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प्रतिनिधि कहानियाँ: राजकमल चौधरी

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प्रस्तुत संकलन की कहानियाँ रोटी, सेक्स एवं सुरक्षा के जटिल व्याकरण से जूझते आम जनजीवन की त्रासदी की कथा कहती हैं। राजकमल की मैथिली कहानियों के पात्र जहाँ सामाजिक मान्यताओं के व्‍यूह में फँसकर भी अपनी परंपराओं के मानदण्ड में परहेज से रहते हैं वहाँ इनकी हिन्दी कहानियों के पात्र महानगरीय जीवन के कशमकश में टूट-बिखर जाते हैं। यौन विकृतियाँ इनकी मैथिली एवं हिन्दी-दोनों भाषाओं की कहानियों का प्रमुख विषय है और दोनों जगह यह अर्थतंत्र द्वारा ही संचालित होती हैं। ये कहानियाँ कहानीकार की गहन जीवनानुभूति और तीक्ष्‍णतम अभिव्यक्ति का सबूत पेश करती हैं। राजकमल की कहानियाँ न केवल विषय के स्तर पर, बल्कि भाषा एवं शिल्प की अन्यान्य प्रविधियों के स्तर पर भी एक चुनौती है जो कई मायने में सराहनीय भी है और ग्रहणीय भी। इनकी कहानियों का सबसे बड़ा सच है कि जहाँ से इनकी कहानी खत्म होती है, उसकी असली शुरुआत वहीं से होती है।

163 pages, Hardcover

Published January 1, 2009

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About the author

Rajkamal Choudhary

11 books2 followers
Rajkamal Choudhary (1929–1967) (also spelled Rajkamal Chaudhary or Rajkamal Chaudhari ) was an Indian poet, short story writer, novelist, critic and thinker in Maithili, Hindi and Bengali languages. He was known as "a bold leader of new poetry" and writer who "stands out differently" from most other experimentalists.

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Profile Image for Naveen Sharma.
48 reviews1 follower
August 15, 2024
राजकमल चौधरी की प्रतिनिधि कहानियों की प्रथम तीन कहानियां पढ़ी। राजकमल जी यथार्थवादी लेखक थे। आप जीवन को सदैव एक ही दृष्टिकोण से नहीं देख सकते। यथार्थ वाद में जीवन को यथा स्थिति दर्शाया जाना चाहिए पर लेखकों द्वारा यथार्थ वाद की छाया में जीवन के स्याह पक्ष को प्रमुखता दी जाती है। "सब दिन होत न एक समाना", पाठक भी अपने जीवन के स्याह दिनों में स्याह यथार्थ पढ़ना पसंद करता है या कभी कभी आनंद के चरम पर व्यक्ति यकायक ही उस आनंद की क्षणभंगुरता के आभास से विचलित हो उठता है और यथार्थ की ओर अग्रसर होता है। राजकमल जी की इस पुस्तक में व्यस्कों के पढ़ने के लिए अच्छी कहानियां है बशर्ते वह कटु यथार्थ पढ़ने के लिए तैयार हों।
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