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नये शेखर की जीवनी
शेखर मूलतः कवि है और कभी-कभी उसे लगता है कि वह इस पृथ्वी पर आख़िरी कवि है। यह स्थिति उसे एक व्यापक अर्थ में उस समूह का एक अंश बनाती है, जहाँ सब कुछ एक लगातार में ‘अन्तिम’ हो रहा है। वह इस यथार्थ में बहुत कुछ बार-बार नहीं, अन्तिम बार कह देना चाहता है। वह अन्तिम रूप से चाहता है कि सब अन्त एक सम्भावना में बदल जाएँ और सब अन्तिम कवि पूर्ववर्तियों में। वह एक कवि के रूप में अकेला रह गया है, ग़लत नहीं है तो एक मनुष्य के रूप में अकेला रह गया है एक साथ नया और प्राचीन। वह जानता है कि वह जो कहना चाहता है, वह कह नहीं पा रहा है और वह यह भी जानता है कि वह जो कहना चाहता है उसे दूसरे कह नहीं पाएँगे। शेखर जब भी एक उल्लेखनीय शास्त्रीयता अर्जित कर सम्प्रेषण की संरचना में लौटा है, उसने अनुभव किया है कि सामान्यताएँ जो कर नहीं पातीं उसे अपवाद मान लेती हैं और जो उनके वश में होता है उसे नियम...। वह मानता है कि प्रयोग अगर स्वीकृति पा लेते हैं, तब बहुत जल्द रूढ़ हो जाते हैं। इससे जीवन-संगीत अपने सतही सुर पर लौट आता है। इसलिए वह ऐसे प्रयोगों से बचता है जो समझ में आ जाएँ। शेखर बहुत-सी भाषाएँ केवल समझता है, बोल नहीं पाता। शेखर पागल थोड़ा नहीं है, अर्थात् बहुत है।
160 pages, Paperback
Published January 1, 2018
About the author
Avinash Mishra
22 books5 जनवरी 1986 को गाजियाबाद में जन्म। शुरुआती शिक्षा और जीवन उत्तर प्रदेश के कानपुर में। आगे की पढ़ाई, लिखाई, संघर्ष और आजीविका के लिए साल 2004 से दिल्ली के आस-पास रहनवारी और बीच-बीच में दिल्ली से दूर प्रवास। कविता, आलोचना और पत्रकारिता के इलाके में सक्रिय। कुछ प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में सेवाएं दीं और लगभग सभी प्रतिष्ठित प्रकाशन माध्यमों पर रचनाएं और साहित्यिक पत्रकारिता से संबंधित काम प्रकाशित। ‘अज्ञातवास की कविताएं’ शीर्षक से कविताओं की पहली किताब साहित्य अकादेमी से गए बरस ही छपकर आई है। एक उपन्यास भी प्रकाशनाधीन। फिलहाल आलोचना की एक किताब पर काम और विश्व कविता और अन्य कलाओं की पत्रिका ‘सदानीरा’ का संपादन कर रहे हैं।
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Community Reviews
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May 3, 2019
Fraud in the name of novel! Nothing of novel is here. Looks like a compilation of his facebook posts over years.
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