ममता कालिया की नवीतम् और चर्चित कहानियों का संकलन है ‘मुखौटा’। इन कहानियों में रचनाकार ने अपने समय और समाज को परिभाषित करने का भरपूर सृजनात्मक जोखिम उठाया है। संग्रह की हर कहानी में ममता कालिया की प्रयोगधर्मिता और संघर्ष चेतना बोलती है। शीर्षक कहानी ‘मुखौटा’ में छात्र वर्ग में आरक्षण जैसे मुद्दे का यथार्थ तथा ‘रोशनी की मार’ में दलित चेतना का उभार अपने पूरे तेवर के साथ मौजूद है। लेखिका कभी समाज के पूरे परिवेश में समकालीन सरोकार ढूँढ़ती है तो कभी नयी स्वातंत्र्योत्तर नारी को उसके पूरे वैभव और संघर्ष में चित्रित करती है। इन कहानियों में अनुभव की दीप्ति, दृष्टिकोण के खुलेपन के साथ हिन्दी कहानी के इस स्वरूप को परिभाषित करती हैं जिसकी पाठक को हरदम तलाश रहती है।
समकालीन कथा लेखन में इस प्रकार के सहज, मेधावी, संवेदनशील और प्रफुल्लित व्यक्तित्व दुर्लभ हैं जो व्यापक समाज के प्रति इतनी बेबाक अभिव्यक्ति कर सकें। सम्बन्धो का खुला स्वीकार और चुनौतियों से साक्षात्कार इस सभी कहानियों का प्रमुख स्वर है। इनमें चालू मुहावरे वाला कटखना नारीवाद नहीं वरन् समग्र जीवन और परिवेश के प्रति सजग, सचेत, प्रतिबद्धता है।
‘पहले वाक्य से ममता कालिया की रचना मन को बाँध लेती है और अपने साथ बहाए लिए चलती है। कुछ इसी तरह जैसे उर्दू में कृष्णचन्द्र और हिन्दी में जैनेन्द्र की रचनाएँ। यथार्थ का आग्रह न कृष्ण था, न जैनेन्द्र का, लेकिन ममता रूमानी या काल्पनिक कहानियाँ नहीं लिखती। उनकी कहानियाँ ठोस जीवन के धरातल पर टिकी हैं। निम्नमध्यवर्गीय जीवन के छोटे-छोटे ब्यौंरों का गुम्फन, नश्तक का-सा काटता, तीखा व्यंग्य और चुस्त चुटीले जुमले, उनकी कहानियों के प्रमुख गुण हैं।
Mamta Kalia (born 2 November 1940) is an Indian author, teacher, and poet, writing primarily in the Hindi language. She won the Vyas Samman, one of India's richest literary awards, in 2017 for her novel Dukkham Sukkham (Sadness and Happiness)