एक ऐसे ज़मींदार विश्वंभर राय की कहानी जो संगीत और नृत्य का जौहरी की तरह पारखी है| कभी वैभव और विलासिता में डूबे राय खानदान की सारी संपत्ति अब जा चुकी है परंतु खानदानी सम्मान को बचाने के लिए यह राजा अंत मैं कैसे सब कुछ अपना दाँव पर लगा देता है| विश्वंभर राय को सब कुछ खो देने के बाद भी इस बात की संतुष्टि है कि उनके पूर्व राज्य में अभी भी लोग न सिर्फ उन्हें आदर से याद करते हैं बल्कि एक महाराजा की तरह मानते हैं| नव धनाड्य लोग किस तरह अकूत संपदा प्राप्त करने के बाद भी आचरण में अभी भी निकृष्ट हैं इस बात का प्रतीक है ठेकेदार माहिम गांगुली जो राय साहब से ईर्ष्या रखकर संगीत और नृत्य की महफ़िलें आयोजित कर राय साहब से होड़ करने का हास्यास्पद प्रयास करता है|
A thrilling story of the king Vishvambhar Roy, who is living for his pride
The story is based on the internationally acclaimed film Jalsaghar of great film maker Satyajit Ray. Most of us have seen this film based on the story of Bangla writer Tarashankar Bandopadhyay. This is for the first time that this great book is made available in Hindi to people like us who cannot read Bangla. The translation is smooth, very good and carries the main spirit of Jalsaghar.
रंगमहल पढ़कर ऐसा लगा जैसे हम उसी लोक में चले गए हों जिसकी कल्पना ताराशंकर बंदोपाध्याय ने महान बांग्ला कृति जलसाघर में की थी। पढ़ते हुए नायक विश्वम्भर राय से अपनापन, एक जुड़ाव सा महसूस होने लगता है। अंत तक आते आते कथावस्तु मार्मिक हो जाती है, मेरी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। ऐसा लग रहा था कि पुस्तक कभी समाप्त ही न हो। जितनी महान मूल बांग्ला कृति, उतना ही इसका हिंदी संस्करण।