बच्चन जैसे भाव-प्रवण कवि समय के साथ अपनी कविताओं को अनेक रंगों में चित्रित करते हैं। 'जाल समेटा' की कविताएं उन्होंने 1960-70 के दशक में लिखी थीं। लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच कर जीवन की वास्तविकता के संबंध में उनके मन में अनेक भाव उठे। 'जाल समेटा' में उनकी इन भावनाओं को सजीव करती उत्कृष्ट कविताओं को पढि़ए। बच्चनजी के शब्दों में, 'मेरी कविता मोह से प्रारंभ हुई थी और मोह-भंग पर समाप्त हो गयी।'
हरिवंशराय बच्चन जी की यह अंतिम काव्य रचना है जिसमे उन्होंने पाठकों से विदा लिया है। इस काव्य संग्रह में 31 रचनाएं है जिन सब में जीवन के अनुभव और कवि की अंतिम अनुभूतियाँ संगृहीत हैं।
जहाँ एक तरफ राजनीती से मोहभंग है तो दूसरी तरफ उम्र के ढलान पर जीवन की निरर्थकता का बोध। एक पावन मूर्ति, मेरा संबल, शरद पूर्णिमा, अक्लमंदाना इशारा, मौन और शब्द आदि श्रेष्ठ रचनाएं हैं। पर सबसे उत्कृष्ट है जाल समेटा।
जाल समेटा करने में भी, वक्त लगा करता है मांझी, मोह मछलियों का अब छोड़।
मेरे भी कुछ कागज़ पन्ने, इधर उधर हैं फैले बिखरे, गीतों की कुछ टूटी कड़ियाँ, कविताओं की आधी सतरें, मैं भी रख दूँ सबको जोड़।
कवि का एक बहुत ही सुन्दर परिचय चंद्रगुप्त विद्यालंकार जी ने लिखा है। बच्चन जी की रचनाएं गहरी हैं और आखरी रचना के नाते यह संकलन अतिविशिष्ट बन पड़ा है।