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आरोहण

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लेखन ने मुझे कुछ दिया हो या नहीं, मगर मनोजगत की अर्गलाएं, खिड़कियां खोलते, बंद करते, दीवारों के पुख़्तेपन, सीलन या भुरभुरेपन को महसूस करते, आदिम गंध की खोहों से सितारों के आगे तक स्मृति और कल्पना की आंखमिचौली में भटक कर सत्य को टटोलना मेरे लिए एक दिलचस्प अनुभव रहा है। इसलिए मेरी हर रचना मेरे लिए शोध की प्रक्रिया से गुज़रना है और लिखना मेरे लिए चौबीसों घंटे की प्रक्रिया है— प्रश्न भी है, समाधान भी; यातना भी है, और यातना से उबरने का माध्यम भी, निपट एकांत गुफ़ा भी है और पछाड़ खाती झंझा में उतरने का साधन भी; हर पल तिल-तिल कर मरना भी है और मौत के दायरों के पार जाने का महामंत्र भी।

251 pages, Paperback

Published January 1, 2006

3 people want to read

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Sanjeev

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