Jump to ratings and reviews
Rate this book

मौत अब दूर नहीं: Murder Mystery

Rate this book
एक रेस्टोरेंट में हुए कत्ल के साथ शुरू हुआ खूनी सिलसिला... एक अनजान शख्स, जिसे एक ‘ब्लाइंड डेट’ पर मार दिया जाता है... एक शातिर और साइकोपैथ हत्यारा जो कत्ल करने के बाद हवा की तरह गायब हो जाता है... और एक रहस्यमयी चीख...

222 pages, Kindle Edition

Published October 24, 2019

5 people are currently reading
4 people want to read

About the author

Ratings & Reviews

What do you think?
Rate this book

Friends & Following

Create a free account to discover what your friends think of this book!

Community Reviews

5 stars
8 (42%)
4 stars
2 (10%)
3 stars
6 (31%)
2 stars
1 (5%)
1 star
2 (10%)
Displaying 1 of 1 review
Profile Image for Rajan.
637 reviews43 followers
March 21, 2021
3/5

It is supposed to be a serial killer murder mystery, which it is partially. However the plot is weak and there are too many unnecessary characters. Two heroes in, Kapil And Arnav created confusion. Saumya and her sister are pretty idiotic. Dangers of online blind dating are brought out well.

A mixed novel. Hence 3 stars.

However i liked this long passage on Police very well.

क्योंकि पुलिस का तो काम ही होता है अपराधियों को पकडऩा। वो अगर अपराधियों को पकड़ती है, अपराधों को हल करती है, तो कुछ नया नहीं करती है। और पाठकों को सिम्पलसिटी नहीं कुछ हटकर चाहिए होता है। पुलिस पहले, बहुत पहले, पुराने उपन्यासों में, पुरानी फिल्मों में हीरो हुआ करती थी। फिर लोग पुलिस की हीरोपन्ती पढ़-पढ़ कर बोर हो गए तो पुलिस का भ्रष्ट, स्याह वाला पहलू ज्यादा उजागर करके दिखाया जाने लगा। हीरो से विलेन बना दिया गया क्योंकि पाठकों को मसाला चाहिए था। पाठकों को कुछ नया चाहिए था इसलिए लीक से हटकर हीरो बनाए जाने लगे। पत्रकार, प्राइवेट डिटेक्टिव, यहां तक कि क्रिमिनल भी एक बार को हीरो के तौर पर पाठकों को चल जाता है लेकिन पुलिस नहीं। ज्यादा से ज्यादा होगा तो पाठक पुलिस को सपोर्टिंग रोल में बर्दाश्त कर सकते हैं। जबकि असल जिंदगी में इसके ठीक उलट होता है। मैं ये नहीं कहता कि पुलिस निस्वार्थ भाव से काम करती है। जनता टैक्स चुकाती है, जिससे पुलिस का पेमेंट बनता है। लेकिन वो तो सभी कामों में होता है। कौन सा डॉक्टर बिना पैसे लिए काम करता है? कौन सा इंजीनियर बिना पैसे लिए पुल बना देता है? सडक़ बना देता है? कौन-सा शिक्षक वेतन नहीं लेता? लेकिन सम्मान तो इन सबको समाज में भरपूर मिलता है। लेकिन जो पुलिस वाले जनता की सुरक्षा के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, न दिन देखते हैं न रात, सर्दी, गर्मी, बरसात सभी मौसमों में ड्यूटी करते हैं, दुर्घटनाओं पर रोक लगाने चौक-चौराहों पर तैनात रहते हैं, घृणित से घृणित अपराध की जांच करने घटनास्थल पर पहुंचते हैं, ऐसे-ऐसे भयावह अपराधों की जांच के लिए उनकी पूरी डिटेल्स में जाते हैं, जिनके बारे में आम आदमी सुनना भी पसंद नहीं करता, उन पुलिस वालों को क्या समाज वो सम्मान दे रहा है, जो उनका अधिकार है? आम आदमी सुबह चाय पीते हुए अखबार में दुर्घटना की छोटी सी खबर पढक़र खिन्न हो जाता है लेकिन हम पुलिस वालों को लगभग रोज ही ऐसी घटनाओं से रू-ब-रू होना पड़ता है। घटनास्थल पर पहुंचकर घायलों को दुर्घटनाग्रस्त गाडिय़ों से बाहर निकालना, अपने हाथों से उठाकर एम्बुलेंस में पहुंचाना, सब कुछ करना पड़ता है। घायल के खून से वर्दी लथपथ हो जाती है लेकिन उस वक्त उसे बचाने की कोशिश करना ही हमारी सबसे बड़ी प्रायोरिटी होती है और इसके बाद भी कभी-कभी जब उसमें सफलता नहीं मिलती, घायल व्यक्ति को बचाने का प्रयास करते हुए वो हमारी आंखों के सामने ही दम तोड़ देता है या बाद में पता चलता है कि जिसे बचाने के लिए हमने इतनी कोशिश की, वो अस्पताल में न बच सका तो हम पर क्या गुजरती है? पुलिस का काम इतना अधिक भावनात्मक और शारीरिक तनाव वाला होता है कि सुबह से शाम तक ड्यूटी करने के बाद पूरा शरीर टूटने लगता है, मन टूटने लगता है। उस पर तमाम तरह के राजनैतिक प्रपंच, दबाव और उल्टे-सीधे काम भी पुलिस के मत्थे मढ़ दिए जाते हैं, जो पुलिस को करने ही पड़ते हैं लेकिन बदले में पुलिस को क्या मिलता है? जानती हो? उन्हें किसी शिक्षक, इंजीनियर, डॉक्टर जैसा सम्मान समाज में नहीं मिलता। लोग सलाम भी करते हैं तो पीठ पीछे गाली देते हैं। कोई गलत काम कर रहा हो, गलत काम करने वाले का साथ दे रहा हो और पुलिस उसे रोक दे तो पुलिस बुरी हो जाती है। लेकिन यही तो पुलिस का काम है। समाज में व्यवस्था बनाए रखना। भले ही इसके लिए समाज हमें गालियां दे। कोसे। हमें अपने कत्र्तव्य पथ पर अडिग रहना होता है। यही हमारी चुनौती है। लोगों में आम धारणा यही बनती जा रही है कि हम पुलिस वाले भ्रष्ट होते हैं, अपनी शक्ति का दुरूपयोग करते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। कुछेक हो सकते हैं। लेकिन सब नहीं होते। हमारे काम में सख्ती बरतना आवश्यक होता है। और इस सख्ती के कारण लोग पुलिस को गलत समझने लगते हैं। फिल्मों, उपन्यासों में भी जिस तरह फ्री हैण्ड लेकर पुलिस को स्याह रंग में रंगा गया है, उससे लोगों में पुलिस के प्रति गलत धारणा बनी है। अब जनता को हीरो खाकी वर्दी में नहीं चाहिए। वो खाकी वर्दी में हीरो की कल्पना ही नहीं करती।’’
Displaying 1 of 1 review

Can't find what you're looking for?

Get help and learn more about the design.