जयशंकर प्रसाद को आधुनिक हिन्दी साहित्य और हिंदी थिएटर की सबसे प्रसिद्ध हस्तियों में से एक के रूप में जाना जाता है। प्रसाद को अक्सर सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, और सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के साथ-साथ हिंदी साहित्य में स्वच्छंदतावाद (छायावाद) के चार स्तम्भों (चार स्तंभ) में से एक माना जाता है। उनका लेखन भाषा पर महारत का प्रदर्शन करते हुए, कला और दर्शन के बीच पुल का काम करता था। हमेशा शास्त्रीय हिन्दी कविता के एक उस्ताद रहे, प्रसाद की रचनाएँ रोमांटिक और राष्ट्रवादी दोनों विषयों को छूती हैं। उनकी कृतियों मूल संस्कृत के साथ हिंदी भाषा के पक्ष में थी, और फारसी शब्दावली से बचा जाता था।
प्रसाद का जन्म एक संपन्न तंबाकू व्यापारी के परिवार में हुआ था। समय के साथ आस
अजातशत्रु प्रसाद जी द्वारा वर्ष 1922 में रचित एक ऐतिहासिक नाटक है। मगध, कोसल एवं कौशांबी के राजपरिवार और उनके उत्तराधिकार संबंधी घटनाओं पर यह नाटक आधारित है। पिता -पुत्र संबंध, राज-लालसा, स्त्री-स्वभाव का महत्व, सत्ता के लिए षड्यंत्र एवं भगवान बुद्ध का संवाद इस नाटक का कथा-विस्तार निर्धारित करता है।
अजातशत्रु का सत्तामोह में पिता बिम्बिसार को सत्ता से हटाना, कोसल एवं कौशांबी से युद्ध और पराजित हो पुनः पिता से माफी मांगना, यही मुख्यतः घटना-क्रम है। अंतर्द्वंद इस नाटक का मूलाधार है। मगध, कोसल एवं कौशांबी में प्रज्वलित विरोधाग्नि इस पूरे नाटक में फैली हुई है।
संवाद के बीच में काव्य का भी कलात्मक प्रयोग किया गया है। बुद्ध का संवाद सत्ता के इस नाटक में अलौकिक ठहराव और परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है। असत्य और बुराई पर सत्य के विजय की गाथा एवं उत्साह और शौर्य से परिपूर्ण यह वीर-रस की एक प्रधान रचना है।
जयशंकर प्रसाद जी का नाम तो बचपन में ही सुना था पर कभी उनकी रचनाएं पढने का अवसर ही नहीं मिला | अजातशत्रु बहुत ही रोचक शैली में लिखा नाटक है | नाटक की भाषा, पात्रों की बातचीत की शैली आपको एक मंच के सामने बैठा देती है जहाँ बैठकर आप इस नाटक का आनंद उठा सकते हैं | इस नाटक पर बौद्ध शैली का गहरा प्रभाव है | दया और क्षमा जैसे गुणों पर विशेष ध्यान दिया गया है | नाटक में कुछ काव्य भी हैं जो मन को प्रभावित करने वाले हैं |
जय शंकर प्रसाद जी द्वारा लिखे गए इस नाटक में इतिहास को एक झलक है जो अजातशत्रु ओर महात्मा बुद्ध के समय से परिचित करवाता है। इस नाटक में बहुत से पात्रों का विवरण भी है, जो इतिहास में अपनी जगह नी बना पाएं। जब तक भारत का सही इतिहास सबके समक्ष नी आता, जयशंकर जी ये नाटक उनकी अच्छी झलक दे जातें हैं।