किताबघर प्रकाशन द्वारा आयोजित ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ की आठवीं कड़ी (सन् 2001) के रूप में हिंदी की श्रेष्ठ आत्मकथा/जीवनी की पांडुलिपि को पुरस्कृत किया जाना निश्चित किया गया था। उपयुक्त पांडुलिपि के अभाव में यह सम्मान लंबित रहा तथा एक और वर्ष (सन् 2002) के लिए इसकी अवधि को बढ़ाया गया। मगर परिणाम में कोई परिवर्तन नहीं आया। इस विद्या की लोकप्रियता तथा प्रासंगिकता को देखते हुए आयोजकों द्वारा यह निर्णय लिया गया कि हिंदी की रचनाकारों के स्वतंत्र आत्मकथांशों को लेकर एक ग्रंथ की ‘रचना’ की जाए जिसमें स्त्री के कुछ अद्यतन और जीवंत चित्र पाठकों के सामने आ सकें। इस ग्रंथ का प्रकाशन, सम्मान के विकल्प के रूप में स्थापित किया गया।
राजेन्द्र यादव हिन्दी के सुपरिचित लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार व आलोचक होने के साथ-साथ हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय संपादक भी थे। नयी कहानी के नाम से हिन्दी साहित्य में उन्होंने एक नयी विधा का सूत्रपात किया। उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द द्वारा सन् 1930 में स्थापित साहित्यिक पत्रिका हंस का पुनर्प्रकाशन उन्होंने प्रेमचन्द की जयन्ती के दिन 31 जुलाई 1986 को प्रारम्भ किया था। यह पत्रिका सन् 1953 में बन्द हो गयी थी। इसके प्रकाशन का दायित्व उन्होंने स्वयं लिया और अपने मरते दम तक पूरे 27 वर्ष निभाया।
28 अगस्त 1929 ई० को उत्तर प्रदेश के शहर आगरा में जन्मे राजेन्द्र यादव ने 1951 ई० में आगरा विश्वविद्यालय से एम०ए० की परीक्षा हिन्दी साहित्य में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण की। उनका विवाह सुपरिचित हिन्दी लेखिका मन्नू भण्डारी के साथ हुआ था। वे हिन्दी साहित्य की सुप्रसिद्ध हंस पत्रिका के सम्पादक थे।
हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा राजेन्द्र यादव को उनके समग्र लेखन के लिये वर्ष 2003-04 का सर्वोच्च सम्मान (शलाका सम्मान) प्रदान किया गया था।
28 अक्टूबर 2013 की रात्रि को नई दिल्ली में 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।