आधुनिक लेखकों में अग्रणी कृष्ण बलदेव वैद का यह नया उपन्यास एक बार फिर आश्चर्यजनक ढंग से उनके लेखन-कौशल को प्रमाणित करता है।उसका बचपन, विमल उर्फ..., दर्द लादवा, गुजरा हुआ जमाना, काला कोलाज आदि उपन्यासों के लेखक इस उपन्यास में भी अपने समाज, परिवेश और देश काल के अत्यन्त कठिन और बहुपर्ती प्रशनों से जूझते हैं-अपनी विशिष्ट शैली में, अपने विडम्बना-सम्प
कुछ लेखकों और रचनाओं को आप नहीं चुनते हैं. वह आपको चुन लेती है. लायब्रेरी में सेल्फ के बीच तफरी करते हुए यह किताब हाथ लगी. शीर्षक ने भी कहीं न कहीं आकर्षित किया था. दूसरी बात की किताब के फ्लेप कवर पर अंदरूनी कंटेंट के बारे में ज्यादा पता नहीं चल पा रहा था. खैर, इश्यू करवा लिया.
अब आलम यह है कि कृष्ण बलदेव वैद की रचना ढूंढ कर पढ़नी है. इनकी पहली पुस्तक 'एक नौकरानी की डायरी' पढ़ा था. मनोवैज्ञानिक लहजे में एक नौकरानी के मन की बातों को डायरी के शक्ल में इन्होंने शानदार तरीके से लिखा था. खास बात मुझे आकृष्ट की वह शैली थी. अन्तर्मन मन में चलने वाले उमड़-घुमड़ को जब कोई नौकरानी डायरी में उतारेगी तो क्या होगा. क्या लिखेगी? उसके जीवन में ऐसा क्या खास है जो पढ़ने योग्य है. इस ऊथल-पुथल में आप किताब को हाथों में लेते है और पढ़ते चले जाते है...
ठीक इसी तरह 'नर नारी' ने भी चकित किया. नर और नारी के मन को पढ़ते हुए बीना कॉमा या खड़ी पाई के निरंतर लेखकीय शैली मे उतारना भी अजब रहा होगा. मेरे लिए इसे पढ़ना कुछ नया था. और कहीं न कहीं गजब का चोट करता हुआ. एक इंसान के अंदर कितने किरदार होते है. और मन के गहराईयों में और सोच के स्तर पर वह कैसे नया मोड़ लेता रहता है. कि सब कुछ खुलता चला जाता है. मन में दबी इच्छाओं, कामनाओं, संबंधों की ठकराव, संबंध, अनैतिक संबंध, सेक्स, हिंसा, बाँझपन, मर्दानगी-नामर्दगी, परिवार के बिखराव, उत्तर आधुनिक समस्याओं, नारी मुक्ति, लैंगिक गैर बराबरी आदि को केन्द्र में रखकर इंसान के मानसिक ऊथल-पुथल का जो कोलाज बनाया है शैली के तौर पर अद्भूत है.
अगर आप लेखन शैली और कंटेंट के तौर पर प्रायोगिक रचनाओं को पढ़ने के शौकिन रहे हैं तो आप कृष्ण बलदेव वैद और उनकी रचनाओं के तरफ मुड़ सकते है.