1990 के बाद कुमार अम्बुज की कविता भाषा, शैली और विषय-वस्तु के स्तर पर इतना लंबा डग भरती है कि उसे ‘क्वांटम जम्प’ ही कहा जा सकता है। उनकी कविताओं में इस देश की राजनीति, समाज और उसके करोड़ों मजश्लूम नागरिकों के संकटग्रस्त अस्तित्व की अभिव्यक्ति है। वे सच्चे अर्थों में जनपक्ष, जनवाद और जन-प्रतिबद्धता की रचनाएँ हैं। जनधर्मिता की वेदी पर वे ब्रह्माण्ड और मानव-अस्तित्व के कई अप्रमेय आयामों और शंकाओं की संकीर्ण बलि भी नहीं देतीं। यह वह कविता है जिसका दृष्टि-संपन्न कला-शिल्प हर स्थावर-जंगम को कविता में बदल देने का सामथ्र्य रखता है। कुमार अम्बुज हिन्दी के उन विरले कवियों में से हैं जो स्वयं पर एक वस्तुनिष्ठ संयम और अपनी निर्मिति और अंतिम परिणाम पर एक जिश्म्मेदार गुणवत्ता-दृष्टि रखते हैं। उनकी रचनाओं में एक नैनो-सघनता, एक ठोसपन है। अभिव्यक्ति और भाषा को लेकर ऐसा आत्मानुशासन, जो दरअसल एक बहुआयामी नैतिकता और प्रतिबद्धता से उपजता है और आज सर्वव्याप्त हर तरह की नैतिक, बौद्धिक तथा सृजनपरक काहिली, कुपात्राता तथा दलिद्दर के विरुद्ध है, हिन्दी कविता में ही नहीं, अन्य सारी विधाओं में दष्ुप्राप्य होता जा रहा है। अम्बुज की उपस्थिति मात्रा एक उत्कृष्ट सृजनशीलता की नहीं, सख़्त पारसाई की भी है। µविष्णु खरे (भूमिका से)
प्रकाशन : कविता संग्रह—'किवाड़’ (1992), 'क्रूरता’ (1996), 'अनन्तिम’ (1998), 'अतिक्रमण’ (2002) और एक कहानी संग्रह—'इच्छाएँ’ (2008)।
सम्मान : कविताओं के लिए मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी का माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार, भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार, श्रीकान्त वर्मा पुरस्कार, गिरिजाकुमार माथुर सम्मान, केदार सम्मान और वागीश्वरी पुरस्कार।
साहित्य अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य संस्थान, दूरदर्शन, आकाशवाणी सहित शीर्ष साहित्यिक संस्थाओं में रचनापाठ। विभिन्न प्रतिनिधि समकालीन हिन्दी कविता के संचयनों में कविताएँ शामिल। केरल एस.सी.ई.आर.टी. के एवं अन्य कुछ पाठ्यक्रमों में कविताएँ संकलित। कविताओं के रूसी, जर्मनी, अंग्रेजी, नेपाली सहित अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद। कवि द्वारा भी संसार के कुछ चर्चित कवियों की कविताओं के अनुवाद पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। कहानियाँ व्यापक रूप से प्रकाशित।
बैंककर्मियों की साहित्यिक संस्था 'प्राची’ के संस्थापक महासचिव एवं म.प्र. प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष मंडल में।
कुमार अम्बुज के कविताओं से गुज़रना हमें भेड़चाल और डुक्कुर फौज की दौड़ में हमें अपने आदमी होने और आदमियत को बचाए रखने की कवायद हैं. 90 के बाद और उनके बाद के दशक से भारतीय समाज जिस तरह से करवट ले रहा था. उसके केन्द्र में इंसान, उसके रिश्ते, राजनीतिक गतिविधियाँ, सरकारी तंत्र, जड़ो से उखड़े लोग, बिछड़े अपने, पलायन, अंधाधुन शहरीकरण, धार्मिक-जातीय सवाल, गैर-बराबरी, स्त्री, कुंठा-वासना, मध्यम वर्ग के साथ-साथ विकास के दौड़ में ठहर के सोचते हुए इंसान और उसके इर्द-गिर्द को दर्ज़ करता चलता है.
खासतौर पर हिन्दी कवियों के साथ यह दिक्कत या एक नज़रिया कह लें, रही हैं कि वह अपनी रचना में अपने एकपक्षीय राजनीतिक चुनाव और उसके नजरिए से देखें और पहचाने जाने का आदि रहे हैं. लेकिन अम्बुज इस परिपाटी को तोड़ते हुए इससे इतर जाते है. जो इनके रचना-कर्म और रचना प्रक्रिया को व्यापकता देता है.
आम रोजमर्रा की आम दिक्कतों की झलक और गुस्सा तो है ही साथ ही साथ उनकी माइग्रेन, हारमोनियन की दुकान, वह पेशाबघर, किवाड़, बासी अखबार, साध्वियाँ, आर्युर्वेद, होमियोपैथी, रेखागणित, संग्रहालय आदि को जिस शुक्ष्मता के साथ आवर्ज्ब किया है और लिखा है वह अद्भूत है.
यह निम्न विषय तो बस यहाँ उदाहरण भर है. 136 पृष्ठ में समाहित 106 के आसपास बड़ी-छोटी कविताओं से गुज़रते हुए, इनकी लेखन की लैंडस्केप के विस्तार को समझ सकते है. और कविता की हर विषय-वस्तु एक से अलहदा भी. वहीं भाषा के लिहाज के ज्यादा तामझाम और डराने की कोशिश नहीं की गई. बल्कि आम सहज भाषा है जो दिक्कत नहीं करता. लेकिन असर जरूर करता है.
हिंदी कविता में अगर मुक्तिबोध को पढ़ने में रुचि रखते हैं तो कुमार अंबुज को पढ़ना भी उसी प्रवाह की धारा के साथ बहना जैसा है। एक अलग नजरिया खुद को और अपने आस पास को देखने का मिल जाता है या कहें तो एक सूक्ष्म दृष्टि जो अलग अलग पहलुओं को सामने रखती है। इसी पुस्तक से कुछ पंक्तियां - ... हमें पूर्वजों के प्रति नतमस्तक होना चाहिए (उन्हें जीवित रहने की अधिक विधियां ज्ञात थीं जैसे हमें मरते चले जाने की ज्यादा जानकारियां हैं) ... हम चाहते हैं तुम हमारे साथ कुछ बेहतर सलूक करो लेकिन जानते हैं तुम्हारी भी मुसीबत कि इस सदी तक आते आते तुमने मनुष्यों की बजाय वस्तुओं में बहुत अधिक निवेश कर दिया है।