प्रख्यात कवि-कथाकार और सुधी सम्पादक डॉ. धर्मवीर भारती की यह संस्मरण कृति साहित्य और साहित्येतर दुनिया के अनेकानेक व्यक्तित्वों को जीवंत करने वाली है। एक ओर यदि इसमें उनके अपने अनेक समकालीन रचनाकार मौजूद हैं, जिन्होंने विभिन्न साहित्येतर क्षेत्रों में कार्य करते हुए भारतीय-जीवन मूल्यों में बहुत कुछ नया जोड़ा है। इनमें जयप्रकाश, राममनोहर लोहिया, इंदिरा गाँधी और मौलाना भासानी जैसे राजनीतिज्ञ हैं, हेनरी मूर और सत्यदेव दुबे जैसे मूर्तिशिल्पी और अभिनेता हैं, प्रतिभा नागर जैसी गृहिणी हैं, और हैं चेरी की डालवाले एक आदमी के साथ-साथ बांग्लादेशी क्रान्ति के कुछ ऐसे चेहरे, जो मान्य होकर भी असमान्य हैं।
इसके अतिरिक्त भारत जी ने यहाँ जिन साहित्यकारों के अंतर बाह्य का उदघाटन किया है, वे हैं-वृंदावनलाल वर्मा, माखनलाल चतुर्वेदी, फादर कामिल बुल्के, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, भगवती चरण वर्मा , अमृतलाल नागर, श्रीनारायण चतुर्वेदी, कृश्नचंद्र स. ही. वात्स्यायन अज्ञेय, राही मासूम रजा, शरद जोशी, हरिवंश राय बच्चन और विमल मित्र।
आकस्मिक नहीं कि इस पुस्तक में दर्ज उपरोक्त तमाम व्यक्तियों से परिचित होते हुए भी हम उनकी रचनात्मक दुनिया तक ही नहीं जाते, बल्कि जिस समय में वे रचनारच और क्रियाशील हैं, उसके ऐतिहासिक उथल-पुथल से भू गुजरते हैं। जाहिर है, यह भारतीजी की अपनी रचनादृष्टि की ही परिणाम है। उनकी दृष्टि व्यक्ति के अंतर्निहित गुणावगुण को ही नहीं उसके युग परिवेश का भी विश्लेषित-विवेचन करती है। यही कारण है कि यह संस्मरण-कृति सिर्फ चेहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि युगीन चिंताओं से भी एक साहसिक संवाद करती नजर आती है।