यह पुस्तक – “उजड़े उपवन के पक्षी” – मेरे जीवन के उन क्षणों की गवाही है, जब मन ने कुछ बोलना चाहा और शब्दों ने उसका साथ दिया। वे शब्द मेरे नहीं, वे मेरे मन की नदियां हैं - जो भीतर से फूटती हैं और आत्मा तक पहुंचती हैं और कविताओं के रूप में ढलती चली जाती हैं। कभी ये कविताएं मुस्कान बनीं, कभी आंसू तो कभी बिछोह का सन्नाटा ।