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योगासार उपनिषद्

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"गुरू के पास बैठना यही उपनिषद् हैं। इस सामीप्य में ही आपको बहुत कुछ भासित हो। जाता है। अकथनीय ग्रहीत हो जाता है, अवर्गीन हृदयंगम हो जाता है। इस स्थिति में वाक् तो वाहन मात्र हैं। शब्दों के मध्य के मन में ही बहुत कुछ घटित हो जाता है ऊज उतरती कुकृपा बरसती हैं.....आनन्द व्याप्तता और इस' से जीवन का रूपान्तरण हो जाता है।। गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर अतः, सगीप बैठे और गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर जी की इस प्रांजल भाष्य श्रृंखला में सिक्त हो लें, क्योंकि इस गहन योगसार उपनिषद के प्रदीपन से यर्थाथ 'योग' का सार तत्व उदघाटित हुआ है।। उपनिषद के यह अद्वितीय भाष्य गुरुदेव श्री श्री के वेगिस (स्विटजरलैंड) में सच्चे साधकों को विभिन्न शीर्षकों के अन्तर्गत दिये गए ओजपूर्ण प्रवचनों के अंश हैं।। समर्पण और बंधन

Kindle Edition

Published December 16, 2019

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