मात्र 18 पेज की यह एक बुकलेट है, जिसमे लेखक गाँधी जी के राजनीतिक और चारित्रिक पाखण्ड को उजागर करने का दावा करता है। कई उद्धरणों एवम उदाहरणों का सहारा लिया गया है। मुझे तो बहुत कुछ नया नही मिला इसमे। गांधी जी अवसरवादी थे और पॉलिटिकल ब्लैकमेलिंग उन्हें अच्छे से आती है। लेकिन उन्हें महात्मा कह देना वाकई अतिशयोक्ति लगता है कभी - कभी। एक साधारण मनुष्य की तरह उनकी भी कमजोरियां थी।