस नीचे गया और उस ताले की चाबी लेकर आया जो आर्ट गैलरी की एक अलमारी में रखी रहती थी और न जाने कितने सालों से इस्तेमाल नहीं हुई थी । मैंने मीनार का ताला खोला और फिर मीनार की गोल सीढियां तय करके ऊपर पहुंचा । ऊपर बारादरी खाली पड़ी थी । वहां किसी इन्सान का तो क्या चिड़िया का भी नाम निशान नहीं था । गुम्बद तक पहुंचने का मीनार के बेस में बना दरवाजा ही अकेला रास्ता है, जिसका ताला खोल कर मैं भीतर घुसा था । उसके अतिरिक्त मीनार तक पहुंचने का और कोई रास्ता मुमकिन नहीं है । अब आप ही बताइए, वह रोशनी किस चीज की थी ? और कैसे दिखाई देती थी ?”

“फिर आपने क्या किया ?” “फिर मेरा हौसला जवाब देने लगा । मुझे विश्वास हो गया कि वह रोशनी भी हवेली में घूमने वाली आत्माओं की करामात थी जिन पर पहले मैं विश्वास नहीं करता था । मैं उल्टे पांव वहां से भागा । नीचे आकर मैंने फिर से ताला लगाया और चाबी अपने स्थान पर पहुंचा दी । उसके बाद मैंने दुबारा कभी गुम्बद में जाने का हौसला नहीं किया ।”


“आपने वह रोशनी फिर दुबारा कभी देखी ?” “कई बार । अन्धेरी रातों में तो वह रोशनी अक्सर दिखाई दे जाती है ।” “अन्धेरी रात तो आज भी है ।” “मुमकिन है, वह रोशनी आज भी दिखाई दे ।” - जैपाल बोला और साथ ही उसके शरीर में एक झुरझुरी- सी दौड़ गई । “और कोई कहानी ?” “आप इसे कहानी कहते हैं !” - जैपाल चिढकर बोला - “आप यहां पर कुछ दिन रहकर देखिए और फिर बताएयेगा कि मेरी बताई बातें आपको कहानियां लगती हैं या हकीकत ।”

“मैं भूतों पर विश्वास नहीं करता ।” - सुनील दृढ स्वर से बोला ।

“कुछ दिन हवेली में रह जाइये, आप भूतों पर विश्वास करने लगेंगे ।” “मुमकिन है । बहरहाल आप अपनी बात कहिए ।”
Displaying 1 - 3 of 3 reviews

Can't find what you're looking for?

Get help and learn more about the design.