इस उपन्यास का कथानक उस समय का है जब दिल्ली का लाल किला, मराठों और जाटों के पैरों तले कुचला जा रहा था और मुगल बादशाहत आखिरी सांसें ले रही थी। अफगान आक्रांता मुगल हरम की बेगमों को निर्वस्त्र करके लाल किले में दौड़ा रहे थे। देश की तीसरे नम्बर की सबसे बड़ी रियासत ‘‘मारवाड़’’ के महाराजा विजयसिंह ने चालीस साल तक उत्तर भारत में मराठों का सामना किया। वह जीवन भर मराठों से लड़ता रहा। उसकी प्रेयसी गुलाबराय उत्तर भारत के इतिहास में अद्भुत महिला हुई। उसने तत्कालीन उत्तर भारत की राजनीति को लगभग तीन दशकों तक प्रभावित किया। यह उपन्यास, पहले पहल वर्ष 2010 में प्रकाशित हुआ था। अधिकांश पाठक इस उपन्यास की तुलना चतुरसेन के उपन्यास ‘गोली’ से करते हैं। इस उपन्यास में महाराजा विजयसिंह तथा पासवान गुलाबराय की æ