एक चुनाव की आत्मकथा / Ek Chunav Ki Atmkatha by Ajay Chandel चुनाव की आपाधापी में आम आदमी क्या सोचता है बस उसी पर दृष्टि रखते हुए कुछ छोटे-छोटे स्वच्छ एवं स्वस्थ व्यंग्य ही चुनाव की आत्मकथा हैं। चुनाव स्वयं दृष्टा है और अपनी कथा कह रहा है। हमारे देश में कुछ हो न हो चुनाव निरंतर होते रहते हैं। एक निश्चित चक्र चलता है और मजेदार घटनाएँ होती रहती हैं। चुनाव वैसे तो एक प्रक्रिया है किन्तु हमारे देश में चुनाव की भी आत्मा होती है। जिसमे आत्मा है वो जीव है। इसलिए यह जीव इस पुस्तक में बोलेगा, अपनी कथा सुनाएगा और अपनी कथा में अन्य कथाएँ भी जोड़ेगा। इस पुस्तक में चुनाव का चक्र ही कथानक है। कुछ समसामयिक घटनाओं पर व्यंग्य भी इस पुस्तक में हैं। हँसते-मुस्कुराते हुए चुनाव के अलग अलग पहलुओं को आप एक अलग दृष्टि से देख पाएँगे। यह पुस्तक