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Dhoop Mein Nange Paon धूप में नंगे पाँव

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सुपरिचित कहानीकार स्वयं प्रकाश का यह कथेतर, धूप में नंगे पाँव पारम्परिक विधाओं के साँचों को तोड़ता है। कहीं तो यह यात्रा-वृत है, तो कहीं डायरी, कहीं संस्मरण और फिर पढ़ते हुए इसमें कहीं आत्मकथा की झलक भी मिलती है जिसमें पाठकों को विविधता का एक जीवंत संसार मिलता है। धूप में नंगे पाँव को कहानीकार की कार्यशाला की एक झाँकी भी कहा जा सकता है जहाँ स्वयं प्रकाश का वह संसार है जो अब तक उनके लेखन में नहीं आया। किताब शुरू होती है जब वह नौकरी करने घर से निकले और खत्म वहाँ होती है जब वे सेवानिवृत्त होकर घर लौटते हैं। इस अवधि की गहमागहमी और कशमकश का पूरा लेखा-जोखा है इसमें कि कैसे जीवन की जद्दोजहद ने स्वयं प्रकाश का लेखक रूप गढ़ने में अहम भूमिका निभाई। स्वयं प्रकाश की पहचान मूलतः कहानीकार की है लेकिन उपन्यास, निबन्ध और नाटक की अन्य विधाओं में भी उन्होंने लिखा है। हिन्दी साहित्य में योगदान के लिए उन्हें अनेक सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है जिसमें उल्लेखनीय हैं-राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार, वनमाली स्मृति पुरस्कार और सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार।

224 pages, Kindle Edition

Published May 1, 2019

5 people want to read

About the author

Swayam Prakash

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Profile Image for Punit.
72 reviews2 followers
November 26, 2023
लेखन अच्छा है। हालाँकि लेखक की कोई भी रचना पहले नहीं पढ़ी लेकिन आत्मकथा ऐसे लिखी है कि जुड़े रहे। लेखन के इतर लेखक की विचारधारा कंही सही लगी परन्तु कुछ जगहों पर बड़ी अटपटी सी लगी। उदाहरणतः लेखक कहते हैं की "ब्राह्मणों और जैनों को खूब दिखा-दिखा कर नॉन वेज खाया".. वे इस बात को ऐसे लिखते हैं, जैसे पाठक उनके इस क्रांति के लिए वाह-वाही देते न थके। नॉन-वेज खाना न खाना अपनी जगह अलग विषय है... लेकिन दिखा-दिखा कर खाया का क्या तात्पर्य है। आगे लेखक मंदिर में सर झुकाने को नैतिक दवाब मानते हैं, किसी हिन्दू रीति रिवाजों को गलत मानते हैं। सिर्फ, लेखन की बात की जाए तो ठीक है लेकिन बीच-बीच में ऐसी अटपटी बातें आती रहती हैं।
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