“प्यार सिर्फ प्यार ना रह कर बंदगी बन गया है,
और इंतज़ार भी इंतज़ार ना रह कर ज़िंदगी बन गया है”
इंतज़ार... छोटी सी इ से शुरू होने वाला अदना सा यह शब्द कभी तो ढेर सारा मज़ा देता है तो कभी सदियों लंबी सज़ा। ख़ासकर जब बात इश्क़ की हो। कहते हैं ना कि किसी अपने का इंतज़ार एक-एक क्षण को रोमांचित कर देता है। और जब इंतज़ार अपने प्यार का हो तो लगता है जैसे हर लम्हा सदियों-सा लंबा हो गया हो। ज़िंदगी के कुछ ऐसे ही यादग़ार पलों को समेट कर आपके सुपुर्द है –“इंतज़ार आज भी है”।
इन पन्नों में माधव-मीरा का प्यार है तो सूरज-कविता का इंतज़ार भी... उति और दिनेश की दीवानगी है तो गुंजन और कबीर के जीवन की रवानगी भी। तो देर किस बात की... आइए आप भी शामिल हो जाइये इन सब के साथ उस दौर में जहाँ किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है...।