He started off as an author and journalist, but moved on to be an active writer in the Indian film industry for 7 years. He worked as a drama producer in All India Radio between December 1953 and May 1956. At this point he realised that a regular job would always be a hindrance to his literary life, so he devoted himself to freelance writing.
Often cited as the true literary heir of Premchand, Amritlal Nagar created his own independent and unique identity as a littérateur and is counted as one of the most important and multi-faceted creative writers of Indian literature.
इस पुस्तक में ईसा की प्रथम शताब्दी में तमिल भाषा के एक महाकवि इलंगोवन द्वारा रचित महाकाव्य ‘शिलप्पदिकारम’ पर आधारित है, इसमें दक्षिण भारत के उस काल के ऐतिहासिक जीवन का चित्रण है
नागर जी कृत सुहाग के नुपुर कि जितनी प्रसंशा की जाए कम है। ये एक पहली शताब्दी के लोकप्रिय महाकाव्य पर आधारित नगरवधु और कुलवधू की समाज में स्थान और उनकि प्रतिष्ठा पर एक दर्शन है।
एक ओर कन्नगी पैरों में विवाह के समय पहनाया सुहाग के नुपुर उसकी संसार की सीमा बता उसके जीवन का संचालन करते हैं और दुसरी ओर माधवी के रूप में एक नगरवधु कि आकांक्षाओं, उसके सामाजिक नैतिकताओं से विरोध और अपने अधिकारों कि परिधी निर्धारित करने कि कहानी है।
पाठक हर एक पात्र का दृष्टिकोण पढ़ते ये सोचने पर विवश हो जाति है कि कथा का मूल नायक या नायिका कौन है… क्यूँकि सभी पात्र ने कहानी पर एक गहरा प्रभाव डाला है। सब अपने संस्कारों से बंधे दिखते हैं। कथा के अंत में आप माधवी कि बात को तर्क कि तुला में तोलने लगते हैं - “पुरुष जाती के स्वार्थ और दम्भ-भरी मूर्खता से ही सारे पापों का उदय होता है।"
ईसा की प्रथम शताब्दी में महाकवि इलंगोवन रचित तमिल महाकाव्य 'शिलप्पदिकारम्' पर आधारित है यह नॉवेल।
Superficially देखें तो ये कहानी है एक नगर सेठ के लिए एक एकनिष्ठ वेश्या और सती पत्नी के संघर्ष की कहानी है।
एक वेश्या के दर्द को बखूबी उकेरा गया है कि किस तरह बिना किसी दोष के एक शापित जीवन जीने को वे बाध्य कर दी जाती हैं। और चाह कर भी .... सुकर्म कर भी ... कुलीन बहुओं से ज्यादा पवित्र रह कर भी वे समाज की मुख्य धारा में न केवल वापस नहीं लौट सकतीं बल्कि ऐसा करने की कोशिश करना भी विनाशकारी है।
दूसरी ओर पति को समर्पित पत्नी का दर्द दिखाया गया है कि किस तरह दूसरी महिला/वेश्या के प्रेमजाल में फंसे पुरुष के लिए वे बस वंशवृद्धि का साधन मात्र रह जाती हैं।
माधवी .... वेश्या कुल की एक अद्वित्य सुंदरी है जिसका दिल राज्य के सबसे अमीर व्यापारी पुत्र पर आ जाता है। व्यापारी पुत्र भी उसके प्रेम में कैद हो जाता है।
लेकिन व्यापारियों का गुण होता है कि वे वस्तुओं से खेलते है, उनके दास नहीं बनते। इसलिए माधवी के प्रेम से पगे होने पर भी सामाजिक रीती और कुल की मान-मर्यादा के हिसाब से अपने बराबर के कुल वाली कन्या से व्याह कर लेता है। और इस तरह दोनों कुल मिलकर राज्य का सबसे ताकतवर व्यापारी वर्ग बन जाते हैं।
कुलीनों के लिए वेश्यागामी होना बहुत ही आम और रौब की बात है लेकिन वेश्या से बंध जाना नहीं। कुलवधुओं का अलग स्थान और सम्मान है और वेश्याओं का अलग संसार। वे बस धन से प्रेम करती हैं।
लेकिन माधवी विद्रोही है। उसे वेश्याकुल में आ जाना अपनी गलती नहीं लगती और व्यापारी पुत्र पर एकाधिकार और उससे पत्नी सा सम्मान चाहती है। व्यापारी पुत्र उसके प्रेम/मोह में कैद होकर भी प्रचलित संस्कार को सही मानता है और तोड़ना भी नहीं चाहता।
वक्त के साथ वह दोनों के बीच झूलता रहता है - कभी पत्नी को सही मान उसके पास रहता है तो कभी मन के आवेग से वशीभूत होकर माधवी की शरण में।
साम-दाम-दंड-भेद हर नीति अपनाकर माधवी उसे पाना चाहती है तो पत्नी बस मूक समर्पण से।
माधवी अपने लिए पत्नी का सम्मान और अपनी बेटी के लिए कुलीन समाज में स्थान और नगर सेठ के वंश श्रृंखला में नाम दर्ज करवाना चाहती है।
लेकिन जिस संतान को संतान प्राप्ति की इच्छा से जिसे जन्म न दिया जाए, जो वासना का फल हो उसे क्या इस संसार में माँ-बाप मिल पाते हैं ?
माधवी को पत्नी की प्रतिष्ठा तभी मिल सकती है जब सेठ की पत्नी अपना सुहाग का नूपुर उतार कर प्रेमिका वेश्या को दे दे। धन के साथ साथ घर की एक-एक वस्तु वो वेश्या प्रेमिका को दे देती है लेकिन सुहाग के नूपुर देने से मना कर देती है। तब कंगाल हो चुके नगर सेठ से प्रतिशोध लेने के लिए माधवी न केवल उसे घर से निकाल देती है बल्कि उसके नज़रों के सामने ही वेश्या बन कर दिखाना चाहती है। इस कोशिश में वो कहाँ तक सफल होगी और क्या नतीजा होगा ?
दूसरी ओर धन, सम्मान और प्रतिष्ठा गँवा चुके सेठ को अंतिम सहारा उन सुहाग के नूपुर से ही मिलता है जिसे उसकी पत्नी सहर्ष उसे बेचने को दे देती है ताकि धन प्राप्त कर दुबारा व्यापर शुरू कर सके।
ये प्रेम तिकोन समाज में इतना तबाही और बदलाव लाता है कि इसपर काव्य की रचना कर एक बौद्ध संत हर जगह गाते हैं। एक दिन उनके इस काव्य गान के बाद आश्रम में पल रही एक तरुणी जो कि हमेशा खोई सी और बिलकुल मूक रहती है, कह उठती है,
"पुरुष जाती के स्वार्थ और दम्भ-भरी मूर्खता से ही सारे पापों का उदय होता है।"
और काव्य गान करने वाले उसे आश्चर्य से देखते हुए पूछते हैं कि तुम माधवी की बेटी हो क्या ?
Very beautiful. Individual identity of all characters is shown beautifully. Kolvan,Kannagi,Madhvi,Chellamma,Periynayki....and rest. बहुत है रसिक है ये किताब।हटने का मन है ना करते पढ़ते समय। नारी के समाज में 2 रूपों को बहुत ही खुबसुरती से चित्रित किया गया है।