Jump to ratings and reviews
Rate this book

लम्बी कहानियाँ

Rate this book
The capability of reading and other personal skills get improves on reading this book Lambee Kahaniyan 1,2 2 Volume Set by Series Editor Rajendra Yadav Editor Archana Verma.This book is available in Hindi with high quality printing.Books from Collection of Stories category surely gives you the best reading experience.

840 pages, Paperback

Published January 1, 2011

1 person want to read

About the author

Rajendra Yadav

139 books18 followers
राजेन्द्र यादव हिन्दी के सुपरिचित लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार व आलोचक होने के साथ-साथ हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय संपादक भी थे। नयी कहानी के नाम से हिन्दी साहित्य में उन्होंने एक नयी विधा का सूत्रपात किया। उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द द्वारा सन् 1930 में स्थापित साहित्यिक पत्रिका हंस का पुनर्प्रकाशन उन्होंने प्रेमचन्द की जयन्ती के दिन 31 जुलाई 1986 को प्रारम्भ किया था। यह पत्रिका सन् 1953 में बन्द हो गयी थी। इसके प्रकाशन का दायित्व उन्होंने स्वयं लिया और अपने मरते दम तक पूरे 27 वर्ष निभाया।

28 अगस्त 1929 ई० को उत्तर प्रदेश के शहर आगरा में जन्मे राजेन्द्र यादव ने 1951 ई० में आगरा विश्वविद्यालय से एम०ए० की परीक्षा हिन्दी साहित्य में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण की। उनका विवाह सुपरिचित हिन्दी लेखिका मन्नू भण्डारी के साथ हुआ था। वे हिन्दी साहित्य की सुप्रसिद्ध हंस पत्रिका के सम्पादक थे।

हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा राजेन्द्र यादव को उनके समग्र लेखन के लिये वर्ष 2003-04 का सर्वोच्च सम्मान (शलाका सम्मान) प्रदान किया गया था।

28 अक्टूबर 2013 की रात्रि को नई दिल्ली में 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

Ratings & Reviews

What do you think?
Rate this book

Friends & Following

Create a free account to discover what your friends think of this book!

Community Reviews

5 stars
0 (0%)
4 stars
1 (100%)
3 stars
0 (0%)
2 stars
0 (0%)
1 star
0 (0%)
Displaying 1 of 1 review
Profile Image for Richa.
139 reviews10 followers
November 5, 2018
बचपन में दूरदर्शन पर एक नाटक देखा करते थे। मिट्टी के रंग। 5-6 वर्ष की उम्र में उसकी कहानियाँ क्या समझ आतीं किन्तु इतना अवश्य था कि वे कहानियाँ उस उम्र में भी मुझे कहीं दूर खींच ले जाती थीं जहाँ बड़ा अकेलापन था। 25 वर्ष बाद जब मोहन राकेश की कृतियाँ पढ़नी शुरू करीं तब ज्ञात हुआ की 'मिट्टी के रंग' की कहानी उसमें थीं। ऐसा गहन विषाद मुझे घेर बैठा! अब जब यह किताब पढ़ी तो फिर वैसे ही कहीं दूर एकाकी होने के भाव से घिर बैठीं। परिचित और प्रिय विषाद जो दुख का नहीं अपितु हृदय में अत्यंत गहरे बैठे किसी अनकहे भाव से परिचय का द्योतक था। ठंड की शाम के धुँधलके में बैठ या फिर बादलों से पटे पड़े आसमान के नीचे बैठे पाठक के लिए उपयुक्त पुस्तक।
Displaying 1 of 1 review

Can't find what you're looking for?

Get help and learn more about the design.