हजार बरसों से हम लाचार थे, गुलाम थे। किसी ने हम पर दया दिखाई ? गधे को गंगा पिला दी, लेकिन हमें अंजुली-भर पानी से महरूम रखा। गोमूत्र को पवित्र माना, लेकिन हमारे स्पर्श को अपवित्र कहा। चींटियों को शक्कर खिलाई, लेकिन हमें भीख तक नहीं दी। इनके मंदिरों में कुत्ते और बिल्लियाँ जा सकती हैं, लेकिन हमें सीढ़ी के पास भी पहुँचने नहीं दिया। इनके पानी भरने के स्थान पर जानवर पानी पी सकते हैं, लेकिन समान अधिकार से पानी पीने के लिये हमें अपनी जान गँवानी पड़ती है। यह है इस संस्कृति का बड़प्पन ! हमें गाँव की सीमा के बाहर रखकर सारे विश्व-भर को अपना घर कहना इनकी कुटिल नीति है।
अब हम अपने अधिकारों की बात करने लगे हैं तो इन्हें मिर्च लगती है। बुनियादी तौर पर वे हमारे अधिकार मानते ही नहीं। आरक्षण और योजनाओं के टुकड़े डाले जाते हैं। इससे समस्या सुलझ नहीं सकती।....
‘‘हमें इस देश की दौलत, सियासत और इज्जत में बराबरी का हकदार होना है...हमें चाहिए संपूर्ण क्रांति।