'लौटे हुए मुसाफिर' में स्वतंत्रता के आगमन के साथ गंभीर रूप धारण करती साम्प्रदायिकता की समस्या और भारत विभाजन के नाम पर बेघर-बार हुए मुस्लिम समाज के मोहभंग और उनकी वापसी की विवशता को दर्शाया गया है ! यह इस उपन्यास की प्रभावशाली रचनात्मकता और इतिहास-बोध के कारण ही संभव हुआ कि इस छोटे से उपन्यास का उल्लेख भारत-विभाजन पर केन्द्रित गिने-चुने हिंदी उपन्यासों में प्रमुखता के साथ किया जाता है ! अपनी आवेशयुक्त शैली में कमलेश्वर ने इस कृति में आजादी और विभाजन के ऊहापोहमें फंसे हिन्दुओं और मुसलमानों की मनःस्थिति के साथ भारत के सामाजिक ताने-बाने में आए निर्णायक बदलाव को भी रेखांकित किया है !
Kamleshwar (कमलेश्वर) was a prominent 20th-century Hindi writer, and scriptwriter for Hindi cinema and television. Among his most well- known work are the films Aandhi, Mausam, Chhoti Si Baat and Rang Birangi. He was awarded the 2003 Sahitya Akademi Award for his cult Hindi novel Kitne Pakistan (translated in English as Partitions), and also the Padma Bhushan in 2005.
बीसवीं शताब्दी का हिंदी साहित्य जब साँस लेता है, तो कहीं न कहीं कमलेश्वर की लिखावट की हल्की-सी आहट सुनाई देती है। ‘लौटे हुए मुसाफिर’ से लेकर ‘कितने पाकिस्तान’ तक उनकी रचनाएँ ऐसे चलती हैं जैसे कोई आदमी समय की लंबी सड़क पर अपने ही सवालों के साथ चलता चला जाए। हर मोड़ पर दर्द है, पर साथ ही एक शांत समझ भी कि इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं होता, वह लोगों की आँखों, रिश्तों और टूटी हुई उम्मीदों में लगातार जीवित रहता है।
‘लौटे हुए मुसाफिर’ से ‘कितने पाकिस्तान’ तक पहुँचते-पहुँचते लगभग चालीस साल बीत गए थे, लेकिन कमलेश्वर के भीतर विभाजन का वह घाव कभी भर नहीं पाया। पहली रचना में विभाजन जैसे अभी-अभी घटा कोई हादसा है, जहाँ लोग अपने घरों से उखड़कर रास्तों पर आ गए हैं, रिश्ते टूटकर हवा में बिखर गए हैं और हर चेहरा कुछ खो देने की उदासी लिए भटक रहा है। वहाँ पीड़ा सीधी है, कच्ची है, जैसे ताज़ा चोट का दर्द। वहीं ‘कितने पाकिस्तान’ में वही विभाजन समय के साथ फैलकर एक बड़े सवाल में बदल जाता है, अब वह केवल एक देश की त्रासदी नहीं रह जाता, बल्कि पूरी दुनिया में खिंचती सीमाओं और बार-बार टूटते मनुष्यों का रूपक बन जाता है। समय बीतता गया, दृष्टि व्यापक होती गई, पर दर्द वहीं ठहरा रहा, बस उसने अपना आकार बदल लिया।
1961 में छपा ‘लौटे हुए मुसाफिर’ कोई बड़ी सीमा रेखाओं की कहानी नहीं कहता, वह पंजाब या बंगाल के शोरगुल से दूर, देश के बीचोंबीच बसी एक छोटी-सी बस्ती में बैठकर विभाजन को देखता है। वहाँ गोलियों की आवाज़ें नहीं हैं, पर लोगों के भीतर कुछ टूटने की हल्की-हल्की आवाज़ें लगातार सुनाई देती रहती हैं। कमलेश्वर इस उपन्यास में खून बहते हुए नहीं दिखाते, वे दिलों के भीतर फैलते उस अदृश्य खून को दिखाते हैं, जो राजनीति ने चुपचाप बहा दिया था। रिश्तों में शक उतर आया था, भरोसे की जगह डर बैठ गया था, और हर आदमी अपने ही पड़ोसी से थोड़ा-सा दूर हो गया था। यही इस रचना की सबसे बड़ी ताकत है,कि वह विभाजन को एक घटना की तरह नहीं, बल्कि एक धीरे-धीरे फैलती हुई चोट की तरह महसूस कराती हैं।
उपन्यास की शुरुआत ही एक अजीब-सी शांति के साथ होती है, लेखक बताता है कि चित्वों की बस्ती में विभाजन के समय एक बूँद खून नहीं गिरा था। न किसी ने किसी को गाली दी थी, न मंदिरों के आँगन में पत्थर जमा हुए थे और न मस्जिदों में हथियार छुपाए गए थे। सब कुछ बाहर से बिल्कुल सामान्य और शांत लगता था, जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन कमलेश्वर इस चुप्पी को सच नहीं मानते, वे इस शांति के नीचे दबे उस भूचाल को धीरे-धीरे महसूस कराते हैं जो लोगों के मन में मचल रहा था। रिश्ते भीतर ही भीतर दरक रहे थे, भरोसा खामोशी से टूट रहा था और हर आदमी अपने ही पड़ोसी से अनकहा डर पालने लगा था। इसी अदृश्य हलचल को पकड़ने की उनकी कला इस उपन्यास को साधारण कहानी से कहीं गहरा बना देती है।
कमलेश्वर लिखते हैं कि सब कुछ अपनी-अपनी जगह पर था, सुनार अब भी जेवर गढ़ रहे थे, तालाबों में कमल वैसे ही खिले हुए थे, मंदिरों में कनेर की खुशबू फैल रही थी और मस्जिदों में मेहंदी की महक हवा में घुली हुई थी। बाहर से जीवन बिल्कुल सामान्य चलता दिखाई देता था, पर भीतर कुछ था जो धीरे-धीरे गायब हो रहा था। वह ‘कुछ’ था लोगों के बीच का भरोसा। हवा में अनकही आशंकाएँ रेंग रही थीं और एक अनजान-सा डर सबके दिलो-दिमाग पर चुपचाप छा गया था। कमलेश्वर इस शांत सतह के नीचे बहते इस डर को इस तरह पकड़ते हैं कि समझ में आ जाता है, विभाजन केवल ज़मीन का बँटवारा नहीं था, वह साथ जीने की पूरी संस्कृति की आत्मा को तोड़ देने वाला हादसा था।
उपन्यास में कमलेश्वर बड़ी शांति से उन वजहों को खोलते हैं जिनसे एक सीधी-सादी बस्ती धीरे-धीरे नफ़रत की आग के पास पहुँच जाती है। यहाँ यासीन जैसे सियासी कारकुन आते हैं, जो अलीगढ़ और दूसरे शहरों से अपने साथ राजनीति की गरम बातें और घृणा की चिंगारियाँ लेकर लौटते हैं। मकसूद जैसे लोग भी हैं, जिनके शब्दों में अब पहले जैसी अपनापन नहीं, बल्कि एक नई कड़वाहट उतर आई है। जो लोग कभी कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे, वही अब एक-दूसरे को शक की निगाह से देखने लगते हैं। दोस्ती की जगह धीरे-धीरे दुश्मनी भरने लगती है, और बस्ती, जो कभी सबकी थी, चुपचाप दो हिस्सों में बँटने लगती है।
कमलेश्वर बहुत सहजता से यह बात सामने रखते हैं कि साम्प्रदायिकता कोई अचानक टूट पड़ने वाली प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि वह सोच-समझकर रचा गया एक षड्यंत्र है। इसे राजनीतिज्ञों और धर्म के नाम पर बोलने वालों ने धीरे-धीरे तैयार किया है, जैसे कोई आग सूखी घास में फैलने के लिए हवा खोजती है। इस खेल में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल उन्हीं लोगों का होता है जो पहले से थके हुए, दबे हुए और निम्न-मध्यम वर्ग की कठिन ज़िंदगी में उलझे हुए हैं। उनके दुख, उनकी नाराज़गी और उनकी बेबसी को भड़काकर नफ़रत में बदला जाता है। कमलेश्वर दिखाते हैं कि असली लड़ाई ऊपर कहीं और होती है, पर उसका धुआँ और जलन आम आदमी के जीवन में उतर आती है।
‘लौटे हुए मुसाफिर’ के बीचोंबीच सत्तार और सलमा की प्रेम कथा धीरे-धीरे उभरती है, जो समाज की बनाई हुई दीवारों को चुपचाप लाँघ जाती है। सत्तार उस मुस्लिम समाज का चेहरा है जिसके लिए पाकिस्तान कोई सपना या अपना देश नहीं, बल्कि एक अजनबी नाम भर है, लेकिन जिसे अपनी ही ज़मीन पर साम्प्रदायिक सोच से रोज़ लड़ना पड़ता है। वह यहीं का है, यहीं जीना चाहता है, पर शक और नफ़रत उसे हर पल घेर लेते हैं।
सलमा एक विवाहित औरत है, जो अपने पति के कठोर व्यवहार से भीतर ही भीतर टूट चुकी है। सत्तार की ओर उसका झुकाव किसी कहानी की तरह अचानक नहीं होता, बल्कि जैसे सूखी ज़मीन पर बारिश की पहली बूँद पड़ती है, धीरे और ज़रूरत से भरा हुआ। उनका प्रेम किसी रुमानी सपने जैसा नहीं, बल्कि जिया हुआ सच है। जब बात खुलती है और मामला पंचायत तक पहुँचता है, तो सलमा बिना डर के अपने रिश्ते को स्वीकार कर लेती है। कमलेश्वर इस पूरे प्रसंग में यह बहुत सादगी से दिखाते हैं कि इंसानी रिश्ते समाज की बनाई हुई सीमाओं और बनावटी नैतिकताओं से कहीं बड़े और गहरे होते हैं।
उपन्यास का नाम ‘लौटे हुए मुसाफिर’ उन्हीं लोगों की ओर इशारा करता है जो कभी पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन वहाँ की कठिन परिस्थितियों और अपनी मिट्टी की अनसुनी-सी पुकार के कारण वापस लौट आए। उनकी वापसी किसी जीत की तरह नहीं होती, बल्कि एक थकान भरी हार की तरह होती है। वे अब न पूरी तरह पाकिस्तान के रह जाते हैं, न इस धरती के जहाँ वे जन्मे थे। जैसे दो किनारों के बीच लटके हुए लोग। सत्तार के शब्दों में यह टूटन बहुत साधारण होकर भी बहुत गहरी है “पाकिस्तान क्या बना, सब बिखर गया… आदमी के हौसले बिखर गए, मन की मुरादें टूट गईं, दिलों के रिश्ते खत्म हो गए।” इस वाक्य में केवल एक व्यक्ति का दुख नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी का मोहभंग छुपा है। कमलेश्वर यहाँ उस राजनीति की परतें खोलते हैं जिसने धर्म के नाम पर एक नए राष्ट्र का सपना तो दिखाया, लेकिन बदले में आदमी को उसकी जड़ों से उखाड़ कर अकेला छोड़ दिया।
कमलेश्वर के कथा-साहित्य को ध्यान से पढ़ते हुए यह साफ़ महसूस होता है कि उनके लिए विभाजन केवल एक भौगोलिक सच नहीं था, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा एक गहरी मानवीय त्रासदी थी। उनकी नज़र में नक्शों पर खिंची लकीरों से ज़्यादा अहम उन दिलों की टूटन थी, जो एक झटके में अलग कर दिए गए। ‘लौटे हुए मुसाफिर’ में यह दर्द छोटी-सी बस्ती के भीतर सिमटकर दिखाई देता है, तो ‘कितने पाकिस्तान’ में वही पीड़ा ��ैलकर पूरी दुनिया का सवाल बन जाती है। दोनों ही रचनाएँ बहुत शांत ढंग से यह बात कहती हैं कि नफ़रत की नींव पर कोई नया समाज, कोई नया देश या कोई बेहतर भविष्य नहीं बनाया जा सकता। जहाँ घृणा बोई जाती है, वहाँ अंत में सिर्फ़ बिखराव और अकेलापन ही उगता है।
यह लघु उपन्यास हर उस पाठक के लिए है जो इतिहास को केवल घटनाओं की तरह नहीं, बल्कि मनुष्यों के अनुभवों और संवेदनाओं के रूप में समझना चाहता है। जो यह महसूस करना चाहता है कि नफ़रत कैसे धीरे-धीरे रिश्तों में जगह बना लेती है और राजनीति आम लोगों की ज़िंदगी को किस तरह भीतर से बदल देती है, उसके लिए ‘लौटे हुए मुसाफिर’ एक ज़रूरी पढ़त है।