नोएडा में एक पकौड़ेवाला था— रामभरोसे। देश की तरह उसकी जिंदगी भी रामभरोसे ही थी। एक दिन किस्मत ने पलटा खाया और एक महापुरुष के दर्शन ने रामभरोसे को रातों-रात युगपुरुष बना दिया। भारत में पकौड़ा क्रांति हो गई और फिर वो दिन भी आया जब रामभरोसे इस देश का प्रधानमंत्री बन गया। चाय से पकौड़े तक समय का एक चक्र पूरा हुआ। 'प्रजातंत्र के पकौड़े' एक ऐसी अनोखी फैंटेसी है जिसकी कोई और मिसाल ढूंढना मुश्किल है। रामभरोसे का सफर इतना दिलचस्प है कि पढ़ना शुरू करने के बाद इसे बीच में छोड़ पाना नामुमकिन है। किताब आपको शुरू से आखिर तक गुदगुदाती है लेकिन बहुत गहराई से सोचने को मजबूर भी करती है। कृशन चंदर के बाद लगभग खत्म हो चुकी हिंदी-उर्दू की फैंटेसी परंपरा को जिंदा करती यह किताब शुरू से अंत तक आपको चमत्क&#
Vyang Lekhan ki kala ab is desh se lupt hi hoti ja rahi hai. Ek achcha khasa plot banakar us par aisa vyang likhna khudke aur pathakon ke samay ki barbaadi hai.
कमाल का व्यंग ऐसी किताबे कम ही पढ़ने को मिलती हैं आजकल, ज़रूर पढ़ें | अगर पिछले चार साल मीडिया में चल रही हलचल से जुड़ें रहें है, तो ये किताब आपके लिए है |